ब्राह्मणों को एकजुट करना अरविंद कुमार शर्मा की अग्नि परीक्षा
उत्तर प्रदेश में चुनाव चुनावी शंख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल के विस्तार के साथ ही बज चुका है. ऐसे में चुनावी समीकरण और गठजोड़ का खेल शुरू भी शुरू हो चुका है इस बार की राजनीति मैं ब्राह्मण और ओबीसी वोट बैंक केंद्र में है. उत्तर प्रदेश के प्रमुख दल भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी इन दोनों वोट बैंक को अपनी तरफ लुभाने में लग चुके हैं.
मायावती ने ब्राह्मणों को लुभाने के लिए अपनी चाल चल दी है उन्होंने 23 जुलाई से पार्टी महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में प्रबुद्ध वर्ग संगोष्ठी ब्राह्मण सम्मेलन शुरू करवा दिया है पहला सम्मेलन अयोध्या में श्री राम लला के दर्शन के साथ शुरू हुआ.
इसके बाद से विरोधी पार्टियों की नींद उड़ गई है कल तक बसपा को नंबर 4 की पार्टी समझा जा रहा था और वह किसी भी गिनती में नहीं थी आज वही पार्टी प्रतिद्वंदी के रूप में सामने खड़ी है.
भारतीय जनता पार्टी ने ब्राह्मणों को साधने के लिए अपने सबसे कंट्रोवर्सी विवादास्पद व्यक्ति अरविंद कुमार शर्मा कोई जिम्मेदारी सौंपी है अरविंद कुमार शर्मा का गाजियाबाद में इस वक्त सम्मान समारोह कार्यक्रम चल रहा है जिसमें सभी ब्राह्मण नेता विधायक सुनील शर्मा मेयर आशा शर्मा विधायक अजीत पाल त्यागी जैसे चेहरे मंच पर बैठे दिखाई दे रहे हैं गाजियाबाद में ब्राह्मणों को साधने के लिए दूसरे अन्य नेताओं का भी सहारा लिया जा रहा है जैसे बसपा के नेता रहे मुकुल उपाध्याय कांग्रेस के नेता रहे जगदीश चंद्र शर्मा यह भी ब्राह्मणों की राजनीति में बीजेपी के मंच पर दिखाई दे रहे हैं.
एमएलसी अरविंद कुमार शर्मा जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सचिव रह चुके हैं अपने उद्बोधन में रामायण की चौपाइयों उसके घटनाक्रमों और हनुमान जी का जिक्र कई बार करते हैं वह महाभारत का भी जिक्र करते हैं.
अरविंद कुमार शर्मा इस बात पर पूरी तरह से जोर दे रहे हैं यदि तुम धर्म की रक्षा करोगे तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा. अरविंद कुमार शर्मा ब्राह्मणों को अन्य जातियों को भी साथ में लेकर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं.
वह महर्षि बाल्मीकि तुलसीदास संत रविदास जैसे विद्वानों का भी जिक्र करते हैं.
अब एमएलसी अरविंद कुमार शर्मा ब्राह्मणों को कैसे एकजुट कर पाएंगे यह आने वाले कुछ महीनों में पता चल जाएगा लेकिन इतना जरूर है उनके ऊपर कांटो भरा ताज है और रास्ता बहुत पथरीला है.
उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति इस बात की गवाह जब जब किसी ब्यूरोक्रेट ने राजनीति में भाग्य आजमाया है उसको हमेशा असफलता ही मिली है ऐसे में अरविंद कुमार शर्मा कितने कामयाब हो पाएंगे आने वाले कुछ महीनों में पता चल जाएगा.
अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण की तोओबीसी वोट बैंक सपा और बसपा में बटता रहा है लेकिन ब्राह्मण वोट इस बार फिर से अपने लिए राजनीतिक वर्चस्व तलाश रहा है कभी यह कॉन्ग्रेस का मुख्य वोट बैंक हुआ करता था उसके बाद भारतीय जनता पार्टी की तरफ शिफ्ट हुआ लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा की वजह से बहुजन समाज पार्टी की तरफ भी 2007 गया है उसके बाद फिर से भारतीय जनता पार्टी में आया लेकिन वर्तमान सरकार में ब्राह्मणों की अनदेखी और उनके राजनीतिक वर्चस्व में कमी के कारण ब्राह्मणों में नाराजगी है.
और वह अंदर ही अंदर सुलग रहा है भारतीय जनता पार्टी के पास में नंबर 1 से लेकर 5 तक कोई भी ब्राह्मण बड़ा नेता नहीं है ऐसे में भारतीय जनता पार्टी में छटपटाहट है कि वह कैसे ब्राह्मणों को साधे 2017 के विधानसभा चुनाव में 56 सीटों पर ब्राह्मण विधायक जीत कर आए थे जिसमें 44 भारतीय जनता पार्टी के थे. इसलिए आप ब्राह्मणों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सत्ता में बने रहने की लालसा को समझ सकते हैं उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोट लगभग 15% है इसी वजह से सभी राजनीतिक दल ब्राह्मणों की नाराजगी को साधने में लगे हुए हैं बहुजन समाज पार्टी पहले भी ब्राह्मणों को अपनी तरफ मिला चुकी है और सत्ता का स्वाद चख चुकी है समाजवादी पार्टी कभी भी ब्राह्मणों को अपने साथ लेकर नहीं चल पाई । वह हमेशा यादव, ओबीसी और मुसलमानों की पार्टी बन कर रही है। कांग्रेस ब्राह्मणों की पुरानी पार्टी है । ऐसे में ब्राह्मण कांग्रेस की तरफ दोबारा जा सकता है।
समाजवादी पार्टी ब्राह्मणों को लुभाने की पूरी कोशिश कर रही है जिसके लिए उन्होंने भगवान परशुराम की मूर्तियां लगवाने की घोषणा की है और भगवान परशुराम के नाम पर ब्राह्मणों के दिल में जगह बनाने की कोशिश कर रही है। वही बहुजन समाज पार्टी ने सतीश मिश्रा को ब्राह्मण सम्मेलन करने की जिम्मेदारी सौंपी है और 23 जुलाई से यह काम आरंभ हो चुका है पहला ब्राह्मण सम्मेलन अयोध्या में उसके बाद उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में यह काम होगा। जब बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मण महासम्मेलन का आह्वान किया तो उत्तर प्रदेश के लगभग 200 ब्राह्मण नेता लखनऊ बैठक में पहुंचे थे।
भारतीय जनता पार्टी ने ब्राह्मणों को साधने के लिए अपने सबसे ज्यादा विवादास्पद अरविंद कुमार शर्मा को यह जिम्मेदारी सौंपी है
ऐसे में अरविंद कुमार शर्मा के सिर पर कांटो भरा ताज पहना दिया गया है उनकी एक अग्नि परीक्षा है 2022 के चुनाव तक।
उत्तर प्रदेश की राजनीति मैं ब्राह्मणों का शुरू से ही बोलबाला रहा है और 2022 का चुनाव तो ब्राह्मणों को केंद्र में रखकर ही लड़ा जाएगा यानी कि आप कह सकते हैं कि ब्राह्मण इस बार उत्तर प्रदेश के मुखिया का चेहरा तय करेंगे इस बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री वही होगा जिसे ब्राह्मण चाहेंगे अब सवाल यहां पर यह है जो ब्राह्मण बीजेपी का वोटर है जो अंदर ही अंदर नाराज है क्या उस वोट बैंक पर सपा बसपा और कांग्रेस सेंध लगा पाएगी क्योंकि ब्राह्मण नाराज तो है लेकिन इतना भी नाराज नहीं है कि वह बीजेपी को छोड़कर चला जाए यदि इन पार्टियों ने इस वोट बैंक पर सेंट लगा ली उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन निश्चित है
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