नई सरकार में डीजीपी की पुरानी चुनौतियां
लोकसभा चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी ने फिर से सरकार बनाई है यानी कि आम जनता ने इसको अगले 5 वर्षों के लिए चुना है इसे आप नई सरकार भी कह सकते हैं लेकिन यह नई सरकार है नहीं बल्कि इसका वर्तमान कार्यकाल पिछले 5 वर्षों का ही विस्तार है इसकी प्राथमिकताएं, चुनौतियां और नेतृत्व पुराना ही है. इन्हीं चुनौतियों में घरेलू मोर्चे पर आम आदमी की सुरक्षा के लिए पुलिस व्यवस्था है. बेहतर पुलिस व्यवस्था की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह के कंधों पर है. लेकिन आम चुनावों के बाद से उत्तर प्रदेश में आपराधिक घटनाओं की खबरें मीडिया की सुर्खियां बनने लगी है. यह बहुत ही हैरान कर देने वाली बात है कि आखिरकार ऐसा क्या हुआ कि अपराध की घटनाएं एकदम से बढ़ गई हैं? जबकि पुलिस भी वही है और उसका मुखिया भी वही है फिर चूक कहां हुई है जो एकदम तेजी से अपराध की घटनाएं सामने आ रही है.
यह हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि डीजीपी ओपी सिंह के नेतृत्व में पुलिस ने अपराध पर अंकुश लगाया और अपराध का ग्राफ नीचे की तरफ आया था. इसके लिए उत्तर प्रदेश पुलिस ने बहुत सारे प्रयास किए और नए-नए प्रयोग भी किए जो सफल हुए, जिसके लिए ओपी सिंह को वाहवाही मिली.
बढ़ती हुई अपराधिक घटनाएं क्या यह बताने की कोशिश कर रही है उत्तर प्रदेश पुलिस आरामदायक अवस्था में आ गई है ? क्या वह चुनाव के बाद आपको थकान उतार रही है जिसकी वजह से उसका अपराधियों पर शिकंजा ढीला हो गया है ?
अलीगढ़ के टप्पल की घटना मैं पुलिस का रवैया वही पुराना वाला सामने आया है जिसकी वजह से पुलिस को अक्सर शर्मिंदा होना पड़ा है. ट्विंकल की घटना नहीं घटती यदि समय रहते पुलिस ने कारगर कदम उठाए होते उसको ढूंढने में. जिससे यह बात समझ में आती है पुलिस सुन तो रही है लेकिन कार्यवाही के नाम पर लापरवाही है या फिर बहलाने की आदत बन रही है.
कुछ अपराधिक घटनाएं तो पुलिस की नाक के नीचे हुई हैं और उसको भनक तक नहीं लगी . इन घटनाओं ने पुलिस की योग्यता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिए है. उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद थाने से चोरों ने जिस तरह से चोरी की वारदात को अंजाम दिया. एक और घटना है जिसका में जिक्र अवश्य करूंगा ग्रेटर नोएडा के P4 सेक्टर से एक आईपीएस के घर से कुछ नाइजीरियन ड्रग्स का धंधा कर रहे थे जिसकी भनक तक आईपीएस अधिकारी को नहीं थी यानी कि दोनों ही जगह पुलिस कि अपनी व्यक्तिगत जगह थी, एक थाना जहां पर कुछ पुलिस अधिकारी और कर्मचारी काम करते हैं और कुछ रहते भी हैं. दूसरी वह जगह जो खुद एक आईपीएस अधिकारी का घर है यदि पुलिस अपने ही घर में और थाने में असफल हो जाए तो आम आदमी को क्या सुरक्षा दे पाएगी.?
यह एक चिंता का विषय है. इस पर मंथन होना आवश्यक है. पिछले कुछ समय में अपराध की बहुत सारी घटनाएं आई है जिन्होंने सोचने पर मजबूर किया है जो यह बता रही है की उत्तर प्रदेश पुलिस को घरेलू मोर्चे पर काफी कुछ नए सिरे से सोचना होगा.
घरेलू मोर्चे पर राज्य की सुरक्षा के लिए डीजीपी ओपी सिंह के सामने चुनौतियों के रूप में साइबर क्राइम, लूट, डकैती, बलात्कार और हत्या जैसे जुर्म एक बार फिर सामने खड़े हुए हैं . गांव देहात से लेकर संतुलित शहरी विकास जैसे क्षेत्रों में कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखना एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने है.
आपको बता दूं की अपराध एक अंधी सुरंग की तरह होता है. तमाम दावों के बाद भी किसी को पता नहीं होता कि इसमें लगातार कार्यवाही के बावजूद अपराध पर कितना नियंत्रण हो पाएगा या फिर इसका खात्मा हो पाएगा. कई दशकों से उत्तर प्रदेश पुलिस का बड़ा हिस्सा जुर्म की ऐसी स्थिति से जूझ रहा है, जहां पर वह नए-नए प्रयोग करती है और अपराध के ग्राफ को नीचे लाने के दावे करती है लेकिन कहीं से भी अपराध मुक्त राज्य की रोशनी दिखाई नहीं देती है.
ऐसे ही एक बार फिर हुआ है चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश में अपराधों की संख्या बढ़ गई है यह अपने आप में सोचने वाला विषय है आखिरकार चुनावों के बाद अपराध क्यों बड़े. ?
दोस्तों नई सरकार की पुरानी चुनौतियों वाले डीजीपी को अब नए सिरे से सोचना होगा कि जिस नीति पर वह चल रहे थे क्या उससे अब उत्तर प्रदेश पुलिस को लाभ होगा? क्या उन पुरानी नीतियों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है.? राज्य में शांति व्यवस्था एवं सुरक्षा का माहौल आम जनमानस को देने के लिए कौन से कदम उठाने चाहिए. हालात बिगड़ने से पहले नए रास्ते खोज लेने होंगे.
एक बार फिर आपका ध्यान इस तरफ लेकर जाना चाहूंगा कि नई सरकार और नए गृहमंत्री की सबसे बड़ी चुनौती आम आदमी को घरेलू मोर्चे पर एक अपराध मुक्त राज्य देने की भी है और इसकी कमान उत्तर प्रदेश पुलिस के पुराने डीजीपी ओपी सिंह के कंधों पर है. क्योंकि इस बार भी सरकार बनने के बाद कुछ ही दिनों में अल्पसंख्यकों पर हमले की कुछ घटनाएं हुई हैं. आपराधिक घटनाएं भी बढ़ी हैं . राज्य के छोटे बड़े बदमाशों के अलावा आपसी रंजिश में एक दूसरे का खून बहाने की खबरें भी सामने आई है. इन वारदातों को रोकने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से गृह मंत्रालय और उसके मुखिया की होती है. केंद्र में गृह मंत्रालय के मुखिया अमित शाह है और उत्तर प्रदेश में गृह मंत्रालय के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं. और गृह मंत्रालय के पास आम आदमी की सुरक्षा के लिए पुलिस व्यवस्था होती है . ऐसे में उत्तर प्रदेश के डीजीपी के सामने बड़ी चुनौतियां हैं की ऐसी अराजकता को सख्ती से कैसे रोका जाए. राज्य को अपराध मुक्त कैसे बनाया जाए. ऐसा तभी संभव है जब लोगों के मन में कानून का भय बरकरार रहे.
समस्याएं तो सरकारों और राज्यों की नियति होती है और उनका मूल्यांकन भी इनसे निपटने के अंदाज से ही होता है. उत्तर प्रदेश में बड़ी अपराध की घटनाएं तो पुरानी समस्याएं हैं. देखना सिर्फ यह है कि क्या नई सरकार और पुराने डीजीपी ओपी सिंह इनसे निपटने के लिए कुछ नए औजार गढ़ते हैं या फिर पुराने औजारों से ही काम चलाते हैं.
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