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कन्या शिशु हत्या का इतिहास

कन्या शिशु हत्या
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भाग-2

1846 में पहले पंजाब युद्ध के बाद जलंधर-दोआब को ब्रिटिश साम्राज्य में संयुक्त कर दिया गया. युद्ध के बाद सैनिक धन और गहनों की खोज में घरों के आँगन और पिछवाड़े खोदने लगे तो उन्हें हर घर में ढेरों शिशुओं के कंकाल मिले, जो कई पीढ़ियों की कन्या शिशुओं के थे. लॉर्ड लॉरेंस ने, जो यहाँ के आयुक्त बने, तुरंत जांच-पड़ताल शुरू की. तब उन्हें पता चला कि ऐसी हत्याएँ पंजाब में बहुत प्रचलित हैं. खासकर ये पंजाब की बेदी नामक जाति में अनेक पीढ़ियों से प्रचलित थी. इसके अलावा बुझाई, माझा, खत्री, लोहारिन नामक जातियाँ भी इस प्रथा को चलाती थीं.

बेदियों का कहना था कि वे इस प्रथा को अपने गुरु परमचंद के कहने पर चला रहे हैं. परमचंद के बेटे को उनकी बेटी की ससुराल वालों ने अपमानित किया था, इसलिए उन्होंने कहा था कि कोई भी सिक्ख अपनी बेटी को ज़िंदा नहीं रखेगा.

जहाँ राजपूत इस प्रथा का पालन चोरी छिपे करते थे, वहीं सिक्ख बहुत गर्व से अपनी 400 साल से चली आ रही कन्या शिशु हत्या के बारे में बताने से संकोच नहीं करते थे. सिक्खों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह जब पंच प्यारों को अभिमंत्रित कर रहे थे, तो यह भी कहा था कि इस प्रथा को ख़त्म किया जाए. उन्होंने सिक्ख परिवारों को आपस में विवाह करने की अनुमति दी और दहेज लेने या देने से मना किया. इसके बावजूद भी कन्या शिशु हत्या बंद नहीं हुई. 1846 में जालंधर-दोआब की जनगणना  में 2000 बेदी परिवारों में एक भी लड़की नहीं मिली. 1852 में पूरे प्रदेश में सिर्फ 50 लड़कियाँ एक से पांच साल की मिलीं, जिसमें एक भी बेदी घराने की नहीं थी.
यह देख कर सर मॉन्टगोमरी ने अक्टूबर 1853 में एक ऐतिहासिक सभा बुलाई. इसमें पूरे लाहौर, झेलम और पंजाब के प्रांतों के लोग शामिल हुए. वहाँ पर आर्थिक क्षमता के आधार पर लोगों को तीन या चार वर्गों में बाँटा गया. इस विभाजन के आधार पर उन्होंने शादी पर होने वाले खर्चों की सीमा तय कर दी. सभी वंशों और जातियों के प्रतिनिधियों ने उसके अनुकूल इकरारनामों पर दस्तख़त करके इसे अपनाने की प्रतिज्ञा की.
इन सब प्रयासों के बावजूद 1901 की जनगणना में पंजाब में सारे भारत की तुलना में सबसे कम स्त्रियाँ पायी गयीं.
(शेष अगले भाग में.....)

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