एक महीनें दो महीने तीन महीनें के बच्चें मर रहे है उन्होंने क्या लीची खाई होगी? वो क्या शाम को भूखे पेट सोये होंगे? उन्हें क्या ग्लूकोज की कमी हुई होगी जिनके लिये माँ का दूध ही सम्पूर्ण आहार होता है... ? ये लीची और कुपोषण सब सच्चाई कम बहाने ज्यादा है माना बच्चें गरीब के है और गाँव के है तो क्या सब कुपोषण के शिकार है? क्या गरीबी और गाँव से होने के कारण कुछ भी कहकर पल्ला झाड़ा जा रहा है? जबकि कारण कई हो सकते है और मीडिया की नजर सिर्फ मुजफ्फरपुर में है जबकि लगभग कई जिलों के निजी से लेकर सरकारी अस्पतालों में बच्चें इस भयावह बीमारी से तड़प रहे है... क्योंकि मुज में लीची होता है इसीलिये इसे ही केवल कारण बता देना महज एक भाड़ टालने वाली बात है... रही बात रात में नहीं खाने की तो गाँव में बच्चें तो क्या बड़े बूढ़े सभी ज्यादातर शाम होते होते खाना वाना खा कर लगभग सात आठ बजे तक सो जाते है यह कोई नई बात नहीं है.. पानी की किल्लत और गंदगी से लगभग जूझता है बिहार का सभी गाँव और शहर.. शहर में तो लोग आरओ लगा लेते है पानी पीने के लिये पर गाँव में ऐसा नहीं होता ज्यादातर जगह के पानी अब ऐसे निकलते है कि पूरे बर्तन को मिनटों में पीला कर दे.. स्वाद भी बड़ा अजीब टाइप का.. और क्योंकि पानी की किल्लत ही किल्लत हर ओर चल रही है महीनों से तो पता न वह कैसे पानी का सेवन करते हो पीने के लिये... नहाने के लिये..
एक बात और कहना चाहूंगी जो आपको थोड़ा अजीब लगे पर क्योकि बात बच्चो के जीवन की है तो बोलना लाजमी है मैंने देखा मरते हुए बच्चे को और बहुत लोगों से पता करने की भी कोशिश की बहुत से लोग मुसहर प्रजाति के है दोस्तों इनका जीवन आम जीवन से बहुत भिन्न होता है और ये अपने आहार में मूसा यानी चूहा जरूर मार कर पका कर खाते है..बात सिर्फ मुसहर प्रजाति की ही नहीं गाँव में गर्मी के दिनों में तालाब तो भले सुख जाय नाले गड्ढे इत्यादि से भी बच्चे नहाते है यह तक कि घोंघा मछली सब पकड़ कर लाते है खाने के लिये.... उनके घर या छत वैसे नहीं होते जो उन्हें छाया दे ठीक से गर्मी के दिनों में गर्मी माहौल में तड़प कर ऐसे भी कौन सा ग्लूकोज़ राह जाता है बॉडी में? अब शहर के बच्चें तो है नहीं जो इंडोर गेम में लगे रहे.. गाँव में सिर्फ आउट डोर गेम होता है चाहे वो कितनी धूप की दोपहरी हो बच्चें पेड़ों पर या नदी नालों में ज्यादा पाय जाते है खेलते हुए.... और हा गाँव से मेरा मतलब उनलोगों से नहीं है जिनके बाबू दादा का महल बना हुआ है और गाछ बगीचे जहाँ उनको उनका नौकड़ चक्र लेकर जाएगा खेत खलिखान घुमाने, गाछी दिखाने... या फिर जो रहते तो है गाँव में पर शहर से भी रईसी जी रहे.... बात उनकी यहाँ नहीं कि गयी है यहाँ बात ऐसे गाँव ऐसे तबके और ऐसे लोगों की है जो बहुत ही निम्न जीवन जीते है,जिनका पेशा अलग है,रहन सहन अलग है केवल गरीबी के कारण नहीं माफ कीजियेगा जाति भी एक विशेष वजह है.... #स्वक्षता चाहे वो शरीर का हो पानी का हो या वातावरण का इन सब चीजों में कमियां बेशक होती है भले कारण इनके हालात हो... क्योकि इनका जीवन नाहा धोकर खाने और काम करने टाइप बस नहीं होती बल्कि इनको दिन भर खेतों में आधा पानी लगे घुटने के बल तक खलिहानों में रोज काम करना पड़ता है तब जाकर अपने बच्चों का पेट पालते है... महिलाये मवेशियों के खाने के लिये भी भारी दोपहरी में भी घास इत्यादि के प्रबंध करती है ,धूप में और जलना न पड़े इसलिये सुबह होते होते खाना पका कर तैयार,रात की अंधेरी डसनी न पड़े इसलिये डूबते सूरज की सांझ में ही रात का खाना बनकर तैयार... फिर खाकर ऐसे सोएंगे कि नींद बस सूरज के उठने से पहले ही टूटेगी.... जी मैं बात कर रही हूँ उन्हीं भाई बहनों के जीवन की जिनके बच्चें उनकी बाहों में दम तोड़ रहे है.... कारण तो स्पष्ट तब दिखेगी न जब मीडिया उनके घर जाय उनकी स्थितियों को भी बताए.... तब मालूम होगा न असली जीवन और गाँव और विकास व सच्चाई क्या है... हम आप शहरी है थोड़ा बहुत गाँव देखकर बस फेंक देते है कि गाँव अब गाँव नहीं रहा बिजली है स्कूल है तो न जाने क्या क्या बात सच भी है पर अभी भी ऐसे लोग है जिनका बिजली,स्कूल,चौक दुकान से कोई लेना देना नहीं वो जीते भी है,पोखर,गाछ वृक्ष से और शायद मरते भी है... इन्ही के कारण😔... वाकई चमकी बीमारी कुछ नहीं मेन कारण है गरीबी जिससे लोग मर रहे है... और गरीब ही मर रहे है इसलिये जाँच टीम बस पल्ला झाड़ रही वो फेल है सही कारणों का पता लगाने में... और हमारा डिजिटल भारत कितना अशिक्षित है इस बात से ही समझा जा सकता है..
साहिबाबाद रेलवे स्टेशन दिल्ली के नजदीक होने के कारण काफी व्यस्त रहता है। यहां 98 पैंसेजर ट्रेन और 16 एक्सप्रेस ट्रेनों के स्टॉपेज़ हैं। जिनसे लगभग 50 हजार यात्री प्रतिदिन सफर करते हैं। यही रेलवे स्टेशन अनियमिताओं का शिकार है। पूरे परिसर में गंदगी और आवारा पशुओं का जमावड़ा आम बात है। बंदरों के आतंक से भी यह स्टेशन अछूता नहीं है। टिकट खिड़की परिसर में लगी हुई दोनों एटीवीएम मशीनें महीनों से खराब पड़ी हुई हैं। इस परिसर में तीन टिकट खिड़की हैं और एक पूछताछ कार्यालय है। जिसमें से अक्सर दो बंद ही रहती हैं। जिसके चलते यात्रियों को होने वाली असुविधाओं के बारे में जब स्टेशन मास्टर नरेश मलिक से बात की गई तो उन्होंने स्टाफ की कमी का हवाला देते हुए अपना दामन बचाने की कोशिश की। साहिबाबाद रेलवे स्टेशन मास्टर नरेश मलिक ने बताया कि कर्मचारियों की कमी हैं। मैं उनसे कहां तक काम करवाउं। पेयजल की बाधित व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि यह इंजीनियरिंग विभाग का काम है। इसके बारे में आप इस विभाग से बात करें। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह विभाग आपके आदेश के अधीन नहीं हैं तो उन्होंने चुप्पी साध ली। रेलवे स्टेशन पर ...
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