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कन्या शिशु हत्या का इतिहास

कन्या शिशु हत्या
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भाग-1

पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की शारीरिक पवित्रता को ही सबसे खास माना गया है. खानदानी इज़्ज़त भी इसी से जुड़ी हुई है. स्त्री के मन और बुद्धि से ज़्यादा उसके शरीर को महत्त्व दिया जाता रहा है. उसे पवित्र रखने  के लिए तमाम सामाजिक हथकंडे अपनाये जाते रहे हैं, मसलन पर्दा, कम शिक्षा, नौकरी न करने देना, सार्वजानिक जीवन में कोई भूमिका न होना....

इस तरह धीरे-धीरे स्त्री का अपना वज़ूद खत्म हो गया, वह सिर्फ पुत्री, पत्नी, माँ और देवी बनकर रह गयी. वह आर्थिक और मानसिक ज़रूरतों के लिए पुरुषों पर निर्भर हो गयी. ज़ाहिर है कि जब आधी जनसंख्या पुरुषों पर निर्भर हो जाएगी तो संतुलन बिगड़ेगा और पितृसत्तात्मक समाज अपने भार को काम करने के लिए "मुसीबत की जड़" को ही ख़त्म करने की कोशिश करेगा. शायद इसीलिए भ्रूण और कन्या शिशु हत्या इतनी प्रचलित हो गयी..

कन्या शिशु हत्या के बारे में सबसे पहले 1789 में सर जोनाधन डंकन ने लिखा है. सर डंकन वाराणसी के आयुक्त थे. वे एक अध्यापक भी थे. वाराणसी के लोगों के बारे में सीखते-समझते हुए उनकी मुलाकात 'राजकुमार' नामक राजपूतों के एक वर्ग से हुई. उनसे सर डंकन को पता चला कि कन्या शिशुओं की हत्या की प्रथा वे कई पीढ़ियों से चलाते आ रहे हैं...कारण था दहेज़ प्रथा और शादियों के भारी-भरकम खर्चे..हत्या का तरीका यह था कि वे कन्या शिशु के पैदा होते ही वे उसे घर के पिछवाड़े छोड़ देते थे. वहीं पर वह भूख, गर्मी या सर्दी से मर जाती थी.
सर डंकन को यह भी पता चला कि इसी इलाके के पास जौनपुर के कुछ राजकीय परिवारों में भी यह प्रथा प्रचलित है, जबकि ये परिवार अमीर थे और शादी के खर्च उठाने में पूरी तरह सक्षम थे. यहाँ कन्या शिशु हत्या की वजह यह थी कि उन्हें अपने दामाद के परिवार के सामने सिर झुकाना पड़ता था और रिश्ते में "ससुर" और "साला" भी कहलाते थे.

बहुत समझाने और धमकाने के बावजूद जब बात नहीं बनी तो सर डंकन ने इन इलाकों के सरदारों  से 3 दिसंबर, 1789 को एक इकरारनामा लिखवाया कि वे इस घिनौनी प्रथा को छोड़ देंगे और इनका कोई भी परिवार इस इकरारनामे का उल्लंघन करे तो उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाए.

सर डंकन के बाद सर जॉन शोर 1795 में वाराणसी के आयुक्त बने. उन्होंने रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में भाषण दिया और सभी से इस विषय  को आम जनता तक पहुँचाने के लिए कहा. 22 मई, 1795 को प्रथम रेग्युलेशन XXI उन्होंने पास करवाया. इसमें साफ-साफ घोषणा थी कि ब्रिटिश सरकार कन्या शिशुओं की हत्या को आम हत्या के बराबर ही मानेगी और इसका दंड भी उसी के बराबर होगा. इतनी सख्ती होने पर भी लोगों पर ज़्यादा असर नहीं हुआ. इसके बाद 1804 में एक और रेग्युलेशन पास करवाया गया.

1836 में थॉमसन नामक एक सैनिक अफसर करों का निबटारा करने आजमगढ़ आये तो मज़ाक-मज़ाक में उन्होंने एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का दामाद कहकर पुकारा. इस पर सब हँस पड़े और बताया कि ये तो असंभव है, क्योंकि उनके गाँव में 200 सालों से कोई लड़की ही नहीं रही. थॉमसन ने लिखा है कि लगभग 10,000  राजपूतों की बिरादरी में एक भी परिवार में पुत्री नहीं थी. यह भी पता चला कि आस-पास के इलाकों में भी यह प्रथा बहुत ज़्यादा प्रचलित है और सबसे ज़्यादा चौहान राजपूतों में है. इन सभी जगहों में जितनी ऊँची सामाजिक हैसियत होती थी, उतनी ही ज़्यादा निष्ठुरता से उन घरानों में इस प्रथा का पालन किया जाता था.
क्रमशः

साभार
कांति शिखा ki Facebook wall se

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