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कन्या भ्रूण हत्या का इतिहास

कन्या शिशु हत्या
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भाग -3

1807 में कन्या शिशु हत्या की प्रथा बम्बई प्रेसीडेंसी (अब गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक)  में मेजर वॉकर की नज़र में आयी. यह घिनौनी प्रथा जडेजा  नामक वर्ग के कुलीन  परिवारों में सबसे ज़्यादा प्रचलित थी. यहाँ यह प्रथा एक राजा ने चलाई थी. बताया जाता है कि एक शूरवीर  और शक्तिशाली राजा की एक अति सुंदर और गुणवान लड़की थी. उन्हें राजकुमारी के गुणों और राजा के प्रताप से मेल खाता हुआ कोई वर नहीं मिला. इस पर राजगुरु ने सलाह दी कि जवान  बेटी घर में रखने से अच्छा है कि उसे मार दें. इस तरह वर ढूढ़ने  की मुसीबत से मुक्ति पाने के लिए राजा की तरह प्रजागण भी अपनी पुत्रियों को जन्म लेते ही मार देते थे. जब स्त्रियों की संख्या बिलकुल घट गयी और पुरुषों को कुंवारा रहना पड़ा तो वे आस-पास के प्रांतों से राजपूत  परिवारों की लड़कियों को खरीदकर या अपहरण करके शादी लेते थे. फिर भी कन्या शिशु होने पर वे उसे मार देते थे क्योंकि ये प्रथा हैसियत का एक प्रतीक बन गयी थी.

बहरहाल, अमृतसर की उस सभा के बाद ब्रिटिश सरकार और भी चौकस हो गयी थी. सभी प्रयास  असफल होने लगे तो 1870 में एक अधिनियम पारित किया गया. 1870 का यह अधिनियम-VIII  कन्या शिशु हत्या रोकने के लिए एक ऐतिहासिक अधिनियम है. इसके द्वारा जिस गाँव में लड़कों की तुलना में लड़कियाँ  40 प्रतिशत या उससे कम हों, उसे संदिग्ध का दर्ज़ा  दिया गया. ऐसे गाँव सिर्फ संयुक्त प्रान्त (अब उत्तर प्रदेश) में 4959 थे. इन गावों में पुलिस, डॉक्टर और दाई की मदद से हर गर्भवती स्त्री पर नज़र रखी जाती थी. अगर कन्या शिशु का जन्म होता तो दाई का फर्ज़ होता था कि वह सरपंच को खबर दे. अगर बच्ची की मृत्यु हो जाये तो सरकारी डॉक्टर को मृत्यु का कारण लिखित रूप से देना पड़ता था. इस तरह की चौकसी के कारण 1890 तक सभी संदिग्ध गाँंवों में लड़कियों की संख्या लड़कों के बराबर हो गयी. 1906 में यह अधिनियम निरस्त कर दिया गया.

लेकिन जहाँ तक राष्ट्रीय अनुपात  का सवाल है , 1901 के बाद अपवादों को छोड़कर लड़कियों की संख्या गिरती ही गयी..

वैज्ञानिक, आर्थिक प्रगति और स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ने पर भी स्त्री के प्रति हज़ारो सालों से चले आ रहे दृष्टिकोण में कुछ खास फर्क नहीं आया है. आज आधुनिक तकनीकों से भी उलटा इसे प्रोत्साहन ही मिल रहा है.
आज कन्या शिशु की हत्या का स्थान कन्या भ्रूण हत्या ने ले लिया है. 1977 में भ्रूणहत्या के लिए एमनियोसेंटेसिस का इस्तेमाल पहली बार मुंबई के हरकिशनदास अस्पताल में किया गया था. इस अस्पताल में 1978 से 1992 के बीच 8000 स्त्रियों ने यह जांच अपने भ्रूण का लिंग पता करने के लिए ही कराई. अब जब ये जांच इतने सस्ते  में उपलब्ध है तो कन्या पैदा करने या रखने का कोई तुक नहीं है.  जिन घरों में बीसों लड़कियों को पाल लेने की क्षमता है, वे भी कन्या भ्रूण हत्या करवाते  हैं. 1988 में भ्रूण लिंग परीक्षण पर प्रतिबन्ध लगने के बाद 1989 में 1200 कन्या भ्रूणों की हत्या सिर्फ मुंबई के दो क्लीनिकों में की गयी (मानुषी, मार्च-अप्रैल, 1992). चंडीगढ़ की ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट (जून 23, 1993) के अनुसार हरियाणा  के सिरसा  जिले में सिर्फ एक क्लीनिक में प्रतिदिन लगभग 12 कन्या भ्रूणों का गर्भपात किया गया. अब जब भ्रूण के लिंग परीक्षण को निषिद्ध  कर दिया गया है तो सब कुछ बिना प्रमाण मौखिक  चलता है. अब तो दक्षिण भारत भी इसकी चपेट में आ चुका है.
पुरातनपंथी मानसिकता वाला हमारा आधुनिक समाज अपनी सुविधा के लिए असुंतलित  डिज़ाइनर परिवार बनाने को प्रोत्साहित कर रहा है...इसके नतीजे भी हमारे सामने आएंगे, पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.

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