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संकट का समय है नए अवसरों का समय

श्रीमद् भागवत में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं

हे पार्थ संकट का समय कैसा होता है यह विचार करने योग्य है.

यहां पर संकट का समय कैसा होता है? जिसका अर्थ है:

संकट का समय मनुष्य अपने विचारों,  अपनी आत्मा, अपने मन, अपने ह्रदय को शक्तिशाली बनाने पर केंद्रित करता है. वह संकट के इस समय में अपनी क्षमताओं और सामर्थ्य से ऊपर उठकर जीवन को उन्नत बनाने का प्रयास करता है. वह अपने ज्ञान को समृद्ध बनाने का प्रयास करता है. उसकी विवेकशीलता में आशातीत बढ़ोतरी होती है क्योंकि यही गुण उसको संकट के इस समय में बलवान बनाते हैं जो उसके आने वाले भविष्य के लिए मार्गदर्शक का कार्य करते हैं.  मनुष्य के जीवन में आया हुआ कष्ट का समय नए अवसरों  का भी गुलदस्ता लेकर आता है.  और यही अवसर   मनुष्य के जीवन को नई दशा और उन्नति की ओर ले कर जाते हैं.  और जो मनुष्य इस कष्ट के समय में नकारात्मक विचारों के समुद्र में डूब जाता है, जो हताशा का शिकार हो जाता है. ऐसे मनुष्य जीवन में कुछ भी नहीं कर पाते हैं वह सिर्फ हारे हुए व्यक्ति की भांति व्यवहार करते हैं और जीवन को नकारात्मक  भावो  के साथ जीने का प्रयास करते हैं उनके पास कुछ भी ना कर सकने के सैकड़ों बहाने होते हैं भविष्य के लिए.  वे अपने आसपास नकारात्मक विचारों की दुनिया बना लेते हैं और उनके संपर्क में आने वाला हर मनुष्य नकारात्मक विचारों से ग्रसित होने लगता है.  अतः ऐसे मनुष्य से भी दूर रहना चाहिए, जो सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक बातें करता हुआ अपनी असफलता के लिए बहाने देता रहे.

अतः पार्थ संकट का समय नए अवसर और अपने आप को मानसिक, शारीरिक स्तर पर समृद्ध बनाने का अवसर होता है जो हमारे आने वाले भविष्य के लिए सुखद होता है.

इसलिए मेरा मानना है कि सभी मनुष्यों को संकट के समय मैं अपने आप पर चिंतन करते हुए प्रत्येक दिशा एवं दशा के साथ समृद्ध बनाने का प्रयास करना चाहिए श्रीमद् भागवत में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह उपदेश प्रत्येक मानव के लिए विचारणीय है, यदि मनुष्य धैर्य के साथ व्यवहार करें एवं इसे जीवन में उतारने का प्रयास करें तो वह एक सफल एवं खुशहाल जीवन जी सकता है.

आज से ही ऐसे संकट के समय को नए अवसर के रूप में देखते हुए प्रयासरत हो जाएं.
अजय शर्मा " एकलव्य"

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