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भारत का पहला आम चुनाव

पहला आम चुनाव

हिंदुस्तान का पहला आम चुनाव कई चीजों के अलावा एक विश्वास का विषय था एक नया नया आजाद हुआ मुल्क सार्वभौमिक मताधिकार के तहत सीधे तौर पर अपने हुक्मरानों के चुनने जा रहा था. इसने वह रास्ता अख्तियार नहीं किया जो पश्चिमी देशों ने अख्तियार किया था वहां पहले कुछ संपत्ति शाली तबकों को ही मतदान का हक मिला था बहुत बाद तक वहां कामगारों और महिलाओं को मतदान हक्क नहीं मिला था लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा नहीं हुआ मुल्क 1947 में आजाद हुआ और इसके 2 सालों के बाद यहां एक चुनाव आयोग का गठन कर दिया गया.
मार्च 1950 में सुकुमार सेन को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया उसके अगले ही महीने जनप्रतिनिधि कानून संसद में पारित कर दिया गया इस कानून को पेश करते हुए संसद में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यह उम्मीद जाहिर की कि साल 1951 के बसंत तक चुनाव करवा लिए जाएंगे.
इस मामले में नेहरू की जल्दबाजी समझी जा सकती थी लेकिन जिस व्यक्ति के जिम्मे चुनाव करवाने का काम था उसके लिए यह मुश्किल काम था यह एक दुर्भाग्य जनक बात है कि हम सुकुमार सेन के बारे में बहुत नहीं जानते उन्होंने भी कोई संस्मरण या कोई दस्तावेज अपने पीछे नहीं छोड़ा जो हमें उनके बारे में ज्यादा बता सके सुकुमार सेन का जन्म 18 से 99 में हुआ था और उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज और लंदन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी लंदन यूनिवर्सिटी में उन्हें गोल्ड मेडल भी मिला था इसके बाद उन्होंने 1921 में इंडियन सिविल सर्विस जॉइन कर ली और कई जिलों में बतौर न्यायाधीश उनकी बहाली की गई बाद में वे पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव भी बने जहां से उन्हें प्रतिनियुक्ति पर मुख्य चुनाव आयुक्त बनाकर भेज दिया गया.
शायद सेन के अंतर का वह गणितीय ही था जिस ने नेहरू को कुछ दिन इंतजार करने के लिए कहा था क्योंकि भारत सरकार के किसी भी अधिकारी के पास इतना कठिन और विशाल काम नहीं था जो सुकुमार सेन को सौंपा गया था जरा हम यहां मतदाताओं की तादाद पर गौर करें उस चुनाव में मतदाताओं की कुल संख्या 17 करोड़ 60 लाख थी जिनकी उम्र 21 साल या उससे ऊपर थी और जिसमें से 85 फ़ीसदी ना तो पढ़ सकते थे और ना ही लिख सकते थे उनमें से हर एक की पहचान करनी थी उसका नाम लिखना था और उन्हें पंजीकृत करना था मतदाताओं का निबंधन तो महज पहला कदम था क्यों की समस्या यह थी कि अधिकांश अशिक्षित मतदाताओं के लिए पार्टी प्रतीक चिन्ह मतदान पत्र और मत पेटी किस तरह की बनाई जाए इसके बाद चुनाव के लिए मतदान केंद्र का भी चयन किया जाना था साथ ही इमानदार और सक्षम मतदान अधिकारी की भी नियुक्ति करनी थी इसके अलावा आम चुनावों के साथ ही राज्यों की विधानसभाओं के लिए भी चुनाव होने थे इस काम में सुकुमार सेन के साथ विभिन्न राज्यों में मुख्य चुनाव अधिकारी भी काम कर रहे थे जिनमें से अधिकांश अमूमन आईसीएस ऑफिसर ही थे.
आखिरकार सन 1952 के शुरुआती महीनों में चुनाव करवाया जाना तय हुआ हालांकि कुछ गुरु और सुदूर भर्ती जिलों में इस काम को पहले अंजाम दिया जाना था उस वक्त एक अमेरिकन पर्यवेक्षक में सही ही लिखा कि चुनाव में इस्तेमाल किए जाने वाले सामान और उपकरण बहुत बड़ी समस्या पैदा कर रहे हैं.
सुकुमार सेन के उद्यम को समझने में कुछ आंकड़े हमारी मदद कर सकते हैं कुल मिलाकर 4500 सीटों पर चुनाव होने जिनमें करीब 500 संसद के लिए थे और शेष प्रांतीय विधानसभाओं के थे इस चुनाव में 224000 मतदान केंद्र बनाए गए और वहां 2000000 इस्पात की मत पेटियां भेजी गई इन बेटियों को बनाने में 8200 टन इस्पात खर्च हुआ. 6 महीने के अनुबंध पर 16500 क्लर्क बहाल किए गए ताकि मतदाता सूची क्षेत्र व ढंग से टाइप किया जा सके और उनका मिलान किया जा सके मतदान पत्रों को छापने में करीब 380000 कागज के रिम इस्तेमाल किए गए.
चुनाव कार्य को संपादित करने के लिए 56 हजार पीठासीन अधिकारियों का चुनाव किया गया और इनकी सहायता के लिए 280000 सहायक बहाल किए गए इस चुनाव में सुरक्षा के लिए 224000 पुलिस के जवानों को बहाल किया गया ताकि हिंसा और मतदान केंद्रों पर गड़बड़ियों को रोका जा सके.

#Loksabhaelection2019
#ajaysharma

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