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whisky, smoke and beautiful


सुरा, सुटटा और सुंदरियां


खूबसूरत अंगुलियों में स्टाइल से फंसी हुई सिगरेट और दूसरे हाथ में जाम या फिर एक बेहद ही खूबसूरत लड़की अपने ही अंदाज में शराब को सिप करके पीते हुए और साथ ही सिगरेट का कश लगाती हुई हॉलीवुड और बॉलीवुड की फिल्मों में नजर आया करती थी। जब भी महिला पियक्कड़ किरदारों का जिक्र चलेगा तब साहेब बीवी और गुलाम की मीना कुमारी का नाम लिया जाएगा। वहीं सिगरेट के धुए के छल्ले बनाने की अदा का जिक्र चलेगा तो दम मारो दम फेम जीनत अमान का नाम याद किया जाएगा। आज यही सुरा- सुट्टा कल्चर मेट्रो और महानगरों की पहचान बनता जा रहा है।


यदि आपने आज से लगभग 10-15 साल पहले किसी युवती को सरेआम सिगरेट का कश लगाते हुए देखा होगा तो आपकी आंखे एक बारगी पथरा गई होंगी। सोच रहे होंगे कि ये क्या मंजर है? लेकिन आज मौजूदा परिदृश्य में एक बहुत ही मामूली सी बात लगती है। आज हर तीसरी लड़की के हाथ में सिगरेट नजर आती है। चाहे वह वर्कप्लेस या कैंटीन हो या फिर पान बीड़ी का खोखा। बस मौका मिलना चाहिए। कभी किटी पार्टियों में चाय चला करती थी और आज शराब व सिगरेट ने उसकी जगह ले ली है। तो आइए आज इसी सुरा सुट्टा और सुंदरियां के कल्चर पर गुफ्तगू करते हैं।

 एक वो वक्त था जब लोग चोरी छिपे शराब पीने के बाद अपने बुजुर्गों के सामने नहीं जाया करते थे। अगर किसी ने घर में शराब का नाम भी ले लिया तो उसे हिकारत की नजर से देखा जाता था और एक लम्बा लेक्चर उसे सुनाया जाता था। शराब और सिगरेट उस वक्त दो तरह के तबके में पी जाती थी। एक तो वो जो बहुत निचले तबके के कामगार लोग या फिर उच्च वर्ग के संभ्रांत लोग। मिडिल क्लास परिवार में इसे बुरी नजर से देखा जाता था। ये वो वक्त था जब सिगरेट भी चोरी छिपे पी जाती थी। मुंह और हाथ से बदबू चली जाए उसके लिए काफी जतन किए जाते थे। मुझे अभी तक याद है फिल्म “मैंने प्यार किया” का वो सीन जिसमें सिगरेट चुराने से लेकर पीने तक का फिल्मांकन और उसके बाद नायिका का नायक और उसके दोस्त को बचाने का प्रयास। उसके द्वारा स्मोकिंग छोड़ने की नसीहत। आज वही नायिका अपने हाथों में सिगरेट लिए है और अपने दोस्तों के साथ सिगरेट शेयर कर रही है। जमाना कितनी तेजी से बदला है दोस्तो।

आज यही सुरा-सुट्टा इस देश की सुंदरियों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। ये सुंदरियां बड़े ही अलग अंदाज में कह रही हैं कि हम हैं बिंदास और जीएंगे बिंदास। कॉरपोरेट सेक्टर की वर्किंग वुमेन, बड़े और रईस घराने की महिलाओं के साथ-साथ कॉलेज स्टूडेंट में भी इसके प्रति क्रेज देखा जा रहा है। इन लड़कियों का अपने फ्रेंडस के बीच में ऊंची आवाज में मस्त होकर कहना “ऑन द रॉक्स” एक मामूली सी बात हो गई है। अरे यार! चिल रहा करो! ऐसे शब्दों का सुनाई देना कोई हैरत वाली बात नहीं है।
इस सुरा-सुट्टा कल्चर पर सभी का अपना अपना नजरिया है। कोई मुझ से सहमत होगा और कोई नहीं होगा। फिलहाल हम बात को आगे बढ़ाते हैं और देखते हैं यह कल्चर कितनी तेजी से पनप रहा है और कहां कहां अपनी जड़ें जमा रहा है। किस तरह की महिलाएं और लड़कियां इसकी दीवानी हैं।
बात देश की राजधानी दिल्ली से शुरू करते हैं। आज दिल्ली एनसीआर में ऐसी कामकाजी और कॉलेज युवा छात्राओं की कमी नहीं है जो लगभग हर हफ्ते अपने दोस्तों के साथ वीकेंड पर मनोरंजन के लिए डिस्को, पब और बार में जाना पसंद करती हैं। शनिवार की रात मौजमस्ती के बाद रविवार को आराम और सोमवार से नई ऊर्जा के साथ फिर से जिंदगी की शुरुआत।

इस बारे में मैंने अपनी ही कुछ दोस्तों से बात की तो उन्होंने बताया कि वे सभी फ्रेंडस किस तरह ड्रिंक्स का प्लान बनाते हैं। सभी फ्रेंडस पहले यहां के कुछ अच्छे डिस्को, बार और पब के नाम पर डिस्कस करते हैं। उसमें से एक नाम को फाइनल करते हैं और फिर ऑन द रॉक्स और शराब के लम्बे दौर। उसने कहा कि कभी कभी तो हमारे साथ हमारे बॉय फ्रेंड भी होते हैं इस ड्रिंक पार्टी में। यदि कभी अचानक से पीने का मूड बन जाए तो किसी सहेली या फिर कार में प्रोग्राम बना लेते हैं। मैंने उससे बड़ी उत्सुकता से पूछा, अरे एक बात तो बताओ क्या तुम्हें इस तरह से शराब और सिगरेट पीना पसंद है। तो उसने तपाक से कहा कि नहीं यार बस आदत पड़ गई और अब अच्छा लगता है। जब मैंने कॉलेज जाना शुरू किया तो वहां के नये दोस्तों ने दबाव डाल कर शौकिया पीने को कहा। उसके बाद फिर ऐसा होने लगा और धीरे-धीरे आदत पड़ गई। अब तो जब भी मन करता है मैं पी लेती हूं। बस यार कभी-कभी आत्मग्लानि होती है। लेकिन आज यह कल्चर बन चुका है। जब भी टेंशन होती है तो सुट्टा लगा लेती हूं।

सुट्टेबाजी पर मुझे अपनी एक दोस्त का अनुभव याद आ रहा है जिसे मैं आपके साथ शेयर करुंगी। उसकी मीडिया में नई-नई नौकरी लगी थी। दूसरे दिन उसके सहकर्मियों ने उससे कहा कि यार लंच के बाद 4 बजे सुट्टेबाजी के लिए चलेंगे। ना-ना करते उसे सुट्टेबाजी की आदत पड़ ही गई। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह महिलाओं के बीच सुटटेबाजी का कल्चर अपनी जड़ें जमा रहा है।

इस सुरा सुट्टा कल्चर पर सभी की अलग-अलग राय है। कुछ महिलाओं का कहना है कि मर्द क्यों पीते हैं? जब मर्द पी सकते हैं तो हम क्यों नहीं।
कुछ लड़कियों का मानना है शादी से पहले जितना एंजॉय कर सकते हैं कर लें। पता नहीं पति कैसा मिले। इसलिए खुलकर जी रहे हैं। चिल यार! एंजॉय करो और मस्त रहो। कल जाने क्या हो। कुछ लड़कियों को सिगरेट और शराब की लत इसलिए पड़ गई क्योंकि उनके पेरेंटस भी पीते हैं और वे उनके साथ पीते भी हैं।

सुरा-सुट्टा कल्चर को लेकर अभी कुछ समय पहले एक रिपोर्ट आई थी जिसके मुताबिक बड़े शहरों की लगभग 30 फीसदी महिलाएं शराब और सिगरेट का सेवन करती हैं। जिसके पीछे एक ही ठोस वजह है और वह है महिलाओं का आर्थिक रुप से मजबूत होना। अच्छी नौकरी, मोटी सेलरी के साथ-साथ मल्टीनेशनल कंपनियों का वीकेंड कल्चर। जिसने यह बदलाव महिलाओं के जीवन में दिए। आज अमेरिकन कल्चर अपने चरम पर है। सुरा- सुटटा कल्चर ने धीरे-धीरे मध्यम वर्गीय महिलाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। कामकाजी महिलाओं का कहना है कि काम का बोझ ज्यादा होने के कारण मानसिक तनाव बहुत ज्यादा होता है। यही वजह है कि सिगरेट और शराब पीने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। इन लोगों का मानना है इससे मानसिक शांति और इसके बाद फ्रेशनेस के साथ नई ऊर्जा महसूस होती है। इन महिलाओं के मुताबिक जमाना बदल चुका है। हम बिंदास होकर जीना चाहते हैं। इसीलिए बिंदास जीते हैं और बिंदास पीते हैं। जिंदगी की हर उलझन को सिगरेट के धुएं में उड़ाते चल रहे हैं।

इस सुरा सुटटा कल्चर का आलम यह है कि कोई भी मौका हो चाहे वह जन्मदिन, वेडिंग एनिवर्सरी, शादी, तरक्की या फिर गम का मौका, बस हो जाए शराब और सिगरेट। इन महिलाओं के मुताबिक सुरा और सुट्टा शरीर और मन को सुख पहुंचाने का तरीका है।
चलिए अब बात करते हैं कि किस तरह की शराब इन महिलाओं को पसंद है। इनको स्वाद में कड़वी व्हिस्की और बीयर पसंद नहीं आती है। इन्हें ज्यादातर वोदका, ब्रीजर, रेड वाइन पसंद है। कुछ ऐसी भी महिलाए हैं जो बीयर और व्हिस्की पीना पसंद करती हैं। टीन एजर्स और कॉलेज स्टूडेंट में टकीला शॉटस काफी पसंद किया जाता है। इसमें उन्हें थ्रिल मिलता है।

यहां पर सोचने वाली बात यह है कि आखिरकार महिलाओं में यह सुरा सुटटा कल्चर कैसे पनपा। वे वजह क्या रहीं जिन्होंने उन्हें इस तरह के कल्चर को अपनाने को मजबूर कर दिया। इसका साफ सीधे तौर पर कारण जो हो सकता है वो है एकाकी जीवन, घर से दूर रहकर नौकरी करना, परिवार का दबाव और बंदिशों का न होना और आर्थिक रुप से मजबूती।

वैश्वीकरण के दौर में शहरों की संस्कृति तेजी के साथ बदल रही है। आधुनिकता की इस अंधी दौड़ ने शहरों की रातों को रंगीन बना दिया है। मुंबई और कलकत्ता के बाद दिल्ली एनसीआर इस तरह के कल्चर के लिए नाम रोशन कर रहा है। दोस्तों इसके साथ साथ सुरा-सुट्टा कल्चर के चलते इन महिलाओं और युवतियों के द्वारा किए जाने वाले एक्सीडेंट को भी माफ कर दें क्योंकि पीने के बाद मर्द भी तो एक्सीडेंट करते हैं।
लेकिन यह एक गंभीर विषय है कि मेटों शहरों में तेजी से पनपा यह कल्चर हमारे समाज और संस्कृति को कहां ले जा रहा है। इसके भविष्य में क्या परिणाम निकलेंगे।

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