अजय शर्मा
संपादक अणुव्रत एवं वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार
स्वर्णिम भारत की परिकल्पना अपने आप में ही सुख की अनुभूति देती है। आजादी से पहले और बाद दोनों ही कालचक्रों में इसकी परिकल्पना की गई। कभी इसे पुरूषोत्तम भगवान राम के देश के रूप में देखा गया तो कभी राष्टपिता महात्मा गांधी के देश के रूप में इसे देखा गया। आजादी के बाद से अब तक हमने महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर हिन्दुस्तान का निर्माण और विकास करने का प्रयत्न किया है। स्वर्णिम भारत के निर्माण में महात्मा गांधी जैसे समाज सुधारक के अलावा और भी ऐसे समाज सुधारक, युग द्रष्टा हुए हैं जिन्होंने एक सभ्य, खुशहाल एवं विकासशील देश के निर्माण में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। ये वो महापुरूष थे जिन्होंने इंसान को इंसान बनाने की कोशिशें की हैं। ऐसे महापुरूषों की श्रेणी में अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी और अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाप्रज्ञ हैं एवं वर्तमान में अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण हैं, जोकि पूरे देश में अपनी अहिंसा यात्रा पर हैं।
पिछले 71 सालों से भारत को स्वर्णिम भारत बनाने की पुरजोर कोशिशें की जा रही हैं। जिसमें समाज सुधारकों के साथ साथ भारतीय राजनीति के कुछ पुरोधाओं, राजनीतिज्ञों और दिग्गज नेताओं का भी अभूतपूर्व योगदान है। जिन्होंने इसे स्वर्णिम भारत बनाने के सपने देखे और इसे पूरा करने के लिए देशव्यापी आंदोलन चलाए।
भारत की वास्तविक स्थिति का जायजा लेने के लिए थोड़ा सा इतिहास को ख्ंागालते हैं। सबसे पहले आजादी से पहले के हालातों को समझते हैं कि उस वक्त का भारत कैसा भारत था। जिसे अंग्रेजी हुकूमत का हिन्दुस्तान कहा जाता था। इतिहास बताता है कि अंग्रजों ने हिन्दुस्तानियों पर जमकर जुल्म किए और जी भर कर हिन्दुस्तान को लूटा और अपने देश ब्रिटेन को मालामाल किया। आजादी की लंबी लड़ाई के बाद देश आजाद तो हुआ लेकिन भारत और पाकिस्तान दो राष्टों के दंश के रूप में। इस बंटवारे ने मानवता, इंसानियत और नैतिकता, प्राणियों में सदभावना का जो खून बहाया वो शायद ही किसी देश के बंटवारे के इतिहास में लिखा हुआ हो। इस बंटवारे में लाखों लोग इधर से उधर हुए जिन्हें अपनी जमीन, व्यापार और पशु वहीं छोड़ने पड़े। महिलाओं का बलात्कार हुआ, बलात्कार पीडि़ताओं को परिवार ने अपनाया नहीं और उन्हें वैश्यावृत्ति करनी पड़ी। कुछ महिलाओं को यौनदासी या रखैल के रूप में जीवन गुजारने पर मजबूर होना पड़ा।
आजाद हिन्दुस्तान में शरणर्थियों की स्थिति बद से बदतर थी। उनके लिए ना तो अस्पताल, आवास, रोजगार और शि़क्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं का बंदोबस्त किया गया था। लोग दिल्ली से लेकर पंजाब तक सड़कों, मंदिरों, मदरसों, रेलवे स्टेशन, पार्कों और खुले मैदानों में जीवन जीने को मजबूर थे। वहीं नया प्रशासन भ्रष्टाचार की गुफा में तब्दील हो चुका था। हर चीज की कीमत वसूली जा रही थी। ऐसा ही हाल कलकत्ता, मुंबई जैसे शहरों का भी था। ऐसे ही समय में देश को राष्टपिता महात्मा गांधी की हत्या एक बहुत बड़ा सदमा और झटका था।
महात्मा गांधी के बाद देश की राजनीति और नेतृत्व प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू के हाथों में थी जो बहुत ही मुश्किल भरे समय में देश का नेतृत्व कर रहे थे। भारत ने उनके कार्यकाल में बहुत से उतार चढाव देखे। पाकिस्तान और चीन के साथ युद्ध भी लड़े। जिसमें सैकड़ों सैनिकों की शहादत हुई। भारत ने नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, गुलजारी लाल नंदा, पी वी नरसिंहा राव, अटल बिहारी वाजपेई, मनमोहन सिंह जैसे योग्य प्रधानमंत्रियों का शासन भी देखा और जिया। अब वह वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सांसे ले रहा है। यह विडंबना ही है भारत की समस्याएं आज भी वहीं हैं जो 71 साल पहलें थी। आज भी देश भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, अमानवीयता, अनैतिकता, जात-पात और धार्मिक खूनी दंगे, अन्तरराज्य झगड़े और अवसरवादी राजनीति से जूझ रहा है। हमारे नागरिक भोजन, चिकित्सा, आवास, शिक्षा और सुरक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्षरत हैं।
अपना देश पिछले कई दशकों में खूनी दंगे और विवाद झेल चुका है। जिनमें 84 का दंगा, राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद, कावेरी जल विवाद, लिटटे विवाद, गुजराज का पटेल विवाद, गोधरा कांड, मुजफफरनगर दंगा, सहारानपुर दंगा ऐसे नाम हैं जो जुबान पर चढ़े हुए हैं। असम का बोडो विवाद कौन भूल सकता है। वर्तमान में हम जम्मू कश्मीर के खूनी दंगे फसाद और आतंकवाद को देख रहे हैं। आज मौजूदा समय में पूरा हिन्दुस्तान ऐसे अनगिनत विवादों और खूनी झड़पों का सामना कर रहा है कि कब कहां क्या हो जाएगा कुछ पता नहीं होता
ऐसा भी नहीं है कि हमने तरक्की नहीं की है। हम आज विकासशील देशों में गिने जाते हैं। बाजार की दृष्टि से हमारे देश में अपार संभावनाएं हैं। भारत में 19वीं सदी कलकत्ता के नाम से, 20वीं सदी मुबई के नाम से और 21वीं सदी दिल्ली के नाम से जानी जाती है, लेकिन वैश्विक स्तर पर शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, टेक्नोलॉजी, कला साहित्य, मीडिया, टांसपोर्ट और सुरक्षा के मामले में हम अभी कमजोर हैं।
ऐसे में भारत की मौजूदा स्थिति का आंकलन करें तो पाएंगे कि हमारा भारत संक्रमण काल से गुजर रहा है। भ्रष्टाचार, काला धन, बेरोजगारी, चिकित्सा, शिक्षा, आवास, सांप्रदायिकता और जन सुरक्षा में आधी आबादी का निशाने पर होना गंभीर मुददे हैं। इन समस्याओं के दुश्चक्र को केवल एक प्रगतिशील रणनीति के जरिए ही तोड़ा जा सकता है। जो लोगों तक अंतिम आदमी की पहुंच की बुनियाद पर टिकी हो।
लेकिन इन सभी समस्याओं के बीच एक सामाजिक समस्या भयानक दैत्य के रूप में विकराल होती जा रही है। जिस पर सरकार और लोगों का ध्यान कम गया है और यह है भीड़ की हिंसा। जिसे आप खून खराबे का उन्मादी तांडव भी कह सकते हैं। देश अपने भीतर जबरदस्त ढंग से चौकाने वाली एक हिंसक संघर्ष से जूझ रहा है। आम लोगों के हाथ अपने ही भाई बंधुओं के खून से रंग उठे हैं।
ये लोग युद्ध में शहीद हुए सैनिक नहीं थे, ये आम लोग भी नहीं थे। जिन्हें खतरनाक आंतकियों ने बर्बरता से कत्ल किया। न ही ये लोग बागी थे जिन्हें राज्य ने कुचल दिया हो। ये लोग थे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के हमलोग, जिनका प्रतिशोध की आग में झुलसते और रक्त के प्यासे लोगों ने बेरहमी से शिकार किया, पीटा और शारीरिक प्रताड़ना देते हुए मार डाला। इन लोगों के अंग भंग कर दिए गए और इन लोगों ने बहुत ही कष्टपूर्ण तरीके से अंतिम सांसें लीं। ये लोग अंतिम समय तक चीख-चीख कर अपने आपको निर्दाेष बताते रहे। जिदंगी की याचना करते रहे लेकिन शिकारियों का दिल नहीं पसीजा। वे उन्मांद में सबकुछ भूल चुके थे। मानवता, प्रेम, भाईचारा और नैतिकता से उनकी कोई रिश्तेदारी नहीं रह गई थी। ऐसे अपराधियों को परिभाषित करने के लिए अभी तक भारतीय दंड संहिता में जगह तक नहीं मिली है परंतु इसके लिए एक ही शब्द प्रयुक्त किया जाता है लीचिंग।
लीचिंग का अर्थ है भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति को गैरकानूनी ढंग से दिया गया प्राणदंड। आज पूरा देश ऐसी दिल दहला देने वाली भयावह दास्तानों की गूंज सुन रहा है। भीड़ द्वारा जघन्य घटनाओं की सूचनाएं हर जगह से आ रही हैं। जहां स्वयं देशवासी अपने ही लोगों की जान ले रहे हैं। कानून को एक तरफ दरकिनार कर दिया गया है। बंठिडा से लेकर अलवर, बल्लभगढ़ से लेकर रामगढ़ और श्रीनगर से लेकर लातेहार तक लोगों की प्रताड़ना और मौतों की भयावह वीडियो, तस्वीरें और रिपोर्टें तकरीबन हर हफते आ रही हैं। हमारे जन प्रतिनिधि, साधु संत और धर्मगुरू इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। बस एक बार गुजरात में हुए ऐसे हादसे पर प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा था कि दलितों के साथ ऐसा ना करें बल्कि मुझे गोली मार दें। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या इससे कोई हल निकला। जबकि होना ये चाहिए था कि प्रधानमंत्री को इस तरह के उन्मांद को नियंत्रित करने के लिए कुछ सार्थक और ठोस कदम उठाने चाहिए थे क्योंकि लोग सनक के आगोश में जा रहें हैं।
उन्मांद की इंतेहा
20 जून को बल्लभगढ़ के करीब एक लोकल टेन में एक मुसलमाल नवयुवक की भीड़ ने निर्मम हत्या कर दी। जिसने ऐसा भय का माहौल पैदा किया कि कुछ लोगों ने अपने आप को समाज में छिपाना शुरू कर दिया। इसका उदाहरण है यूपी के जिले अलीगढ़ रेलवे स्टेशन 42 वर्षीय नज्मुल हसन का बुर्का पहन कर निकलना। जिसका पता रेलवे पुलिस द्वारा संदिग्ध हरकतों के नाम पर जांच पड़ताल में चला। हसन ने पुलिसया पूछताछ में बताया कि बल्लभगढ़ जैसी घटनाओं ने उसके अंदर एक अंजाना डर पैदा कर दिया है और वो अपनी पहचान छिपा कर अपने आपको सुरक्षित कर लेना चाहता था। इसीलिए उसने बुर्का पहन कर औरत के रूप में बाहर निकलना उचित समझा।
क्या यही है भारत का भविष्य घ् अपना देश एक अंतहीन बहस के साथ चौराहे पर आ खड़ा हुआ है। कानूनी शब्दावली में लीचिंग का कोई अस्तित्व नहीं है। राष्टीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो केवल आईपीसी के तहत परिभाषित अपराधों का संग्रह और विश्लेषण करता है। इसलिए लीचिंग की इन घटनाओं का कोई सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद इन आपराधिक घटनाओं के पीछे की बुनियादी अवधारणा और इसके प्रवर्तकों की पहचान साफ होती जा रही है।
हिंसक उन्मांद
घटना न-1
क्या आप बल्लभगढ़ की घटना भूल सकते हैं। जिसमें तीन मुसलमान भाई शाकिर, हासिम और जुनैद के साथ दिल्ली-मथुरा पैसेजर टेन में सीट को लेकर हुए खूनी विवाद में 16 वर्षीय जुनैद को अपनी जान गंवानी पड़ी। क्योंकि ईद के खरीददारी के लिए निकले इन तीन भाईयों पर टैन में कुछ लोगों ने भीड़ की शक्ल लेकर हमला कर दिया और उस भीड़ में एक निजी सुरक्षाकर्मी नरेश ने कुछ दिन पहले ही खरीदे गए चाकू से जुनैद पर जान लेवा हमला कर दिया। भीड़ चीख चीख कर कहती रही कि अपने देश पाकिस्तान वापस चले जाओ।
घटना न 2
झारखंड के रामगढ़ में कुछ महीने पहले मारे गए मवैशी व्यापारी अलीमुददीन की बेटी शमा परवीन उस घटना को याद करते हुए बताती हैं कि वे लोग जब मेरे पिता को रॉड से पीट रहे थे तब कई लोग उनका वीडियो बना रहे थे। उनमें से एक आदमी ने उनका सिर कैमरे की तरफ मोड़ा।
घटना न 3
श्रीनगर के डीएसपी पंडित की हत्या सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा में रही। लोगों ने फेसबुक खूब इसकी भर्त्सना की। मीडिया रिपोर्ट में श्रीनगर के अधिकारी का बयान छपा था कि उसे नमाजियों ने नंगा करके खूब मारा। उसके हाथ और पैरों को मोड़ कर तोड़ दिया गया था, जैसे कोई चूसने के लिए गन्ना तोड़ता है। यह पहली बार हुआ है कि कश्मीर में लोगों ने पुलिस पर हमला किया और एक अधिकारी को मौत के घाट उतार दिया।
घटना न 4
झारखंड के गांव में बच्चा चोरी के नाम पर एक लड़के की उसके दादा और दादी के सामने ही भीड़ ने पीट पीटकर हत्या कर दी। उसके दादा दादी उसकी जानमाल की भीख मांगते रहे और वहां पर मौजूद पुलिस कर्मचारी मूक दर्शक बन तमाशा देखते रहे।
ऐसी घटनाओं से देश भरा हुआ है जहां पर भीड़ ने खूनी हिंसक खेल खेला है। पंजाब में भी तलवंडी साबो में डग डीलर विनोद कुमार को आरोप लगाकर मार दिया गया।
पिछले कुछ सालों के घटनाक्रम को यदि याद करें तो पाएंगे कि जून 2014 में एक युवा आई टी कर्मचारी के द्वारा फेसबुक पर अपमान जनक पोस्ट के लिए मारे जाने के बाद से लेकर अब तक लगभग 11 राज्यों से भीड़ की हिंसा यानी कि लीचिंग के लगभग 40-50 मामले रिपोर्ट हो चुके हैं। ये घटनाएं देश में खतरनाक ढंग से बढ़ रही हैं। पिछले मई और जून 2017 में तो लीचिंग के कई मामले सामने आए।
यह कितनी विडबना की बात है कि जो देश चींटी को भी खिलाने में विश्वास रखता हो, जो मुहल्ले में आवारा घूमते फिरते कुत्तों को भी कुछ ना कुछ खिलाने के लिए सोचता हो। जिस देश में सुबह उठकर नदी के तट पर, तालाब के तट पर मछलियों को खिलाने की परंपरा हो। जिस में महात्मा गांधी और अणुव्रत प्रर्वतक आचार्य श्री तुलसी जैसे महापुरूषों ने अहिंसा और नैतिकता का पाठ पढ़ाया हो। ऐसे देश को क्या हो गया घ्
मेरा मानना है कि लीचिंग में असामान्य तेजी यह बता रही है कि लोगों की अवधारणाएं तेजी से बदल रही हैं। समाज संक्रमणकाल से गुजर रहा है। मानवता, नैतिकता की भी हत्या हो चुकी है। सामूहिक हत्या की संस्कृति अब हाशिए से मुख्यधारा की ओर लौट रही है। पहले इस तरह की घटनाएं आदिवासी जनजीवन का हिस्सा हुआ करती थी। जहां पर पुलिस, कानून एवं सामाजिक व्यवस्था नाम की चीज़ नहीं होती थी।
इतिहास साक्षी है कि हिंसा हमारे समाज मेें आदिकाल से व्याप्त रही है। धीरे धीरे वह समाज की सतह के नीचे रहने लगी। जब जब उसे मौका मिला वह ज्वालामुखी के रूप में फूट कर बाहर निकली। लेकिन यह मनुष्य जीवन की विडंबना है कि उसने इसे कभी सही तरीके से इसे पहचाना नहीं। यदि इस पर किसी ने आवाज भी उठाई तो लोगों ने इस हिंसा को कुछ घृणित लोगों का विकृत व्यवहार समझते हुए नजरअंदाज कर दिया। जबकि समय समय पर महात्मा गांधी और आचार्य तुलसी जैसे महापुरूषों ने इस पर जनव्यापी आंदोलन चलाएं, जनमानस को प्रेरित करने की कोशिशें की। महात्मा गांधी ने अपने अहिंसक आंदोलन से भारत को अंग्रजों की गुलामी से आजाद करवाया और उसके बाद आचार्य तुलसी ने समाज सुधार और राष्ट निर्माण में अणुव्रत आंदोलन का प्रर्वतन किया। यह आंदोलन आज भी जारी है। आचार्य तुलसी उन समाज सुधारकों में से थे जिन्होंने इन भयावह परिस्थितियों को पहले ही भांप लिया था, जिसकी वजह से उन्होंने समाज को जागृत करने का बीड़ा उठाया। लेकिन लोग ऐसे रहे कि कुंभकरणी नींद भी उनके आगे असफल होती रही। ऐसा नहीं है कि लोग नहीं जागे, कुछ लोग अवश्य जागे, उन्होंने इस पर चर्चा भी की लेकिन सिर्फ चर्चा की, किया सिर्फ नाममात्र को। इस चर्चा पर स्वयं आचार्य तुलसी ने कभी अपने वकत्वय में कहा था कि अणुव्रत की चर्चा तो बहुत हो चुकी और हो रही है लेकिन अब कुछ ठोस कार्यों के क्रियान्वयन का समय है अन्यथा विलंब हो जाएगा।
जितना मैंने समझा है आजादी के 71 साल बाद भी समाज की मौजूदा परिस्थितियां इतनी विकट और दयनीय हैं कि लोग अंदर से उबल रहे हैं। जिसके लिए हमारा भ्रष्ट सिस्टम जिम्मेदार है। मैं नहीं समझता कि कोई भी समाज हिंसक या अहिंसक होता होगा, बहुत कुछ इस विषय पर भी निर्भर करता है कि कानून के अनुपालन में आप कितने संजीदा हैं। कानून कितना निष्पक्ष है। अभी मैं टीवी चैनल पर एक टयूशन टीचर को सरेराह एक पेरेण्टस के द्वारा पीटे जाने का मामला देख रहा था जो सोचने पर मजबूर करता है। सामाजिक अनदेखी हमारे यहां बहुत बडे पैमाने पर होती है। इसीलिए आचार्य तुलसी मौखिक अहिंसा को इतनी अहमियत देते थे। आज उन्हीं के देश में लीचिंग जैसी सामाजिक विकृति तेजी से पनप रही है और लोग मौन हैं। याद कीजिए कि लीचिंग के हादसों पर नेताओं, जनप्रतिनिधियों या साधु संत समाज ने कोई तुरंत प्रतिक्रिया दी हो, या उसे रोकने हेतु कोई सार्थक प्रयास किया हो। जिन्होंने इन हादसों में अपनों को खोया है उनके कोई आंसू भी पोछने गया हो। मुझे बड़े ही दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हत्यारों के देश में मुआवजे और कड़ी निंदा का चलन व्यवहार में है। हम कहां जा रहे हैं कुछ पता ही नहीं हैं।
दोस्तों लीचिंग एक दागदार परंपरा का हिस्सा है। लोग कानून को अपने हाथ में ले लेते हैं और वो सोचते हैं कि वो सही कर रहे हैं। जबकि ऐसा सोचना उनका भ्रम है। यदि इस देश में हमारे साधु-संत, नेता या जनप्रतिनिधि वाकई में अमन चैन स्थापित करना चाहते हैं तो उन्हें लीचिंग की रोकथाम के लिए कोशिशें करनी होगीं, लोगों के बीच जाकर काम करना होगा। यह काम सिर्फ नेताओं की ही जिम्मेदारी नहीं है यह सामाजिक संस्थाओं और सभी धर्म गुरूओं का भी दायित्व है कि वे समाज को इस विकृत हिंसा से निजात दिलाने हेतु संजीदगी से कार्य करें। हिंसा को रोकने में कानून का बहुत बड़ा योगदान है। कानून का भय भी उन्हें बांध सकता है। आज जो हिंसाएं हमें देखने और सुनने को मिलती हैं उसमें कानून लागू करने की असमर्थता के साथ साथ मानवता और नैतिकता को जीवन में ना उतार पाने की असमर्थता को दिखता है।
यह बात सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे कुछ लोग मिलकर सरेआम किसी की जान ले लेते है। कैसे कब कुछ लोग सैकड़ों की भीड़ तब्दील हो कर किसी को भी मारने पर आमादा हो जाते हैं। यह बात समझ में नहीं आती। यह बहुत ही गंभीर मसला है कि भीड़ का हिस्सा होने पर कैसे एक आम आदमी राक्षस बन जाता है, जानवर बन जाता है। इससे यह समझ में आता है कि लीचिंग और दंगे भड़कने के लिए अपराधियों की आवश्यकता नहीं होती बस एक चिंगारी भड़कने की देर होती है।
आज अपना देश आजादी के 71वें साल में जश्न मना रहा है। वहीं आम आदमी अपनी कमाई, जीवन स्तर, अपने रिश्तों, नेताओं, बेरोजगारी, स्वास्थय, सेवा, अच्छी शिक्षा और अच्छे अवसरों के मामले में गुस्से की चपेट में है। ऐसे में आक्रोश मनुष्य की चेतना को भ्रमित कर देता है। डर जब जरूरत से ज्यादा बड़ जाए तो लोग कानून अपने हाथ में लेने लग जाते हैं। लींिचंग बहुत ही चिंता का विषय है। जिस पर तुरंत कुछ करने की आवश्यकता है। मैं तो कहूंगा कि मनुष्य जीवन को खुशहाल बनाने के लिए एक स्वस्थ जीवन शैली की आवश्यकता है और इसके लिए जरूरी है एक सार्थक आचार संहिता। यदि आप अणुव्रत आचार संहिता का अध्ययन करें तो पाएंगे कि यह जीवन को उन्नत एवं खुशहाल बनाने की कुंजी है। यदि मानव जीवन खुशहाल होगा तो स्वर्णिम भारत की परिकल्पना पूरी हो सकती है। इस परिकल्पना की आधार शिला अणुव्रत सिद्ध होगी ऐसा मेरा विश्वास है।
संपादक अणुव्रत एवं वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार
स्वर्णिम भारत की परिकल्पना अपने आप में ही सुख की अनुभूति देती है। आजादी से पहले और बाद दोनों ही कालचक्रों में इसकी परिकल्पना की गई। कभी इसे पुरूषोत्तम भगवान राम के देश के रूप में देखा गया तो कभी राष्टपिता महात्मा गांधी के देश के रूप में इसे देखा गया। आजादी के बाद से अब तक हमने महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर हिन्दुस्तान का निर्माण और विकास करने का प्रयत्न किया है। स्वर्णिम भारत के निर्माण में महात्मा गांधी जैसे समाज सुधारक के अलावा और भी ऐसे समाज सुधारक, युग द्रष्टा हुए हैं जिन्होंने एक सभ्य, खुशहाल एवं विकासशील देश के निर्माण में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। ये वो महापुरूष थे जिन्होंने इंसान को इंसान बनाने की कोशिशें की हैं। ऐसे महापुरूषों की श्रेणी में अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी और अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाप्रज्ञ हैं एवं वर्तमान में अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण हैं, जोकि पूरे देश में अपनी अहिंसा यात्रा पर हैं।
पिछले 71 सालों से भारत को स्वर्णिम भारत बनाने की पुरजोर कोशिशें की जा रही हैं। जिसमें समाज सुधारकों के साथ साथ भारतीय राजनीति के कुछ पुरोधाओं, राजनीतिज्ञों और दिग्गज नेताओं का भी अभूतपूर्व योगदान है। जिन्होंने इसे स्वर्णिम भारत बनाने के सपने देखे और इसे पूरा करने के लिए देशव्यापी आंदोलन चलाए।
भारत की वास्तविक स्थिति का जायजा लेने के लिए थोड़ा सा इतिहास को ख्ंागालते हैं। सबसे पहले आजादी से पहले के हालातों को समझते हैं कि उस वक्त का भारत कैसा भारत था। जिसे अंग्रेजी हुकूमत का हिन्दुस्तान कहा जाता था। इतिहास बताता है कि अंग्रजों ने हिन्दुस्तानियों पर जमकर जुल्म किए और जी भर कर हिन्दुस्तान को लूटा और अपने देश ब्रिटेन को मालामाल किया। आजादी की लंबी लड़ाई के बाद देश आजाद तो हुआ लेकिन भारत और पाकिस्तान दो राष्टों के दंश के रूप में। इस बंटवारे ने मानवता, इंसानियत और नैतिकता, प्राणियों में सदभावना का जो खून बहाया वो शायद ही किसी देश के बंटवारे के इतिहास में लिखा हुआ हो। इस बंटवारे में लाखों लोग इधर से उधर हुए जिन्हें अपनी जमीन, व्यापार और पशु वहीं छोड़ने पड़े। महिलाओं का बलात्कार हुआ, बलात्कार पीडि़ताओं को परिवार ने अपनाया नहीं और उन्हें वैश्यावृत्ति करनी पड़ी। कुछ महिलाओं को यौनदासी या रखैल के रूप में जीवन गुजारने पर मजबूर होना पड़ा।
आजाद हिन्दुस्तान में शरणर्थियों की स्थिति बद से बदतर थी। उनके लिए ना तो अस्पताल, आवास, रोजगार और शि़क्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं का बंदोबस्त किया गया था। लोग दिल्ली से लेकर पंजाब तक सड़कों, मंदिरों, मदरसों, रेलवे स्टेशन, पार्कों और खुले मैदानों में जीवन जीने को मजबूर थे। वहीं नया प्रशासन भ्रष्टाचार की गुफा में तब्दील हो चुका था। हर चीज की कीमत वसूली जा रही थी। ऐसा ही हाल कलकत्ता, मुंबई जैसे शहरों का भी था। ऐसे ही समय में देश को राष्टपिता महात्मा गांधी की हत्या एक बहुत बड़ा सदमा और झटका था।
महात्मा गांधी के बाद देश की राजनीति और नेतृत्व प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू के हाथों में थी जो बहुत ही मुश्किल भरे समय में देश का नेतृत्व कर रहे थे। भारत ने उनके कार्यकाल में बहुत से उतार चढाव देखे। पाकिस्तान और चीन के साथ युद्ध भी लड़े। जिसमें सैकड़ों सैनिकों की शहादत हुई। भारत ने नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, गुलजारी लाल नंदा, पी वी नरसिंहा राव, अटल बिहारी वाजपेई, मनमोहन सिंह जैसे योग्य प्रधानमंत्रियों का शासन भी देखा और जिया। अब वह वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सांसे ले रहा है। यह विडंबना ही है भारत की समस्याएं आज भी वहीं हैं जो 71 साल पहलें थी। आज भी देश भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, अमानवीयता, अनैतिकता, जात-पात और धार्मिक खूनी दंगे, अन्तरराज्य झगड़े और अवसरवादी राजनीति से जूझ रहा है। हमारे नागरिक भोजन, चिकित्सा, आवास, शिक्षा और सुरक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्षरत हैं।
अपना देश पिछले कई दशकों में खूनी दंगे और विवाद झेल चुका है। जिनमें 84 का दंगा, राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद, कावेरी जल विवाद, लिटटे विवाद, गुजराज का पटेल विवाद, गोधरा कांड, मुजफफरनगर दंगा, सहारानपुर दंगा ऐसे नाम हैं जो जुबान पर चढ़े हुए हैं। असम का बोडो विवाद कौन भूल सकता है। वर्तमान में हम जम्मू कश्मीर के खूनी दंगे फसाद और आतंकवाद को देख रहे हैं। आज मौजूदा समय में पूरा हिन्दुस्तान ऐसे अनगिनत विवादों और खूनी झड़पों का सामना कर रहा है कि कब कहां क्या हो जाएगा कुछ पता नहीं होता
ऐसा भी नहीं है कि हमने तरक्की नहीं की है। हम आज विकासशील देशों में गिने जाते हैं। बाजार की दृष्टि से हमारे देश में अपार संभावनाएं हैं। भारत में 19वीं सदी कलकत्ता के नाम से, 20वीं सदी मुबई के नाम से और 21वीं सदी दिल्ली के नाम से जानी जाती है, लेकिन वैश्विक स्तर पर शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, टेक्नोलॉजी, कला साहित्य, मीडिया, टांसपोर्ट और सुरक्षा के मामले में हम अभी कमजोर हैं।
ऐसे में भारत की मौजूदा स्थिति का आंकलन करें तो पाएंगे कि हमारा भारत संक्रमण काल से गुजर रहा है। भ्रष्टाचार, काला धन, बेरोजगारी, चिकित्सा, शिक्षा, आवास, सांप्रदायिकता और जन सुरक्षा में आधी आबादी का निशाने पर होना गंभीर मुददे हैं। इन समस्याओं के दुश्चक्र को केवल एक प्रगतिशील रणनीति के जरिए ही तोड़ा जा सकता है। जो लोगों तक अंतिम आदमी की पहुंच की बुनियाद पर टिकी हो।
लेकिन इन सभी समस्याओं के बीच एक सामाजिक समस्या भयानक दैत्य के रूप में विकराल होती जा रही है। जिस पर सरकार और लोगों का ध्यान कम गया है और यह है भीड़ की हिंसा। जिसे आप खून खराबे का उन्मादी तांडव भी कह सकते हैं। देश अपने भीतर जबरदस्त ढंग से चौकाने वाली एक हिंसक संघर्ष से जूझ रहा है। आम लोगों के हाथ अपने ही भाई बंधुओं के खून से रंग उठे हैं।
ये लोग युद्ध में शहीद हुए सैनिक नहीं थे, ये आम लोग भी नहीं थे। जिन्हें खतरनाक आंतकियों ने बर्बरता से कत्ल किया। न ही ये लोग बागी थे जिन्हें राज्य ने कुचल दिया हो। ये लोग थे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के हमलोग, जिनका प्रतिशोध की आग में झुलसते और रक्त के प्यासे लोगों ने बेरहमी से शिकार किया, पीटा और शारीरिक प्रताड़ना देते हुए मार डाला। इन लोगों के अंग भंग कर दिए गए और इन लोगों ने बहुत ही कष्टपूर्ण तरीके से अंतिम सांसें लीं। ये लोग अंतिम समय तक चीख-चीख कर अपने आपको निर्दाेष बताते रहे। जिदंगी की याचना करते रहे लेकिन शिकारियों का दिल नहीं पसीजा। वे उन्मांद में सबकुछ भूल चुके थे। मानवता, प्रेम, भाईचारा और नैतिकता से उनकी कोई रिश्तेदारी नहीं रह गई थी। ऐसे अपराधियों को परिभाषित करने के लिए अभी तक भारतीय दंड संहिता में जगह तक नहीं मिली है परंतु इसके लिए एक ही शब्द प्रयुक्त किया जाता है लीचिंग।
लीचिंग का अर्थ है भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति को गैरकानूनी ढंग से दिया गया प्राणदंड। आज पूरा देश ऐसी दिल दहला देने वाली भयावह दास्तानों की गूंज सुन रहा है। भीड़ द्वारा जघन्य घटनाओं की सूचनाएं हर जगह से आ रही हैं। जहां स्वयं देशवासी अपने ही लोगों की जान ले रहे हैं। कानून को एक तरफ दरकिनार कर दिया गया है। बंठिडा से लेकर अलवर, बल्लभगढ़ से लेकर रामगढ़ और श्रीनगर से लेकर लातेहार तक लोगों की प्रताड़ना और मौतों की भयावह वीडियो, तस्वीरें और रिपोर्टें तकरीबन हर हफते आ रही हैं। हमारे जन प्रतिनिधि, साधु संत और धर्मगुरू इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। बस एक बार गुजरात में हुए ऐसे हादसे पर प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा था कि दलितों के साथ ऐसा ना करें बल्कि मुझे गोली मार दें। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या इससे कोई हल निकला। जबकि होना ये चाहिए था कि प्रधानमंत्री को इस तरह के उन्मांद को नियंत्रित करने के लिए कुछ सार्थक और ठोस कदम उठाने चाहिए थे क्योंकि लोग सनक के आगोश में जा रहें हैं।
उन्मांद की इंतेहा
20 जून को बल्लभगढ़ के करीब एक लोकल टेन में एक मुसलमाल नवयुवक की भीड़ ने निर्मम हत्या कर दी। जिसने ऐसा भय का माहौल पैदा किया कि कुछ लोगों ने अपने आप को समाज में छिपाना शुरू कर दिया। इसका उदाहरण है यूपी के जिले अलीगढ़ रेलवे स्टेशन 42 वर्षीय नज्मुल हसन का बुर्का पहन कर निकलना। जिसका पता रेलवे पुलिस द्वारा संदिग्ध हरकतों के नाम पर जांच पड़ताल में चला। हसन ने पुलिसया पूछताछ में बताया कि बल्लभगढ़ जैसी घटनाओं ने उसके अंदर एक अंजाना डर पैदा कर दिया है और वो अपनी पहचान छिपा कर अपने आपको सुरक्षित कर लेना चाहता था। इसीलिए उसने बुर्का पहन कर औरत के रूप में बाहर निकलना उचित समझा।
क्या यही है भारत का भविष्य घ् अपना देश एक अंतहीन बहस के साथ चौराहे पर आ खड़ा हुआ है। कानूनी शब्दावली में लीचिंग का कोई अस्तित्व नहीं है। राष्टीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो केवल आईपीसी के तहत परिभाषित अपराधों का संग्रह और विश्लेषण करता है। इसलिए लीचिंग की इन घटनाओं का कोई सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद इन आपराधिक घटनाओं के पीछे की बुनियादी अवधारणा और इसके प्रवर्तकों की पहचान साफ होती जा रही है।
हिंसक उन्मांद
घटना न-1
क्या आप बल्लभगढ़ की घटना भूल सकते हैं। जिसमें तीन मुसलमान भाई शाकिर, हासिम और जुनैद के साथ दिल्ली-मथुरा पैसेजर टेन में सीट को लेकर हुए खूनी विवाद में 16 वर्षीय जुनैद को अपनी जान गंवानी पड़ी। क्योंकि ईद के खरीददारी के लिए निकले इन तीन भाईयों पर टैन में कुछ लोगों ने भीड़ की शक्ल लेकर हमला कर दिया और उस भीड़ में एक निजी सुरक्षाकर्मी नरेश ने कुछ दिन पहले ही खरीदे गए चाकू से जुनैद पर जान लेवा हमला कर दिया। भीड़ चीख चीख कर कहती रही कि अपने देश पाकिस्तान वापस चले जाओ।
घटना न 2
झारखंड के रामगढ़ में कुछ महीने पहले मारे गए मवैशी व्यापारी अलीमुददीन की बेटी शमा परवीन उस घटना को याद करते हुए बताती हैं कि वे लोग जब मेरे पिता को रॉड से पीट रहे थे तब कई लोग उनका वीडियो बना रहे थे। उनमें से एक आदमी ने उनका सिर कैमरे की तरफ मोड़ा।
घटना न 3
श्रीनगर के डीएसपी पंडित की हत्या सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा में रही। लोगों ने फेसबुक खूब इसकी भर्त्सना की। मीडिया रिपोर्ट में श्रीनगर के अधिकारी का बयान छपा था कि उसे नमाजियों ने नंगा करके खूब मारा। उसके हाथ और पैरों को मोड़ कर तोड़ दिया गया था, जैसे कोई चूसने के लिए गन्ना तोड़ता है। यह पहली बार हुआ है कि कश्मीर में लोगों ने पुलिस पर हमला किया और एक अधिकारी को मौत के घाट उतार दिया।
घटना न 4
झारखंड के गांव में बच्चा चोरी के नाम पर एक लड़के की उसके दादा और दादी के सामने ही भीड़ ने पीट पीटकर हत्या कर दी। उसके दादा दादी उसकी जानमाल की भीख मांगते रहे और वहां पर मौजूद पुलिस कर्मचारी मूक दर्शक बन तमाशा देखते रहे।
ऐसी घटनाओं से देश भरा हुआ है जहां पर भीड़ ने खूनी हिंसक खेल खेला है। पंजाब में भी तलवंडी साबो में डग डीलर विनोद कुमार को आरोप लगाकर मार दिया गया।
पिछले कुछ सालों के घटनाक्रम को यदि याद करें तो पाएंगे कि जून 2014 में एक युवा आई टी कर्मचारी के द्वारा फेसबुक पर अपमान जनक पोस्ट के लिए मारे जाने के बाद से लेकर अब तक लगभग 11 राज्यों से भीड़ की हिंसा यानी कि लीचिंग के लगभग 40-50 मामले रिपोर्ट हो चुके हैं। ये घटनाएं देश में खतरनाक ढंग से बढ़ रही हैं। पिछले मई और जून 2017 में तो लीचिंग के कई मामले सामने आए।
यह कितनी विडबना की बात है कि जो देश चींटी को भी खिलाने में विश्वास रखता हो, जो मुहल्ले में आवारा घूमते फिरते कुत्तों को भी कुछ ना कुछ खिलाने के लिए सोचता हो। जिस देश में सुबह उठकर नदी के तट पर, तालाब के तट पर मछलियों को खिलाने की परंपरा हो। जिस में महात्मा गांधी और अणुव्रत प्रर्वतक आचार्य श्री तुलसी जैसे महापुरूषों ने अहिंसा और नैतिकता का पाठ पढ़ाया हो। ऐसे देश को क्या हो गया घ्
मेरा मानना है कि लीचिंग में असामान्य तेजी यह बता रही है कि लोगों की अवधारणाएं तेजी से बदल रही हैं। समाज संक्रमणकाल से गुजर रहा है। मानवता, नैतिकता की भी हत्या हो चुकी है। सामूहिक हत्या की संस्कृति अब हाशिए से मुख्यधारा की ओर लौट रही है। पहले इस तरह की घटनाएं आदिवासी जनजीवन का हिस्सा हुआ करती थी। जहां पर पुलिस, कानून एवं सामाजिक व्यवस्था नाम की चीज़ नहीं होती थी।
इतिहास साक्षी है कि हिंसा हमारे समाज मेें आदिकाल से व्याप्त रही है। धीरे धीरे वह समाज की सतह के नीचे रहने लगी। जब जब उसे मौका मिला वह ज्वालामुखी के रूप में फूट कर बाहर निकली। लेकिन यह मनुष्य जीवन की विडंबना है कि उसने इसे कभी सही तरीके से इसे पहचाना नहीं। यदि इस पर किसी ने आवाज भी उठाई तो लोगों ने इस हिंसा को कुछ घृणित लोगों का विकृत व्यवहार समझते हुए नजरअंदाज कर दिया। जबकि समय समय पर महात्मा गांधी और आचार्य तुलसी जैसे महापुरूषों ने इस पर जनव्यापी आंदोलन चलाएं, जनमानस को प्रेरित करने की कोशिशें की। महात्मा गांधी ने अपने अहिंसक आंदोलन से भारत को अंग्रजों की गुलामी से आजाद करवाया और उसके बाद आचार्य तुलसी ने समाज सुधार और राष्ट निर्माण में अणुव्रत आंदोलन का प्रर्वतन किया। यह आंदोलन आज भी जारी है। आचार्य तुलसी उन समाज सुधारकों में से थे जिन्होंने इन भयावह परिस्थितियों को पहले ही भांप लिया था, जिसकी वजह से उन्होंने समाज को जागृत करने का बीड़ा उठाया। लेकिन लोग ऐसे रहे कि कुंभकरणी नींद भी उनके आगे असफल होती रही। ऐसा नहीं है कि लोग नहीं जागे, कुछ लोग अवश्य जागे, उन्होंने इस पर चर्चा भी की लेकिन सिर्फ चर्चा की, किया सिर्फ नाममात्र को। इस चर्चा पर स्वयं आचार्य तुलसी ने कभी अपने वकत्वय में कहा था कि अणुव्रत की चर्चा तो बहुत हो चुकी और हो रही है लेकिन अब कुछ ठोस कार्यों के क्रियान्वयन का समय है अन्यथा विलंब हो जाएगा।
जितना मैंने समझा है आजादी के 71 साल बाद भी समाज की मौजूदा परिस्थितियां इतनी विकट और दयनीय हैं कि लोग अंदर से उबल रहे हैं। जिसके लिए हमारा भ्रष्ट सिस्टम जिम्मेदार है। मैं नहीं समझता कि कोई भी समाज हिंसक या अहिंसक होता होगा, बहुत कुछ इस विषय पर भी निर्भर करता है कि कानून के अनुपालन में आप कितने संजीदा हैं। कानून कितना निष्पक्ष है। अभी मैं टीवी चैनल पर एक टयूशन टीचर को सरेराह एक पेरेण्टस के द्वारा पीटे जाने का मामला देख रहा था जो सोचने पर मजबूर करता है। सामाजिक अनदेखी हमारे यहां बहुत बडे पैमाने पर होती है। इसीलिए आचार्य तुलसी मौखिक अहिंसा को इतनी अहमियत देते थे। आज उन्हीं के देश में लीचिंग जैसी सामाजिक विकृति तेजी से पनप रही है और लोग मौन हैं। याद कीजिए कि लीचिंग के हादसों पर नेताओं, जनप्रतिनिधियों या साधु संत समाज ने कोई तुरंत प्रतिक्रिया दी हो, या उसे रोकने हेतु कोई सार्थक प्रयास किया हो। जिन्होंने इन हादसों में अपनों को खोया है उनके कोई आंसू भी पोछने गया हो। मुझे बड़े ही दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हत्यारों के देश में मुआवजे और कड़ी निंदा का चलन व्यवहार में है। हम कहां जा रहे हैं कुछ पता ही नहीं हैं।
दोस्तों लीचिंग एक दागदार परंपरा का हिस्सा है। लोग कानून को अपने हाथ में ले लेते हैं और वो सोचते हैं कि वो सही कर रहे हैं। जबकि ऐसा सोचना उनका भ्रम है। यदि इस देश में हमारे साधु-संत, नेता या जनप्रतिनिधि वाकई में अमन चैन स्थापित करना चाहते हैं तो उन्हें लीचिंग की रोकथाम के लिए कोशिशें करनी होगीं, लोगों के बीच जाकर काम करना होगा। यह काम सिर्फ नेताओं की ही जिम्मेदारी नहीं है यह सामाजिक संस्थाओं और सभी धर्म गुरूओं का भी दायित्व है कि वे समाज को इस विकृत हिंसा से निजात दिलाने हेतु संजीदगी से कार्य करें। हिंसा को रोकने में कानून का बहुत बड़ा योगदान है। कानून का भय भी उन्हें बांध सकता है। आज जो हिंसाएं हमें देखने और सुनने को मिलती हैं उसमें कानून लागू करने की असमर्थता के साथ साथ मानवता और नैतिकता को जीवन में ना उतार पाने की असमर्थता को दिखता है।
यह बात सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे कुछ लोग मिलकर सरेआम किसी की जान ले लेते है। कैसे कब कुछ लोग सैकड़ों की भीड़ तब्दील हो कर किसी को भी मारने पर आमादा हो जाते हैं। यह बात समझ में नहीं आती। यह बहुत ही गंभीर मसला है कि भीड़ का हिस्सा होने पर कैसे एक आम आदमी राक्षस बन जाता है, जानवर बन जाता है। इससे यह समझ में आता है कि लीचिंग और दंगे भड़कने के लिए अपराधियों की आवश्यकता नहीं होती बस एक चिंगारी भड़कने की देर होती है।
आज अपना देश आजादी के 71वें साल में जश्न मना रहा है। वहीं आम आदमी अपनी कमाई, जीवन स्तर, अपने रिश्तों, नेताओं, बेरोजगारी, स्वास्थय, सेवा, अच्छी शिक्षा और अच्छे अवसरों के मामले में गुस्से की चपेट में है। ऐसे में आक्रोश मनुष्य की चेतना को भ्रमित कर देता है। डर जब जरूरत से ज्यादा बड़ जाए तो लोग कानून अपने हाथ में लेने लग जाते हैं। लींिचंग बहुत ही चिंता का विषय है। जिस पर तुरंत कुछ करने की आवश्यकता है। मैं तो कहूंगा कि मनुष्य जीवन को खुशहाल बनाने के लिए एक स्वस्थ जीवन शैली की आवश्यकता है और इसके लिए जरूरी है एक सार्थक आचार संहिता। यदि आप अणुव्रत आचार संहिता का अध्ययन करें तो पाएंगे कि यह जीवन को उन्नत एवं खुशहाल बनाने की कुंजी है। यदि मानव जीवन खुशहाल होगा तो स्वर्णिम भारत की परिकल्पना पूरी हो सकती है। इस परिकल्पना की आधार शिला अणुव्रत सिद्ध होगी ऐसा मेरा विश्वास है।
Comments