अजय शर्मा
पता नहीं कैसा दिन था जब उस उदास शाम की रौशनी में अपने मन और दिल को समेटे ने सोनाली ने तेज धड़कते दिल के साथ होटल की लॉबी में प्रवेश किया। हर कदम के साथ उसके दिल की धड़कन तेज होती जा रही थी। सोनाली वो नहीं देखना चाहती थी जिसकी आशंका से उसका दिल तेजी से धौंकनी की तरह धड़क रहा था। थोड़ी ही देर में वो अनिल के कमरे के सामने खड़ी थी। सोनाली ने कंपकपाते हाथों से डोर बेल बजाई। थोड़ी देर बाद अधनंगी हालत में अनिल दरवाजे पर प्रकट हुआ। सोनाली अनिल को धक्का देते हुए अंदर जा पहुंची। उसने अंदर जो देखा उसे देखकर वो गुस्से थर थर कांपने लगी। सोनाली की गुस्से भरी चीखों से पूरा कमरा गूंजने लगा। जिसका प्रतिकार अनिल ने सोनाली को बुरी तरह पीट कर किया। जिसमें सोनाली के हाथ की अंगुलियां तक टूट गईं।
इस अपमान का जहर पीकर सोनाली जब वहां से लौटी तो अंधेरा आगे था, शाम पीछे। पैर आगे थे, मन पीछे। जिदंगी में एक बार फिर उसने इस अंधेरे को अपने अंदर तक महसूस किया। मौसम ठंडा था लेकिन भीतर इतनी गरम बहस चल रही थी कि विचारों के फरिश्ते भाप बन जहां-तहां उड़ रहे थे। वह कब घर पहुंच गई उसे पता ही नहीं चला। तेजी से वह अपने कमरे में गई और अपने आपको बंद कर लिया। इसके बाद सोनाली ने जो फूट फूट कर रोना शुरू किया। उसे पता ही नहीं चला कब सुबह के सूरज ने रात के अंधेरे को निगल लिया। सुबह उसका चेहरा साफ बयां कर रहा था कि कैसा तूफान उसकी जिदंगी में आया है। यह तूफान त्रासदी के रूप में बेबसी, उदासी, लाचारी और यातना के निशान उसकी आंखों में छोड़ गया था। उसकी आंखों की कोर पर आंसू ठिठके हुए थे और वह पूरे परिवार के सामने उन आंसुओं से युद्ध कर रही थी।
सोनाली इन दिनों एक अजीब सी कैरेक्टर हो गई थी--- आधी रात को उठ-उठकर अपने आप से ही बतियाने लगती तो कभी फूट-फूटकर रोने लगती। उसे खुद याद नहीं, यह सिलसिला कितने दिनों तक चला। धीरे-धीरे आंसूओं की नदी का बहाव भी धीमा सा पड़ने लगा।
लेकिन सोनाली को बीते दिनों की यादें बैचेन रखतीं। न रात को सोने देती और ना दिन में सकून से बैठने देतीं। वह एकाएक हिलग-हिलग कर रोने लगती, भीतर की ना जाने कितनी चट्टानों को फोड़कर यह आर्तनाद निकल पड़ता था। अनिल की यादों से उत्पन्न बेचैनी, अवसाद और यंत्रणा इतनी बढ़ गई थी कि उसकी देह उसके चोले में नहीं आ रही थी। वह बेड की कोर से माथा भिड़ा-भिड़ाकर रोने लगती। ढुलकती आधी रात की निस्तब्धता में एक पूर्ण स्त्री का इस कदर बिलखना जिदंगी का कोई भी क्षण इससे ज्यादा भयावह और दिल दहला देने वाला नहीं हो सकता।
सुबकते-सुबकते वह अपने आप से ही कह उठती कि यदि लाख साल जी लूं मैं और लाख जन्म ले लूं तो भी अनिल को भूला नहीं पाउंगी। कोई यह तो बताए मुझे, दुनिया में पुरूष इतना नीचे कैसे गिर सकता है, वो कैसे जानवर बन सकता है कि कोई औरत चाहकर भी जी ना सके। कभी भी उसकी यादों के सर्पीले सांप उसके दिल के अंदर इधर-उधर रेंगने लगते। कब कौन सी याद उसे डस लेती उसे पता ही नहीं चलता।
उसे आज भी याद है वो अनिल से पहली बार कैसे मिली। उसे अपने बिजनेस के सिलसिले में पेरिस जाना था। मंुबई एयरपोर्ट पर अपनी फलाइट के इंतजार में सोनाली मैगजीन के पन्ने पलट रही थी। तभी एक मर्दाना आवाज उसके कानों में पड़ी, एक्सक्यूज मी, क्या मैं आपकी यह मैगजीन देख सकता हूं थोड़ी देर के लिए। उसे बड़ा ही अजीब सा लगा कि एक अंजान आदमी उससे मैगजीन मांग रहा है। सोनाली ने अनमने मन से मैगजीन उसको दे दी। उसने सोनाली से बात करने की कोशिश की तो वहां से उठ कर चली गई। लेकिन उसकी उससे फिर मुलाकात फलाइट में हो गई। वो उसकी बराबर वाली सीट पर बैठा था। उसने हल्के से मुस्कराकर कहा, लो भाग्य ने हमें एक बार फिर मिलवा दिया। वाई द वे आई एम अनिल अग्रवाल। सोनाली को उसका इस तरह बात करना ही बड़ा ही अटपटा लगा था। वो अटपटी सी मुलाकात और फलाइट में कुछ घंटों का सफर उसकी जिदंगी में यूं बदलाव लेकर आएगा उसने कभी सोचा भी ना था।
धीरे-धीरे अनिल सोनाली से घुलने मिलने लगा। दोनों के बीच प्यार की कोंपलें फूटने लगी। जिदंगी का जो नवीनतम नुस्खा उन दोनों के हाथ लगा था उसमें जिदंगी एका-एक अंगूर का गुच्छा बन टपक पड़ी थी। जिसकी आखिरी बूंद तक चूस लेने को कटिबद्ध थे दोनों। नयी हवा, नई सोच और वक्त के बदलते मिजाज ने हौले से, चुपके से सोनाली के कान में फूंक मारी रिजेक्शन नहीं एक्सप्टेंस। शायद यही एक रास्ता बचा था सोनाली की जिदंगी में जो खुशियों और प्यार की भरपाई कर सकता था। वह सूखे पत्ते की तरह अनिल के साथ बहती चली जा रही थी। इस कारण लहरों की तरह आवेग उन पर बहता रहा, फूलों की तरह उन्माद उन पर झड़ता रहा,,,,, उनींदी आंखों में बेशुमार स्वप्न लिए नदियों ने तटबंध तोड़े, नक्षत्रों ने अपनी परिधियों का अतिक्रमण किया। बहरहाल सोनाली अपनी जिदंगी को भरपूर ढंग से जी लेना चाहती थी। इसी को तो उसे तमन्ना थी।
जिदंगी का बदरंग आसमान एकाएक तारों का चमकता झूलना बन बैठा था। सोनाली ने अनिल के साथ पता नहीं कितनी रातों में अंतरग्ता स्थापित की, जिसमें उफान लेते प्यार ने जिदंगी को जीने की कोशिश की। सोनाली ने इस प्यार में वह महसूस किया जिसे अपनी 35 साल की जिदंगी में कभी भी महसूस नहीं किया था। जिसके संस्पर्श से वह एकाएक स्वपनिल औरत बन गई थी। लगभग तीन साल चली इस प्रेम कहानी के फर्स्ट हाफ में दोनों ने नये-नये क्षितिजों को पार किया। उस दौर में धूप और हवा की तरह प्रेम ही सत्य था। फिजा में सुख ही सुख था। पर कहानी के सेकेण्ड हाफ में कई स्पीड ब्रेकर आ गए। इस कारण कहानी कभी स्लो मोशन में चली तो कभी फास्ट मोशन में चली। कभी यह रिमझिम बारिश में भीगी तो कभी टुपुर टुपुर बूंदा बांदी में। प्रेम को जीवन का ऑक्सीजन मानने वाली सोनाली ने इस जीवन के हर मौसम का स्वागत किया। पर जब मुलाकातें लम्बे समय तक स्थगित रहने लगीं तो प्रेम का वह हरा भरा पेड़ कुम्हलाने लगा। तो उसके मन में अपने प्रेमी के लिए अजीबों-गरीब आशंकाएं और दुश्चिन्ताएं सिर उठाने लगीं। फिर धीरे-धीरे सपनों की तरह उसने उन दुश्चिन्ताओं और आंशकाओं को संभालना सीख लिया था। जब कभी वे उत्पात मचातीं, वह आधी रात में अचानक उठ गए बच्चे की मां की तरह उन समस्त आंशकाओं और दुश्चिन्ताओं को थपथपाकर सुला देती।
पर जिदंगी फिर भी जिदंगी थी- वह आधी रात में अचानक उठकर बैठ गए बच्चे की नींद नहीं थी जिसे वक्त-बे-वक्त थपकी देकर सुलाया जा सके। इस कारण जैसे जैसे प्रेम से दूरियां बढ़ने लगीं, आशंका का एक साया उसके साथ साथ चलने लगा। उस सोच ने पहले उसे अनिद्रा दी, फिर उसकी भूख झपट ली।
सोनाली और अनिल दोनों अलग अलग दुनियां के जीव थे। सोनाली अपनी जिदंगी को जीना चाहती थी और अनिल अपनी जिदंगी को मौज मस्ती के साथ एनज्वाय करना चाहता था। इसलिए सोनाली उसके लिए सेक्स ऑबजेक्ट से ज्यादा कुछ नहीं थी। सोनाली को यह बात देर से समझ में आई। पर वो अपने प्यार के आगे बेबस थी। क्या करती वो, प्यार जो हो गया था उसे अनिल से। वो अपने रिश्ते को बचाने की भरपूर कोशिश करती। रिश्ते को सहजने की नाकाम कोशिश करती। इसने उसके अंदर एक असुरक्षा की भावना पैदा की। इस असुरक्षा से निपटने के लिए उसने तय किया कि इस रिश्ते को अब एक नाम दे दूं। जिससे वह थोड़ा निश्चिन्त हो जाए। उसने इस बारे में अनिल से कई बार बात की। लेकिन हर बार वो टाल जाता। सोनाली ने उससे मिन्नतें तक की लेकिन अनिल के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।
जबकि आए दिन वो उसके रंगीन मिजाजी के किस्से दोस्तों से सुन सुनकर थक चुकी थी। ऐसे ही किस्सों में से एक किस्से से उसकी साक्षात मुलाकात उस होटल के कमरे में उसके बिस्तर में पड़ी हुई नग्न पड़ी हुई वो लड़की बयां कर रही थी। जिसके बाद उसके प्यार की दुनिया उजड़ गई। यह वही प्रेमी था जिसने कभी उसके साथ प्रेम में साथ जीने मरने की कसमें खाई थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि वह प्रेम में छली गई है। उसने अनिल की हर ज्यादती और रंगीनी मिजाजी को भी नजरअंदाज कर दिया था। वो तो सिर्फ उससे एक सामाजिक नाम चाहती थी। लेकिन उसे वो भी नहीं मिला? अगर मिला तो सिर्फ धोखा।
कुछ उदास शामों में से एक शाम उसने फैसला किया कि उसे कानून का सहारा लेना चाहिए। जब उसने अपना हक और सम्मान अनिल से कानून के जरिए मांगा तो वह पूरे देश में मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज बन गई। न्यूज पेपर के लिए वह मॉर्निंग हेड लाइन से लेकर गॉसिप कॉलम का मसाला बनकर रह गई।
सोनाली जब अपनी जिदंगी के बारे में सोचती है तो सिवाय संघर्ष, अपमान, दर्द, अकेलेपन और आसुंओं के अलावा कुछ भी याद नहीं आता। सोनाली की जिदंगी बचपन से ही संघर्ष वाली रही थी। छोटी सी उम्र में ही पिता द्वारा एक बेरोजगार युवक से विवाह और उसके बाद जिदंगी जीने के लिए कड़ा संघर्ष। ये ऐसा संघर्ष था जो लगभग 15 साल बाद पति से तलाक के साथ खत्म हुआ। यही वो समय था जब अनिल उसकी जिदंगी में करन जौहर की हिंदी फिल्मों के नायक शाहरूख खान की तरह एक खुशनुमा हवा के झोंके की तरह आया और वह सिमरन की तरह उसके प्यार में बह गई। लेकिन वह तो पुरानी हिंदी फिल्मों का रंगीन मिजाज रंजीत निकला। जो उसका सब कुछ लूट ले गया।
सोनाली सोचती, उसने जिदंगी से क्या मांगा और उसे क्या मिला। उसके सपने और इच्छाएं तो बहुत ही छोटी-छोटी सी थीं। वो बस यही तो चाहती थी कि उसका एक मैच्योर्ड, संवेदनशील, केयरिंग, लविंग और सेल्फ डिपेंड हसबैंड हो। लेकिन उसे मिला एक बेरोजगार, स्वार्थी, कामी और पाश्विक प्रवृति वाला पति। जिसके लिए सोनाली महज पैसा कमाने वाली मशीन और बिस्तर में सोने वाली औरत से ज्यादा कुछ नहीं थी। वहीं दूसरी ओर प्रेमी के रूप में ऐसा आदमी मिला जिसके लिए लड़कियां सिर्फ मौज-मस्ती का साधन थीं। कैसा भाग्य था उसका प्यार में, वो दोनों बार छली गयी। एक को उसने खुद चुना और दूसरे को भगवान के भरोसे के सहारे चुना। दोनों ही पुरूषों ने उसके शरीर और पैसों को ही भोगा। अगर कोई सवाल किया, अगर कोई आवाज की, तो बदले में मिली गालियां, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना। अनिल ने उसके के शरीर की ही नहीं मन और आत्मा दोनांे की हत्या कर दी थी। वो सिर्फ भोग्या बन कर रह गई।
आज सोनाली लोगों की हेयदृष्टि की पात्र है। न्याय पाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाना उसकी नियति बन गई है। मीडिया के बेहूदा सवालों के जवाब देती है और वहीं अनिल ने हमेशा के लिए चुप्पी साध ली और सोनाली पर कोर्ट के बाहर समझौता करने का दबाव बनाता रहता है। लेकिन वक्त किसी के गर्भ में क्या छिपा है। नियति ने क्या तय कर रखा है। यह किसी को नहीं पता होता। वह तो अपनी गति से मंजिल की चलता रहता है।
सोनाली ने अपने मन और आत्मा की शांति के लिए कुछ समय आध्यात्म में जीने का फैसला किया। जिसके लिए वो पूरा दिन पूजा पाठ और साधु संतो के प्रवचनों में देती। ऐसे ही समय में उसकी मुलाकात एक नौजवान लेखक और साहित्यकार अजय से हुई। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि सोनाली ने अपनी जिदंगी की गांठें उसके सामने खोली। सोनाली की जिदंगी के सफर ने लेखक को धीरे धीरे उससे भावनात्मक रूप से जोड़ दिया। अजय को सोनाली के आंसुओं और संघर्ष ने बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया था। वो उसके लिए कुछ करना चाहता था। अजय उसे हर हाल में खुश देखना चाहता था।
सोनाली ने मन की गांठें खोलते हुए उसे अपनी जिदंगी के कुछ पन्ने यूं पढ़वाए कि अजय दंग रह गया। सोनाली ने बताया कि उसने कैसे भगवान के भरोसे मंदिर में तीन नाम की चिट डालकर अपना जीवन साथी चुना और उसके बाद उसकी जिदंगी क्या से क्या हो गई।
कैसे यह रिश्ता उसे एक ऐसे नरक की दुनिया में ले जाता है। जहां उसे सिर्फ दुख, तकलीफें, प्रताड़ना, भुखमरी, हिंसा, यौन हिंसा और अपमान है। उसे ऐसा अकल्पनीय जीवन मिलता है। उसे एक बेरोजगार और बिगड़ा हुआ लड़का पति के रूप में मिलता है, जिसके लिए उसके शौक और सोनाली का शरीर ही सबकुछ है। सोनाली अपने परिवार से उसे इस नरक से बाहर निकालने की प्रार्थना करती है तो उसकी कोई नहीं सुनता।
जब उसकी किसी ने नहीं सुनी तो उसने परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया। उसे क्यों और कैसे अपने पति के साथ जयपुर में एक कोठी की गैराज में रहना पड़ता है। जिदंगी की परेशानियों से तंग आकर सोनाली नौकरी करने का फैसला करती है। सोनाली ने एक दुकान पर सेल्स गर्ल के बतौर नौकरी शुरू करती है लेकिन पति की क्रूरता और वहशीपन में कोई कमी नहीं आती है, वो उसे प्रताडि़त करता रहता है। नौकरी करने की वजह से सोनाली को अपने चरित्र की पवित्रता सीता की तरह हर बार अग्नि परीक्षा देकर साबित करनी पड़ती है। संघर्ष के इन्हीं दिनों में वह दो मासूम से बच्चों की मां भी बनी। वो पता नहीं किस मिटटी की बनी थी अपने संघर्ष के साथ-साथ वो मजबूत होकर निखरती जा रही थी। सोनाली अपने पति के लिए सिर्फ पैसे कमाने की मशाीन और उसकी जरूरतें पूरी करने का सुलभ जरिया मात्र दी। यदि उसने अपने पति को संबध के लिए रजामंदी नहीं दी तो चरित्रहीन के लांछनों का सामना करना पड़ता। बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए वह सब कुछ सहन करती और पति के वहशीपन के लिए जिंदा लाश की तरह उसके सामने बिछ जाती, जिसे वह रौंदता रहता। जिदंगी की इस क्रूरता की परवाह किए बगैर वह आगे बढ़ती रही। उसकी जिदंगी में जितनी परेशानियां आतीं वो उतना ही और मजबूत होती जाती। उसके जीवन के कांटे और पति का वहशीपन भी उसके हौंसले को डिगा नहीं पाए।
ऐसा जीवन जीने वाली सोनाली ने अपने जीवन में सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किए और बेशुमार दौलत कमाई। उसकी जिजीविषा उसके चेहरे से बयां होती। झूठी मुस्कराहट की चादर में वो हमेशा अपने आपको लपेट कर रखती।
जिदंगी के ऐसे ही दिनों में एक दिन उसकी मुलाकात अनिल से हुई। वो उसे दुनियां की भीड़ में कुछ अलग सा लगा। पता ही नहीं कैसे उसने उसके दिल में सेंध लगा ली। वह उसके प्यार में स्वपनिल सपनों के साथ उड़ने लगी। जिदंगी उसे जीने लायक लगने लगी थी। अनिल का प्यार ही उसकी पूरी दुनिया बन गया था। अनिल एक नई उम्र का उभरता हुआ बिजनेस मैन था। जिसके लिए बिजनेस और सक्सेस ही सब कुछ था। उसके इस सफर में मिलने वाली लड़कियां उसकी मौजमस्ती का साधन थी। लेकिन सोनाली उसके इस चेहरे से अनभिज्ञ उसके प्यार में बहेे चली जा रही थी। वो उस स्वपनिल दुनियां की राजकुमारी बन बैठी थी और उस दुनियां में अनिल उसका राजकुमार। उसे भरोसा था कि एक दिन यह राजकुमार सफेद घोड़े पर सवार होकर आएगा और चांद की पालकी में बैठा ले जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अगर उसे कुछ मिला तो बेवफाई और जमाने भर में रूसवाई। सोनाली ने कभी सोचा भी नहीं था कि जो उसकी पूरी दुनिया है। जिसका प्यार उसकी ऑक्सीजन है वह उसके साथ ऐसा करेगा। जब भी उसने अनिल की बेवफाई पर सवाल किया तो उसे मारपीट और गाली गलौच का सामना करना पड़ा। धीरे-धीरे अनिल का असली चेहरा उसके सामने आना शुरू हो गया। उसकी रंगीन मिजाजी के किस्से हवा में तैरते हुए उसके पास पहुंचने लगे।
सोनाली की इस जिदंगी ने अजय को पूरी तरह से बदल दिया। इसी दौरान अजय ने उसके अंदर एक छिपी हुई प्रतिभा देखी जो उसे कुशल प्रशासक और राजनीतिज्ञ बना सकती है। अजय ने धीरे धीरे सोनाली के अंदर छिपी हुई प्रतिभा को सामने लाने के लिए उससे उसी की पहचान कराने की कोशिशें शुरू कीं। सोनाली को जब यह अहसास हो गया कि वह एक राजनीतिज्ञ बन सकती है तब अजय ने उसे निखारने का प्रशिक्षण शुरू किया। कुछ ही महीनों के अंदर सोनाली ने राजनीति के बुनियादी ज्ञान को समझ लिया और राजनीति की पाठशाला में उसने दुनियां के दिग्गजों को छकाना शुरू किया। उसने राजनीति के बारीकियों के साथ साथ कूटनीतिक चालों की बाजीगरी में भी महारत हासिल की। अजय ने सोनाली को राजनीति का ऐसा धुंरधर खिलाड़ी बनाया कि दुनिया उसके सामने नतमस्तक हो गई।
सोनाली की बुद्विमता और हौंसले ने राजनीति में उसे एक दिग्गज नेत्री के रूप में स्थापित किया। पूरे देश में उसे स्त्रियों, गरीबों, दलितों के हक और सम्मान के लिए संघर्ष करने वाली नेत्री के रूप में एक अलग पहचान मिली। देश की जनता ने सोनाली को एक नया नाम दिया श्दीदीश् , अब वो सोनाली से सबकी चहेती दीदी बन गई थी। लोगों के प्यार ने उसे राजनीति के उस पायदान पर पहुंचाया जहां से दुनिया बहुत ही खूबसूरत लगती है। वो लोगों की इतनी चहेती बनीं कि लोग उसकी पूजा करने लगे । यदि उसकी जरा सी भी सेहत खराब हो जाती तो लोग उसकी सलामती की दुआ करते, मंदिरों से लेकर मस्जिदों तक में पूजा पाठ और दुआएं की जातीं। उसके अनुयायी चर्च में उसकी लंबी उम्र और बेहतरी के लिए कैंडिल जलाते। इस देश के लोगों ने उसे देवी का दर्जा दे दिया था। राजनीति में वो इतनी पावरफुल हो चुकी थी कि ंलोग उसे दंडवत प्रणाम करते। सोनाली अपनी पार्टी में ऐसे बरगद के पेड़ के समान हो गई थी जिसके कद के सामने पार्टी का कद भी बौना हो गया था। वो देशहित में, जनहित में साहसिक और लीक से हटकर फैसले लेने में बिल्कुल भी नहीं हिचकती। चाहे उसके विरोधी उसकी कितनी भी आलोचना करें। राजनीति में उसके दिए गए नारे लोगों की जुबान पर चढ़ कर बोलते। अगर यूं कहें कि सोनाली ने राजनीति की नई परिभाषा ही गढ़ दी थी, कहना गलत नहीं होगा। वो इतनी साहसिक नेता थी कि अपने विरोधियों को खुली बहस की चुनौती देती। जिसमें हिम्मत हो वो सामना कर ले। इसीलिए मीडिया ने सोनाली को दबंग दीदी नाम दिया। जब तक वो जिंदा रही देश की सेवा करती रही और अपने सामाजिक और राजनैतिक विरोधियों को धूल चटाती रही। उसने कभी भी किसी को अपने उपर हावी नहीं होने दिया। जब सोनाली इस दुनिया से विदा हुई तो उसकी याद में रोने वाला पूरा देश था। उसके सम्मान में राष्टीय अवकाश घोषित किया। देश का झण्डा भी दो दिन के लिए झुकाया गया। उसको चाहने वाले को उसकी मौत का ऐसा गहरा सदमा लगा कि सैकड़ों लोग अपनी नेता की मौत को सहन नहीं कर पाए और असमय मौत के मुंह में चले गए। जिसकी वजह से पूरी दुनिया की मीडिया ने उस पर लिखा और स्पेशल प्रोग्राम श्कौन भरेगा शून्य या शून्य से शिखर तकश् टीवी चैनल्स पर दिखाए गए। वहीं बॉलीवुड में कुछ नामी गिरामी निर्देशकों ने उस पर फिल्म बनाने की घोषणा की। सोनाली अपने पीछे एक ऐसा खाली स्थान छोड़ गई जिसे भर पाना नामुमकिन था। यह वही सोनाली थी जिसे कभी अपनों के प्यार के लिए तरसना पड़ा और आज उसी के लिए पूरा देश रो रहा है।
पता नहीं कैसा दिन था जब उस उदास शाम की रौशनी में अपने मन और दिल को समेटे ने सोनाली ने तेज धड़कते दिल के साथ होटल की लॉबी में प्रवेश किया। हर कदम के साथ उसके दिल की धड़कन तेज होती जा रही थी। सोनाली वो नहीं देखना चाहती थी जिसकी आशंका से उसका दिल तेजी से धौंकनी की तरह धड़क रहा था। थोड़ी ही देर में वो अनिल के कमरे के सामने खड़ी थी। सोनाली ने कंपकपाते हाथों से डोर बेल बजाई। थोड़ी देर बाद अधनंगी हालत में अनिल दरवाजे पर प्रकट हुआ। सोनाली अनिल को धक्का देते हुए अंदर जा पहुंची। उसने अंदर जो देखा उसे देखकर वो गुस्से थर थर कांपने लगी। सोनाली की गुस्से भरी चीखों से पूरा कमरा गूंजने लगा। जिसका प्रतिकार अनिल ने सोनाली को बुरी तरह पीट कर किया। जिसमें सोनाली के हाथ की अंगुलियां तक टूट गईं।
इस अपमान का जहर पीकर सोनाली जब वहां से लौटी तो अंधेरा आगे था, शाम पीछे। पैर आगे थे, मन पीछे। जिदंगी में एक बार फिर उसने इस अंधेरे को अपने अंदर तक महसूस किया। मौसम ठंडा था लेकिन भीतर इतनी गरम बहस चल रही थी कि विचारों के फरिश्ते भाप बन जहां-तहां उड़ रहे थे। वह कब घर पहुंच गई उसे पता ही नहीं चला। तेजी से वह अपने कमरे में गई और अपने आपको बंद कर लिया। इसके बाद सोनाली ने जो फूट फूट कर रोना शुरू किया। उसे पता ही नहीं चला कब सुबह के सूरज ने रात के अंधेरे को निगल लिया। सुबह उसका चेहरा साफ बयां कर रहा था कि कैसा तूफान उसकी जिदंगी में आया है। यह तूफान त्रासदी के रूप में बेबसी, उदासी, लाचारी और यातना के निशान उसकी आंखों में छोड़ गया था। उसकी आंखों की कोर पर आंसू ठिठके हुए थे और वह पूरे परिवार के सामने उन आंसुओं से युद्ध कर रही थी।
सोनाली इन दिनों एक अजीब सी कैरेक्टर हो गई थी--- आधी रात को उठ-उठकर अपने आप से ही बतियाने लगती तो कभी फूट-फूटकर रोने लगती। उसे खुद याद नहीं, यह सिलसिला कितने दिनों तक चला। धीरे-धीरे आंसूओं की नदी का बहाव भी धीमा सा पड़ने लगा।
लेकिन सोनाली को बीते दिनों की यादें बैचेन रखतीं। न रात को सोने देती और ना दिन में सकून से बैठने देतीं। वह एकाएक हिलग-हिलग कर रोने लगती, भीतर की ना जाने कितनी चट्टानों को फोड़कर यह आर्तनाद निकल पड़ता था। अनिल की यादों से उत्पन्न बेचैनी, अवसाद और यंत्रणा इतनी बढ़ गई थी कि उसकी देह उसके चोले में नहीं आ रही थी। वह बेड की कोर से माथा भिड़ा-भिड़ाकर रोने लगती। ढुलकती आधी रात की निस्तब्धता में एक पूर्ण स्त्री का इस कदर बिलखना जिदंगी का कोई भी क्षण इससे ज्यादा भयावह और दिल दहला देने वाला नहीं हो सकता।
सुबकते-सुबकते वह अपने आप से ही कह उठती कि यदि लाख साल जी लूं मैं और लाख जन्म ले लूं तो भी अनिल को भूला नहीं पाउंगी। कोई यह तो बताए मुझे, दुनिया में पुरूष इतना नीचे कैसे गिर सकता है, वो कैसे जानवर बन सकता है कि कोई औरत चाहकर भी जी ना सके। कभी भी उसकी यादों के सर्पीले सांप उसके दिल के अंदर इधर-उधर रेंगने लगते। कब कौन सी याद उसे डस लेती उसे पता ही नहीं चलता।
उसे आज भी याद है वो अनिल से पहली बार कैसे मिली। उसे अपने बिजनेस के सिलसिले में पेरिस जाना था। मंुबई एयरपोर्ट पर अपनी फलाइट के इंतजार में सोनाली मैगजीन के पन्ने पलट रही थी। तभी एक मर्दाना आवाज उसके कानों में पड़ी, एक्सक्यूज मी, क्या मैं आपकी यह मैगजीन देख सकता हूं थोड़ी देर के लिए। उसे बड़ा ही अजीब सा लगा कि एक अंजान आदमी उससे मैगजीन मांग रहा है। सोनाली ने अनमने मन से मैगजीन उसको दे दी। उसने सोनाली से बात करने की कोशिश की तो वहां से उठ कर चली गई। लेकिन उसकी उससे फिर मुलाकात फलाइट में हो गई। वो उसकी बराबर वाली सीट पर बैठा था। उसने हल्के से मुस्कराकर कहा, लो भाग्य ने हमें एक बार फिर मिलवा दिया। वाई द वे आई एम अनिल अग्रवाल। सोनाली को उसका इस तरह बात करना ही बड़ा ही अटपटा लगा था। वो अटपटी सी मुलाकात और फलाइट में कुछ घंटों का सफर उसकी जिदंगी में यूं बदलाव लेकर आएगा उसने कभी सोचा भी ना था।
धीरे-धीरे अनिल सोनाली से घुलने मिलने लगा। दोनों के बीच प्यार की कोंपलें फूटने लगी। जिदंगी का जो नवीनतम नुस्खा उन दोनों के हाथ लगा था उसमें जिदंगी एका-एक अंगूर का गुच्छा बन टपक पड़ी थी। जिसकी आखिरी बूंद तक चूस लेने को कटिबद्ध थे दोनों। नयी हवा, नई सोच और वक्त के बदलते मिजाज ने हौले से, चुपके से सोनाली के कान में फूंक मारी रिजेक्शन नहीं एक्सप्टेंस। शायद यही एक रास्ता बचा था सोनाली की जिदंगी में जो खुशियों और प्यार की भरपाई कर सकता था। वह सूखे पत्ते की तरह अनिल के साथ बहती चली जा रही थी। इस कारण लहरों की तरह आवेग उन पर बहता रहा, फूलों की तरह उन्माद उन पर झड़ता रहा,,,,, उनींदी आंखों में बेशुमार स्वप्न लिए नदियों ने तटबंध तोड़े, नक्षत्रों ने अपनी परिधियों का अतिक्रमण किया। बहरहाल सोनाली अपनी जिदंगी को भरपूर ढंग से जी लेना चाहती थी। इसी को तो उसे तमन्ना थी।
जिदंगी का बदरंग आसमान एकाएक तारों का चमकता झूलना बन बैठा था। सोनाली ने अनिल के साथ पता नहीं कितनी रातों में अंतरग्ता स्थापित की, जिसमें उफान लेते प्यार ने जिदंगी को जीने की कोशिश की। सोनाली ने इस प्यार में वह महसूस किया जिसे अपनी 35 साल की जिदंगी में कभी भी महसूस नहीं किया था। जिसके संस्पर्श से वह एकाएक स्वपनिल औरत बन गई थी। लगभग तीन साल चली इस प्रेम कहानी के फर्स्ट हाफ में दोनों ने नये-नये क्षितिजों को पार किया। उस दौर में धूप और हवा की तरह प्रेम ही सत्य था। फिजा में सुख ही सुख था। पर कहानी के सेकेण्ड हाफ में कई स्पीड ब्रेकर आ गए। इस कारण कहानी कभी स्लो मोशन में चली तो कभी फास्ट मोशन में चली। कभी यह रिमझिम बारिश में भीगी तो कभी टुपुर टुपुर बूंदा बांदी में। प्रेम को जीवन का ऑक्सीजन मानने वाली सोनाली ने इस जीवन के हर मौसम का स्वागत किया। पर जब मुलाकातें लम्बे समय तक स्थगित रहने लगीं तो प्रेम का वह हरा भरा पेड़ कुम्हलाने लगा। तो उसके मन में अपने प्रेमी के लिए अजीबों-गरीब आशंकाएं और दुश्चिन्ताएं सिर उठाने लगीं। फिर धीरे-धीरे सपनों की तरह उसने उन दुश्चिन्ताओं और आंशकाओं को संभालना सीख लिया था। जब कभी वे उत्पात मचातीं, वह आधी रात में अचानक उठ गए बच्चे की मां की तरह उन समस्त आंशकाओं और दुश्चिन्ताओं को थपथपाकर सुला देती।
पर जिदंगी फिर भी जिदंगी थी- वह आधी रात में अचानक उठकर बैठ गए बच्चे की नींद नहीं थी जिसे वक्त-बे-वक्त थपकी देकर सुलाया जा सके। इस कारण जैसे जैसे प्रेम से दूरियां बढ़ने लगीं, आशंका का एक साया उसके साथ साथ चलने लगा। उस सोच ने पहले उसे अनिद्रा दी, फिर उसकी भूख झपट ली।
सोनाली और अनिल दोनों अलग अलग दुनियां के जीव थे। सोनाली अपनी जिदंगी को जीना चाहती थी और अनिल अपनी जिदंगी को मौज मस्ती के साथ एनज्वाय करना चाहता था। इसलिए सोनाली उसके लिए सेक्स ऑबजेक्ट से ज्यादा कुछ नहीं थी। सोनाली को यह बात देर से समझ में आई। पर वो अपने प्यार के आगे बेबस थी। क्या करती वो, प्यार जो हो गया था उसे अनिल से। वो अपने रिश्ते को बचाने की भरपूर कोशिश करती। रिश्ते को सहजने की नाकाम कोशिश करती। इसने उसके अंदर एक असुरक्षा की भावना पैदा की। इस असुरक्षा से निपटने के लिए उसने तय किया कि इस रिश्ते को अब एक नाम दे दूं। जिससे वह थोड़ा निश्चिन्त हो जाए। उसने इस बारे में अनिल से कई बार बात की। लेकिन हर बार वो टाल जाता। सोनाली ने उससे मिन्नतें तक की लेकिन अनिल के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।
जबकि आए दिन वो उसके रंगीन मिजाजी के किस्से दोस्तों से सुन सुनकर थक चुकी थी। ऐसे ही किस्सों में से एक किस्से से उसकी साक्षात मुलाकात उस होटल के कमरे में उसके बिस्तर में पड़ी हुई नग्न पड़ी हुई वो लड़की बयां कर रही थी। जिसके बाद उसके प्यार की दुनिया उजड़ गई। यह वही प्रेमी था जिसने कभी उसके साथ प्रेम में साथ जीने मरने की कसमें खाई थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि वह प्रेम में छली गई है। उसने अनिल की हर ज्यादती और रंगीनी मिजाजी को भी नजरअंदाज कर दिया था। वो तो सिर्फ उससे एक सामाजिक नाम चाहती थी। लेकिन उसे वो भी नहीं मिला? अगर मिला तो सिर्फ धोखा।
कुछ उदास शामों में से एक शाम उसने फैसला किया कि उसे कानून का सहारा लेना चाहिए। जब उसने अपना हक और सम्मान अनिल से कानून के जरिए मांगा तो वह पूरे देश में मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज बन गई। न्यूज पेपर के लिए वह मॉर्निंग हेड लाइन से लेकर गॉसिप कॉलम का मसाला बनकर रह गई।
सोनाली जब अपनी जिदंगी के बारे में सोचती है तो सिवाय संघर्ष, अपमान, दर्द, अकेलेपन और आसुंओं के अलावा कुछ भी याद नहीं आता। सोनाली की जिदंगी बचपन से ही संघर्ष वाली रही थी। छोटी सी उम्र में ही पिता द्वारा एक बेरोजगार युवक से विवाह और उसके बाद जिदंगी जीने के लिए कड़ा संघर्ष। ये ऐसा संघर्ष था जो लगभग 15 साल बाद पति से तलाक के साथ खत्म हुआ। यही वो समय था जब अनिल उसकी जिदंगी में करन जौहर की हिंदी फिल्मों के नायक शाहरूख खान की तरह एक खुशनुमा हवा के झोंके की तरह आया और वह सिमरन की तरह उसके प्यार में बह गई। लेकिन वह तो पुरानी हिंदी फिल्मों का रंगीन मिजाज रंजीत निकला। जो उसका सब कुछ लूट ले गया।
सोनाली सोचती, उसने जिदंगी से क्या मांगा और उसे क्या मिला। उसके सपने और इच्छाएं तो बहुत ही छोटी-छोटी सी थीं। वो बस यही तो चाहती थी कि उसका एक मैच्योर्ड, संवेदनशील, केयरिंग, लविंग और सेल्फ डिपेंड हसबैंड हो। लेकिन उसे मिला एक बेरोजगार, स्वार्थी, कामी और पाश्विक प्रवृति वाला पति। जिसके लिए सोनाली महज पैसा कमाने वाली मशीन और बिस्तर में सोने वाली औरत से ज्यादा कुछ नहीं थी। वहीं दूसरी ओर प्रेमी के रूप में ऐसा आदमी मिला जिसके लिए लड़कियां सिर्फ मौज-मस्ती का साधन थीं। कैसा भाग्य था उसका प्यार में, वो दोनों बार छली गयी। एक को उसने खुद चुना और दूसरे को भगवान के भरोसे के सहारे चुना। दोनों ही पुरूषों ने उसके शरीर और पैसों को ही भोगा। अगर कोई सवाल किया, अगर कोई आवाज की, तो बदले में मिली गालियां, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना। अनिल ने उसके के शरीर की ही नहीं मन और आत्मा दोनांे की हत्या कर दी थी। वो सिर्फ भोग्या बन कर रह गई।
आज सोनाली लोगों की हेयदृष्टि की पात्र है। न्याय पाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाना उसकी नियति बन गई है। मीडिया के बेहूदा सवालों के जवाब देती है और वहीं अनिल ने हमेशा के लिए चुप्पी साध ली और सोनाली पर कोर्ट के बाहर समझौता करने का दबाव बनाता रहता है। लेकिन वक्त किसी के गर्भ में क्या छिपा है। नियति ने क्या तय कर रखा है। यह किसी को नहीं पता होता। वह तो अपनी गति से मंजिल की चलता रहता है।
सोनाली ने अपने मन और आत्मा की शांति के लिए कुछ समय आध्यात्म में जीने का फैसला किया। जिसके लिए वो पूरा दिन पूजा पाठ और साधु संतो के प्रवचनों में देती। ऐसे ही समय में उसकी मुलाकात एक नौजवान लेखक और साहित्यकार अजय से हुई। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि सोनाली ने अपनी जिदंगी की गांठें उसके सामने खोली। सोनाली की जिदंगी के सफर ने लेखक को धीरे धीरे उससे भावनात्मक रूप से जोड़ दिया। अजय को सोनाली के आंसुओं और संघर्ष ने बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया था। वो उसके लिए कुछ करना चाहता था। अजय उसे हर हाल में खुश देखना चाहता था।
सोनाली ने मन की गांठें खोलते हुए उसे अपनी जिदंगी के कुछ पन्ने यूं पढ़वाए कि अजय दंग रह गया। सोनाली ने बताया कि उसने कैसे भगवान के भरोसे मंदिर में तीन नाम की चिट डालकर अपना जीवन साथी चुना और उसके बाद उसकी जिदंगी क्या से क्या हो गई।
कैसे यह रिश्ता उसे एक ऐसे नरक की दुनिया में ले जाता है। जहां उसे सिर्फ दुख, तकलीफें, प्रताड़ना, भुखमरी, हिंसा, यौन हिंसा और अपमान है। उसे ऐसा अकल्पनीय जीवन मिलता है। उसे एक बेरोजगार और बिगड़ा हुआ लड़का पति के रूप में मिलता है, जिसके लिए उसके शौक और सोनाली का शरीर ही सबकुछ है। सोनाली अपने परिवार से उसे इस नरक से बाहर निकालने की प्रार्थना करती है तो उसकी कोई नहीं सुनता।
जब उसकी किसी ने नहीं सुनी तो उसने परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया। उसे क्यों और कैसे अपने पति के साथ जयपुर में एक कोठी की गैराज में रहना पड़ता है। जिदंगी की परेशानियों से तंग आकर सोनाली नौकरी करने का फैसला करती है। सोनाली ने एक दुकान पर सेल्स गर्ल के बतौर नौकरी शुरू करती है लेकिन पति की क्रूरता और वहशीपन में कोई कमी नहीं आती है, वो उसे प्रताडि़त करता रहता है। नौकरी करने की वजह से सोनाली को अपने चरित्र की पवित्रता सीता की तरह हर बार अग्नि परीक्षा देकर साबित करनी पड़ती है। संघर्ष के इन्हीं दिनों में वह दो मासूम से बच्चों की मां भी बनी। वो पता नहीं किस मिटटी की बनी थी अपने संघर्ष के साथ-साथ वो मजबूत होकर निखरती जा रही थी। सोनाली अपने पति के लिए सिर्फ पैसे कमाने की मशाीन और उसकी जरूरतें पूरी करने का सुलभ जरिया मात्र दी। यदि उसने अपने पति को संबध के लिए रजामंदी नहीं दी तो चरित्रहीन के लांछनों का सामना करना पड़ता। बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए वह सब कुछ सहन करती और पति के वहशीपन के लिए जिंदा लाश की तरह उसके सामने बिछ जाती, जिसे वह रौंदता रहता। जिदंगी की इस क्रूरता की परवाह किए बगैर वह आगे बढ़ती रही। उसकी जिदंगी में जितनी परेशानियां आतीं वो उतना ही और मजबूत होती जाती। उसके जीवन के कांटे और पति का वहशीपन भी उसके हौंसले को डिगा नहीं पाए।
ऐसा जीवन जीने वाली सोनाली ने अपने जीवन में सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किए और बेशुमार दौलत कमाई। उसकी जिजीविषा उसके चेहरे से बयां होती। झूठी मुस्कराहट की चादर में वो हमेशा अपने आपको लपेट कर रखती।
जिदंगी के ऐसे ही दिनों में एक दिन उसकी मुलाकात अनिल से हुई। वो उसे दुनियां की भीड़ में कुछ अलग सा लगा। पता ही नहीं कैसे उसने उसके दिल में सेंध लगा ली। वह उसके प्यार में स्वपनिल सपनों के साथ उड़ने लगी। जिदंगी उसे जीने लायक लगने लगी थी। अनिल का प्यार ही उसकी पूरी दुनिया बन गया था। अनिल एक नई उम्र का उभरता हुआ बिजनेस मैन था। जिसके लिए बिजनेस और सक्सेस ही सब कुछ था। उसके इस सफर में मिलने वाली लड़कियां उसकी मौजमस्ती का साधन थी। लेकिन सोनाली उसके इस चेहरे से अनभिज्ञ उसके प्यार में बहेे चली जा रही थी। वो उस स्वपनिल दुनियां की राजकुमारी बन बैठी थी और उस दुनियां में अनिल उसका राजकुमार। उसे भरोसा था कि एक दिन यह राजकुमार सफेद घोड़े पर सवार होकर आएगा और चांद की पालकी में बैठा ले जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अगर उसे कुछ मिला तो बेवफाई और जमाने भर में रूसवाई। सोनाली ने कभी सोचा भी नहीं था कि जो उसकी पूरी दुनिया है। जिसका प्यार उसकी ऑक्सीजन है वह उसके साथ ऐसा करेगा। जब भी उसने अनिल की बेवफाई पर सवाल किया तो उसे मारपीट और गाली गलौच का सामना करना पड़ा। धीरे-धीरे अनिल का असली चेहरा उसके सामने आना शुरू हो गया। उसकी रंगीन मिजाजी के किस्से हवा में तैरते हुए उसके पास पहुंचने लगे।
सोनाली की इस जिदंगी ने अजय को पूरी तरह से बदल दिया। इसी दौरान अजय ने उसके अंदर एक छिपी हुई प्रतिभा देखी जो उसे कुशल प्रशासक और राजनीतिज्ञ बना सकती है। अजय ने धीरे धीरे सोनाली के अंदर छिपी हुई प्रतिभा को सामने लाने के लिए उससे उसी की पहचान कराने की कोशिशें शुरू कीं। सोनाली को जब यह अहसास हो गया कि वह एक राजनीतिज्ञ बन सकती है तब अजय ने उसे निखारने का प्रशिक्षण शुरू किया। कुछ ही महीनों के अंदर सोनाली ने राजनीति के बुनियादी ज्ञान को समझ लिया और राजनीति की पाठशाला में उसने दुनियां के दिग्गजों को छकाना शुरू किया। उसने राजनीति के बारीकियों के साथ साथ कूटनीतिक चालों की बाजीगरी में भी महारत हासिल की। अजय ने सोनाली को राजनीति का ऐसा धुंरधर खिलाड़ी बनाया कि दुनिया उसके सामने नतमस्तक हो गई।
सोनाली की बुद्विमता और हौंसले ने राजनीति में उसे एक दिग्गज नेत्री के रूप में स्थापित किया। पूरे देश में उसे स्त्रियों, गरीबों, दलितों के हक और सम्मान के लिए संघर्ष करने वाली नेत्री के रूप में एक अलग पहचान मिली। देश की जनता ने सोनाली को एक नया नाम दिया श्दीदीश् , अब वो सोनाली से सबकी चहेती दीदी बन गई थी। लोगों के प्यार ने उसे राजनीति के उस पायदान पर पहुंचाया जहां से दुनिया बहुत ही खूबसूरत लगती है। वो लोगों की इतनी चहेती बनीं कि लोग उसकी पूजा करने लगे । यदि उसकी जरा सी भी सेहत खराब हो जाती तो लोग उसकी सलामती की दुआ करते, मंदिरों से लेकर मस्जिदों तक में पूजा पाठ और दुआएं की जातीं। उसके अनुयायी चर्च में उसकी लंबी उम्र और बेहतरी के लिए कैंडिल जलाते। इस देश के लोगों ने उसे देवी का दर्जा दे दिया था। राजनीति में वो इतनी पावरफुल हो चुकी थी कि ंलोग उसे दंडवत प्रणाम करते। सोनाली अपनी पार्टी में ऐसे बरगद के पेड़ के समान हो गई थी जिसके कद के सामने पार्टी का कद भी बौना हो गया था। वो देशहित में, जनहित में साहसिक और लीक से हटकर फैसले लेने में बिल्कुल भी नहीं हिचकती। चाहे उसके विरोधी उसकी कितनी भी आलोचना करें। राजनीति में उसके दिए गए नारे लोगों की जुबान पर चढ़ कर बोलते। अगर यूं कहें कि सोनाली ने राजनीति की नई परिभाषा ही गढ़ दी थी, कहना गलत नहीं होगा। वो इतनी साहसिक नेता थी कि अपने विरोधियों को खुली बहस की चुनौती देती। जिसमें हिम्मत हो वो सामना कर ले। इसीलिए मीडिया ने सोनाली को दबंग दीदी नाम दिया। जब तक वो जिंदा रही देश की सेवा करती रही और अपने सामाजिक और राजनैतिक विरोधियों को धूल चटाती रही। उसने कभी भी किसी को अपने उपर हावी नहीं होने दिया। जब सोनाली इस दुनिया से विदा हुई तो उसकी याद में रोने वाला पूरा देश था। उसके सम्मान में राष्टीय अवकाश घोषित किया। देश का झण्डा भी दो दिन के लिए झुकाया गया। उसको चाहने वाले को उसकी मौत का ऐसा गहरा सदमा लगा कि सैकड़ों लोग अपनी नेता की मौत को सहन नहीं कर पाए और असमय मौत के मुंह में चले गए। जिसकी वजह से पूरी दुनिया की मीडिया ने उस पर लिखा और स्पेशल प्रोग्राम श्कौन भरेगा शून्य या शून्य से शिखर तकश् टीवी चैनल्स पर दिखाए गए। वहीं बॉलीवुड में कुछ नामी गिरामी निर्देशकों ने उस पर फिल्म बनाने की घोषणा की। सोनाली अपने पीछे एक ऐसा खाली स्थान छोड़ गई जिसे भर पाना नामुमकिन था। यह वही सोनाली थी जिसे कभी अपनों के प्यार के लिए तरसना पड़ा और आज उसी के लिए पूरा देश रो रहा है।
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