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सोशल मीडिया कैसे है अभिव्यक्ति का नया हथियार

 आज के मौजूदा समय में लोगों के लिए अभिव्यक्ति के तमाम विकल्प सामने आ रहे हैं, वहीं इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में चल रही है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर टिक जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से जरा भी नहीं हिचकती है। क्योंकि सोशल मीडिया के ये प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में लोगों की रुचि का भी काम करते हंैं। तो आइए जानने और समझने का प्रयास करते हैं कि क्या है सोशल मीडिया, क्या है इंटरनेट की उपयोगिता सोशल मीडिया में और क्यों है सरकार इसको लेकर सतर्क और सख्त?


सोशल मीडिया क्या है?
सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के हाथ लगा है, जिसके माध्यम से वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैं, बल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। इसके यूजर यह बताने से नहीं चूकते कि वे आज किस से मिले, कहां गए, क्या कर रहे हैं, क्या करने की प्लानिंग कर रहे हैं,आज उनका मूड कैसा है, उनकी जिंदगी में क्या हो रहा है।

यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहीं, इसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है। अब तो सोशल मीडिया सामान्य संपर्क, संवाद या मनोरंजन से इतर नौकरी आदि ढूंढने, उत्पादों या लेखन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैन्युअल कैसट्ल के मुताबिक सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों फेसबुक, ट्विटर आदि के जरिए जो संवाद करते हैं, वह मास कम्युनिकेशन न होकर मास सेल्फ कम्युनिकेशन है। मतलब हम जनसंचार तो करते हैं लेकिन जन स्व-संचार करते हैं और हमें पता ही नहीं होता कि हम किससे संचार कर रहे हैं। या फिर हम जो बातें लिख रहे हैं, उसे कोई पढ़ रहा या देख रहा भी होता है कि नहीं।

इंटरनेट ने बदली जीवनशैली
पिछले दो दशकों से इंटरनेट ने हमारी जीवनशैली को बदलकर रख दिया है। हमारी जरूरतें, कार्य प्रणालियां, अभिरुचियां और यहां तक कि हमारे सामाजिक मेल-मिलाप और संबंधों का सूत्रधार भी काफी हद तक कंप्यूटर ही है। सोशल नेटवर्किंग या सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को रचने में कंप्यूटर की भूमिका आज किस हद तक है, इसे इस बात से जाना जा सकता है कि आप घर बैठे दुनिया भर के अनजान और अपरिचित लोगों से संबंध बना रहे हैं। ऐसे लोगों से आपकी गहरी छन रही है, अंतरंग संवाद हो रहे हैं, जिनसे आपकी वास्तविक जीवन में अभी तक मुलाकात नहीं हुई है।। इतना ही नहीं, यूजर अपने स्कूल और काॅलेज के उन पुराने दोस्तों को भी अचानक खोज निकाल रहे हैं, जो आपके साथ पढे, बड़े हुए और फिर धीरे-धीरे दुनिया की भीड़ में कहीं खो गए।
दरअसल, इंटरनेट पर आधारित संबंध-सूत्रों की यह अवधारणा यानी सोशल मीडिया को संवाद मंचों के तौर पर माना जा सकता है, जहां तमाम ऐसे लोग जिन्होंने वास्तविक रूप से अभी एक-दूसरे को देखा भी नहीं है, एक-दूसरे से बखूबी परिचित हो चले हैं। आपसी सुख-दुख, पढ़ाई-लिखाई, मौज-मस्ती, काम-धंधे की बातें सहित सपनों की भी बातें होती हैं।

अमेरिका की कठपुतली
दुनिया की दो अहम सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक और ट्विटर जिसका मुख्यालय अमेरिका में है, पूरी दुनिया पर राज कर रहा है। ज्ञात हो कि फेसबुक की स्थापना 2004 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों ने की थी। शुरुआत में इसका नाम फेशमाश था और जुकेरबर्ग ने इसकी स्थापना विश्वविद्यालय के सुरक्षित कंप्यूटर नेटवर्क को हैक करके किया था। हार्वर्ड विवि में उन दिनों छात्रों के बारे में बुनियादी सूचनाएं और फोटो देने वाली अलग से कोई डायरेक्ट्री नहीं थी। कुछ ही घंटों के भीतर जुकेरबर्ग का प्रयोग लोकप्रिय हो गया लेकिन विवि प्रशासन ने इस पर गहरी आपत्ति जताई और जुकेरबर्ग को विवि से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और उसके बाद फेसबुक ने क्या मुकाम हासिल किया, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है।

नेटवर्किंग की प्रसिद्ध कंपनी सिस्को ने दुनिया के 18 देशों में काॅलेज जाने वाले युवाओं में इस बात को लेकर कुछ वर्ष पहले एक अध्ययन किया था कि वे अपने संभावित कार्यालय में क्या-क्या चाहते हैं। भारत में 81 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे लैपटाॅप, टैबलेट या स्मार्टफोन के जरिए ही काम करना पसंद करेंगे। 56 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे ऐसी कंपनी में काम करना पसंद करेंगे, जहां सोशल मीडिया या मोबाइल फोन पर पाबंदी हो।

वहीं, ट्विटर इस दुनिया में 21 मार्च, 2006 को आया और तक से लेकर आज तक यह नित्य नई बुलंदियों को छू रहा है। पहले ट्विटर को केवल कंप्यूटर में प्रयोग किया जा सकता था लेकिन अब यह टैबलेट, स्मार्टफोन आदि में भी डाउनलोड किया जा सकता है। ट्विटर पर अभी तक सिर्फ 140 शब्दों में लिखने की सुविधा थी लेकिन पिछले दिनों इस पर लिखने की शब्दसीमा को बढ़ाया गया है। आपको बताना चाहूंगा कि ट्विटर के लिए अभी तक सत्तर हजार से भी अधिक प्लेटफार्म पर अलग-अलग एप्लीकेशन बन चुकी हैं।

क्या है सोशल मीडिया का क्षेत्र
अरब में 2011 में हुए आंदोलन में मीडिया खासकर इंटरनेट, मोबाइल तकनीक के अलावा फेसबुक और ट्विटर ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी। लीबिया और सीरिया में भी यही हाल देखने के लिए मिला। इन आंदोलनों के बाद इंटरनेट सेंसरशिप की प्रवृति जिस कदर बढ़ी है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके पक्ष में भले ही बहस की जाती रही है लेकिन हकीकत तो यह है कि अलग-अलग देशों में सेंसरशिप अपने विभिन्न कारणों से है। इंटरनेट पर नियंत्रण करने के लिए कहीं इंटरनेट को ब्लाॅक किया गया तो कहीं काॅपीराइट, मानहानि, उत्पीड़न और अवमानना को हथियार बनाया जा रहा है।

हिन्दुस्तान के गुजरात राज्य में जहां हार्दिक पटेल के आंदोलन ने इंटरनेट की क्षमता का परिचय दिया जिसकी वजह से इंटरनेट को उस वक्त बंद कर दिया गया था, आपको याद होगा कि  मुंबई में बाला साहेब ठाकरे के निधन पर महाराष्ट्र की एक लड़की के कमेंट और उसकी सहेली के द्वारा उस कमेंट को लाइक करने का खामियाजा किस तरह भुगतना पड़ा। इतना ही नहीं, पिछले दिनों सरकार ने व्हाट्सएप के संदेशों को नब्बे दिनों तक सुरक्षित रखने का आदेश दिया लेकिन इस मामले के सामने आ जाने और विरोध के कारण केंद्र सरकार को इस प्रस्ताव को तुरंत वापस लेना पड़ा।

हो रही है निगरानी
अमेरिका में इंटरनेट को सेंसर करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस के सामने कुछ वर्ष पहले ‘सोपा’ और ‘पीपा’ नामक विधेयक लाया गया था और इसके विरोध स्वरूप अंग्रेजी विकिपीडिया कुछ वक्त के लिए गुल की गई थी। इंटरनेट पर निगरानी रख रही संस्थानों का दावा है कि सिर्फ अमेरिका में ही नहीं बल्कि पूर्व एशिया, मध्य एशिया और मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सरकार द्वारा इंटरनेट को सख्त किया जा रहा है। 2010 में ओपन नेट इनिशियेटिव ने विश्व के कुल 40 देशों की लिस्ट जारी की थी, जहां की सरकारें इंटरनेट फिल्टिरिंग कर रही हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने इंटरनेट स्वतंत्रता संबंधी प्रस्ताव पांच जुलाई 2012 को पारित कर दिया था और परिषद ने सभी देशों से नागरिकों की इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी को समर्थन देने की अपील की थी।

इंटरनेट पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया जारी
सोशल मीडिया की क्षमता और असर को देखते हुए इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में चल रही है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर टिक जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से नहीं हिचकती है। गौरतलब है कि ये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में लोगों की रुचि का भी काम करता है। आप याद करें देश की राजधानी दिल्ली में 2012 में हुए गैंग रेप को कि कैसे लोग दोषियों को सजा दिलाने के लिए एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे। इन साइटों पर रेप, मर्डर, गर्ल एजुकेशन जैसे पेज प्रमुख थे। हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर उठी नफरत की आंधी बेलगाम सोशल मीडिया का नतीजा था और इसका पूरा प्रभाव पूरे देश में देखने को मिला था।

सभी ने माना लोहा
इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव में इसकी पूरी ताकत देखने को मिली। हालांकि अमेरिका में बराक ओबामा सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ताकत का लोहा पहले ही दिखा चुके थे। भारत में नरेंद्र मोदी ने इसका भरपूर उपयोग किया और इसका फायदा भाजपा को भी मिला। नरेंद्र मोदी भले ही पूरे चार सौ से अधिक संसदीय क्षेत्र का दौरा किया लेकिन उन्होंने फेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब के जरिए जिस तरह लोकप्रियता हासिल की, वह एक नया इतिहास है। इसी तरह दो नवयुवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल ने अपने चुनाव और राजनीतिक रणनीति में सोशल मीडिया का जिस तरह से इस्तेमाल किया। वह किसी से छिपा नहीं है।
लोग उनके फेसबुक पर पोस्ट की गई बातों और तस्वीरों को पोस्ट करते, प्रतिक्रिया देते और उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते। वहीं, दूसरी ओर, उनके तमाम प्रतिद्वंद्वी उनकी रणनीति की काट पूरे चुनावी समर में सामने नहीं ला पाए और जाहिर सी बात है कि वे चारों खाने चित्त गिरे।

इसलिए सोशल मीडिया का बुद्धिमानी से उपयोग आपको किसी भी बुलंदी पर पहुंचा सकता है, और वहीं लापरवाही भरा इस्तेमाल आपको बदनामी और परेशानी का शिकार बना सकता है। आपको सोशल मीडिया के उपयोग और इंटरनेट की क्षमता का सही आंकलन करना होगा। समझना होगा कि आप क्या और क्यों कर रहे हैं। साथ ही राष्टीय साइबर कानून के साथ- साथ अंतरराष्टीय साइबर कानून की जानकारी भी रखनी होगी।

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