अगले महीने एनडीए सरकार का सालाना बजट आने वाला है। देश के करोड़ों लोगों की निगाहें इस पर लगी हुईं हैं। लोगों ने उम्मीदों की एक लंबी लिस्ट वित्त मंत्री अरूण जेटली को सौंप दी हैं। मौजूदा सरकार के लिए इन उम्मीदों को पूरा कर पाना कितना संभव होगा। यह थोड़ा सा मुश्किल नजर आ रहा है क्योंकि वर्ष 2016 में सरकार सातवां वेतन कमीशन भी लागू करने जा रही है। जिसकी वजह से 48000 करोड़ का अतिरिक्त दबाव वित्त मंत्री पर होगा। ऐसे में इसका जवाब वित्त मंत्री का सूटकेस अगले महीने देगा।
इस साल भी सरकार पर सबसे जयादा दबाव आयकर में छूट को लेकर है। वेतनभोगी जनता चाहती है कि उसे आयकर में और छूट दी जाए। पिछले बजट में जो छूट मिली थी, उसका लोगों को खासा फायदा नहीं हुआ।
भाजपा ने सत्ता में आने से पहले कहा था कि उनकी सरकार आयकर में छूट की सीमा बढ़ाकर पांच लाख रूपये कर देगी। पिछले बजट में ऐसी उम्मीद थी, लेकन ऐसा नही हुआ। अगर ऐसा नही हो सकता है, तो सरकार दीर्घावधि की बचत के जरिये मिलने वाली छूट की सीमा डेढ़ लाख रूपये से बढ़कर ढाई लाख रूपये कर दे। इतना ही नहीं वेतनभोगियों के लिए दो लाख रूपये तक के स्टैण्डर्ड डिडक्शन की व्यवस्था को फिर से शुरू किया जाए। इससे उन्हें महंगाई से लड़ने में मदद मिलेगी। सरकार ने कई साल पहले मेडिकल छूट के नाम पर 15,000 रूपये की सीमा बनाई थी, जिसे बढा़ना बेहद आवश्यक है। दवाइयों की बढ़ती कीमतें और मेडिकल खर्च की बढ़ती लागत के कारण इसमंें बेढ़ोतरी आवश्यक हो गई है। बच्चों की शिक्षा के लिए दी जाने वाली फीस पर सरकार टैक्स में छूट की व्यवस्था देती है लेकिन वह काफी कम है उसे बढ़ाया जाना चाहिए। वेतनभोगियों का टांसपोर्ट व्यवस्था पर मिलने वाला भत्ता 1600 रूपए से बढ़ाकर 3000 रूपए तक किया जाना चाहिए।
लोगों के लिए आवास ऋण एक ऐसा मुद्दा है जिस पर सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए। देश में मकानों की कीमतें काफी उंची हैं और उस पर ब्याज दरें भी ज्यादा हैं। मध्यम वर्ग आवास ऋण चुकाते चुकाते थक जाता है। इसलिए टैक्स में मिलने वाली दो लाख रूपए की रियायत को बढ़ाया जाना चाहिए।
इसके अलावा मध्यम वर्ग के लिए सर्विस टैक्स सबसे ज्यादा कष्टदायक है। यह सबसे ज्यादा लोगों को तकलीफ दे रहा है। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने इसे बढ़ाकर 14.42 तक कर दिया इस बार वित्त मंत्री को इसे खत्म करने के बारे में सोचना चाहिए। बजट में सरकार को शिक्षा औैर स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य पर तो सरकार ने खर्चाें में कटौती कर दी है और शिक्षा पर जीडीपी का मात्र 3.3 ही खर्च किया जाता है।
इस लिए बजट तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान यह याद रखना होगा कि राजकोषीय समावेशन और सुधार की राह पर बने रहना अत्यंत अहम है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकारी राजस्व में नई जान डालनी होगी होगी। राजस्व के मोर्चे पर सबसे बड़ा और अहम बदलाव वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) है जो राजनीतिक गतिरोध का शिकार है। इसको लेकर वित्त मंत्री का क्या रूख रहेगा। यह दिलचस्प हो सकता है।
वित्त मंत्री ने इस वर्ष 2015 के बजट भाषण में प्रत्यक्ष कर के मामले पर कहा था कि कॉर्पोरशन कर की दर को अगले चार सालों में क्रमश पांच फीसदी अंक घटाते हुए 25 फीसदी किया जाएगा। साथ ही यह भी कहा था कि उन तमाम रियायतों को खत्म किया जाएगा जिनकी वजह से कंपनियां मौजूदा 30 फीसदी से कम कर चुकाती हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश यह प्रक्रिया इस साल 2015 में शुरू नहीं हो सकी। कर दरों को कम करने का खाका तैयार करना अनिवार्य है और इसमें रियायतों को चरणबद्ध ढंग से खत्म करने की व्यवस्था होनी चाहिए।
निजी आयकर में भी रियायत का का रास्ता खोजना होगा। लोगों से ऐसे सुझाव आए हैं कि करदाताओं के लिए यह सीमा बढ़ाकर 5 लाख रुपये सालाना तक की जाए। फिलहाल ऐसा करना कितना उचित होगा अभी नहीं कहा जा सकता। फिलहाल मांग कम है लेकिन उसमें सुधार करने वाले कई कारक नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर, प्रत्यक्ष कर का आधार भी सरकार के लिए अहम है। उसे इस पर नये सिरे से सोचना होगा। वहीं कर दायरा बढ़ाने के लिए यह भी आवश्यक है कि अधिकाधिक लेन देन कर व्यवस्था की नजर से गुजरें। इसके लिए पैन (स्थायी खाता संख्या) नंबर अनिवार्य होना चाहिए। हाल के दिनों में इसे लेकर जो कुछ रियायतें दी गईं वे सही नहीं मानी जा सकतीं।
सर्विस टैक्स के मामले में शायद यह सरकार के लिए आखिरी अवसर है कि वह सेवा करदाताओं को जीएसटी के आगमन के पहले तैयार कर सके। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो तो दरों को बढ़ाकर उस अनुमानित राजस्व निरपेक्ष दर के आसपास ले जाना होगा जो जीएसटी के लागू होने के बाद हो जाएगी। ऐसा करके ही जीएसटी को अपनाने के तात्कालिक मुद्रास्फीतिक प्रभाव से बचा जा सकता है। आखिर में कर आतंक समाप्त करने के बारे में एक स्पष्ट वक्तव्य दिया जाना चाहिए। बजट भाषण में ट्रांसफर प्राइसिंग संबंधी लेनदेन कर की अत्यधिक मांग को भी संबोधित किया जाना चािहए। ऐसा करने से निवेशकों के मन में यह आश्वस्ति आएगी कि भारत कारोबारियों के और अधिक अनुकूल हो रहा है।
बजट में सभी वर्गाें के लोगों का बराबर ध्यान रखा जाना चाहिए। क्योंकि इस बार बजट से सभी लोगों को काफी उम्मीदें हैं। ऐसे में वित्त मंत्री के बजट पेश करने से पहले इस पर गंभीर विचार विमर्श की सख्त आवश्यकता है। मध्यम वर्ग के लिए सर्विस टैक्स और आवास ऋण एक बड़ा मुद्दा है तो कारोबारियों के लिए जीएसटी बड़ा मुद्दा है।
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