राहुल ने कुछ साल पहले ग्रेनो में फ्लैट बुक कराया था, लेकिन अभी भी उन्हें इसका कब्जा नहीं मिला है। राहुल घर के लिए लगभग 80 पर्सेंट कीमत दे चुके हैं, लेकिन प्रॉजेक्ट अब भी तैयार नहीं है। वह खुद को सिर्फ इसी बात से तसल्ली दे लेते हैं कि इस मुसीबत में वह अकेले नहीं हैं। रियल एस्टेट ऐनालिसिस के मुताबिक मुंबई महानगर के 3,753 प्रॉजेक्ट्स में से 45 प्रॉजेक्ट्स के लिए 2011 से 2014 के बीच कब्जा देने का वादा किया गया था, लेकिन ये अभी तक तैयार नहीं हैं। दिल्ली एनसीआर एरिया में तो मुश्किलें और भी बड़ी हैं। यहां 856 प्रॉजेक्ट्स में से करीब 78 पर्सेंट में देरी हुई है। बेंगलुरु, चेन्नै, हैदराबाद, पुणे और कोलकाता में भी यही ट्रेंड है।
वहीं कैबिनेट मंत्रिमंडल ने रियल एस्टेट रेग्युलेटरी बिल को मंजूरी दे दी है। इसे जल्द ही संसद में पेश किया जाएगा। इसमें बायर्स के हितों की रक्षा के कुछ उपाय किए गए हैं। बिल में प्रस्ताव किया गया है कि बायर्स से मिलने वाली 50 पर्सेंट रकम को बिल्डर अलग एस्क्रो अकाउंट में रखेंगे। इससे एक प्रॉजेक्ट का पैसा डिवेलपर्स दूसरे में नहीं लगा पाएंगे और इससे प्रॉजेक्ट्स समय पर पूरे होंगे। अगर बिल्डर समय पर डिलिवरी नहीं दे पाता है तो बायर्स ब्याज सहित बिल्डर से पूरे पैसे मांग सकता है।
ईएमआई की करारी चोट
कब्जे में देरी के चलते फर्स्ट टाइम होम बायर्स और इन्वेस्टर्स पर काफी भारी पड़ती है। कई खरीददार जब घर बुक कराते हैं तो उसमें 10-12 महीने की देरी का अंदाजा पहले से ही लगाकर चलते हैं। हालांकि, शायद ही कोई कब्जे में दो साल की देरी का अंदाजा लगाता है। मौजूदा समय में देशभर में हाउसिंग प्रॉजेक्ट्स में 24-36 महीने का विलंब हो रहा है। राहुल जैसे बायर्स ने घर खरीदते वक्त उम्मीद की थी कि तीन साल में उन्हें रेंट और ईएमआई का बोझ एक साथ नहीं उठाना होगा। हालांकि, दोनों के बोझ के चलते राहुल जैसे लोगों का बजट बेकाबू हो गया है। इन्वेस्टर्स की भी हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। दूसरा या तीसरा घर खरीदने वाले इन्वेस्टर्स ने तीन साल बाद रेंटल इनकम की उम्मीद लगाई थी। उन्हें लगा था कि इससे ईएमआई का उनका बोझ कुछ हल्का हो जाएगा। हालांकि प्रॉजेक्ट में देरी के चलते इन्वेस्टर्स का भी हिसाब-किताब बिगड़ गया है। ये लोग ईएमआई तो अभी भी चुका रहे हैं, लेकिन रेंटल इनकम की उम्मीद अब तक नजर नहीं आ रही है।
टैक्स बेनेफिट का नुकसान
प्रॉजेक्ट कंप्लीट होने पर ही उपभोक्ता टैक्स बेनेफिट ले पाते हैं। खरीददार को सेक्शन 80सी के तहत 1.5 लाख रुपये के प्रिंसिपल पेमेंट पर टैक्स छूट मिलती है। ब्याज चुकाने पर उन्हें और 2 लाख रुपये पर टैक्स छूट दी जाती है। यह छूट सेक्शन 24 के तहत मिली हुई है। इसके तहत टैक्स डिडक्शन हासिल करने के लिए लोन लेने के तीन साल के अंदर अंदर प्रॉपर्टी का कब्जा मिलना बहुत जरूरी है। अगर तीन साल की डेडलाइन पूरी नहीं होती तो डिडक्शन की रकम 2 लाख रुपये से घटकर सिर्फ 30,000 रुपये सालाना रह जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी ने 50 लाख रुपये का होम लोन लिया है तो प्रॉजेक्ट में देरी के चलते उसे 20 साल के लोन पीरियड में 10.9 लाख रुपये का टैक्स का नुकसान होगा। जॉइंट लोन के मामले में तो यह नुकसान और भी अधिक हानेे की संभावना है।
इस मुश्किल से निकलने का एक रास्ता जो समझ में आता है कि आप देरी वाली प्रॉपर्टी तुरंत बेच दें और रेडी टू मूव इन घर खरीदें। हालांकि, रियल एस्टेट ट्रांजैक्शंस इतनी जल्दी नहीं किए जा सकते। रजिस्ट्रेशन चार्जेज और ट्रांसफर फीस के तौर पर एंट्री लोड भी अधिक होता है। वहीं जिस प्रॉपर्टी के कब्जे में देरी हो रही है, उसे बेचने पर सेलर को बहुत फायदा होने की उम्म्ीद नहीं होती। उधर, तैयार घर खरीदने के लिए उसे अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।
लेकिन इस सब के बीच अच्छी बात यह है कि तीन साल का रूल उस प्रॉपर्टी पर लागू नहीं होता, जो रेंट पर दी गई है। इसमें अगर कंस्ट्रक्शन में तीन साल से अधिक का समय लगा है तो भी ब्याज की पूरी रकम पर टैक्स छूट हासिल की जा सकती है। इसलिए जिन लोगों ने प्रॉपर्टी में सिर्फ निवेश की खातिर पैसा लगाया है, वे इसे रेंट देकर राहत की सांस ले सकते हैं।

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