आम आदमी पार्टी डेल्हीडायलॉग करके दिल्ली दरबार पर काबिज हो गई। यह दिल्ली की जनता से जुड़ने का ऐसा अनूठा प्रयोग था जिसकी काट न तो भाजपा के पास थी और न कांग्रेस के पास। यह एक ऐसा कार्यक्रम था जिसने पार्टी को धरना पार्टी की छवि से मुक्ति दे दी। लोगों में यह भरोसा पैदा किया कि ‘आप’ शासन देने वाली पार्टी हो सकती है। कई दिन के डेल्हीडायलॉग के जरिये ऐसा घोषणापत्र बना जिसे दूसरी पार्टियां एक दिन में ही बना डालती हैं। इसके अलावा ‘आप’ ने दो और बिंदुओं पर ध्यान दिया। इसके जरिये भी पार्टी ने अपनी छवि को बदला। पार्टी ने अरविंद केजरीवाल से जनता के सामने माफी मंगवाई। और सांगठनिक ढांचे को ठीक किया।
1डेल्हीडायलॉग
‘आप’ ने धरातल पर दिल्ली से संवाद किया। इसके कारण पार्टी कुछ समय में ही फिर जनता से जुड़ गई।
-नवंबर मध्य में शुरू यह कार्यक्रम जनवरी के आखिरी हफ्ते में समाप्त हुआ। इसका सूत्र वाक्य था दिल्ली को पांच साल में वर्ल्ड क्लास सिटी बनाना।
-मकसद था जनता के सहयोग से नीतियां और ब्लूप्रिंट बनाना। यानी जनता को पार्टी नहीं बल्कि जनता बताएगी कि उसे क्या चाहिए। जनता ने जो भी बताया इसका प्रतिबिंब पार्टी के घोषणापत्र में साफ दिखाई दिया।
-‘आप‘ ने पेशेवरों, गृहिणयों, विद्यार्थियों, युवाओं, ग्रामीणों, उद्यमियों, जेजे क्लस्टर और गैरकानूनी कालोनियों के वाशिंदों तक से बात की । उनके बिंदुओं को शामिल किया। इसी के आधार पर पार्टी ने तय किया कि प्रचार सकारात्मक रखा जाएगा, दिल्ली का विकास केंद्रबिंदु में रहेगा।
-डेल्हीडायलॉग में नौकरी और रोजगार, वाणिज्य और व्यापार, महिला अधिकार और सुरक्षा, साफ-सफाई और कचरा प्रबंधन, सामाजिक कल्याण और सामाजिक न्याय, परिवहन, ऊर्जा और बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, भूमि-आवास, ग्रामीण दिल्ली और पानी इत्यादि मुद्दे रखे गए।
2- संगठन को कसा
पिछले विधानसभा में ‘आप’ के पास कार्यकर्ता आधार व्यापक था। कमी सिर्फ ढांचागत आकार की थी। इससे कार्यकर्ताओं की ऊर्जा और शक्ति का बूथ स्तर पर बेहतरीन उपयोग संभव हुआ। साथ ही दस फ्रंटल संगठन भी खड़े किए गए। लिहाजा जब चुनाव घोषित हुए तब तक संगठन पूरे रंग में था। अरविंद केजरीवाल तब तक हर विधानसभा के दो चक्कर लगा चुके थे।
3.माफी मांगी
पार्टी यह अच्छे से जानती थी कि दिल्ली की जनता बहुत नाराज है। वह ठगी महसूस कर रही है। वह केजरीवाल को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती थी। उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए था। लिहाजा केजरीवाल ने खुलेतौर से अपनी इसे गलती माना और इसके लिए माफी मांगी। उन्होंने माना कि जनलोकपाल कानून लाने में नाकामी के बावजूद उन्हें सत्ता में रहना चाहिए था। उन्होंने दोबारा ऐसी गलती न करने की कसम खाई।
विनम्रता बनाम आक्रामक अभियान
आप की प्रचंड जीत इसलिए
1-आम आदमी पार्टी ने दिल्ली केंद्रित एजेंडा पेश किया।
2-नकारात्मक प्रचार से दूर रहकर मुद्दों की बात की।
3- इस्तीफा देने के बाद से केजरीवाल लगातार जनता से खुद को जोड़ने में जुटे रहे।
4- उनकी विनम्र छवि के आगे भाजपा का आक्रामक अभियान नहीं चला।
5-सस्ती बिजली,मुफ्त पानी, फ्री वाई फाई के लोकलुभावन नारे ने आम मतदाताओं को लुभाया।
6- झुग्गी झोपड़ी के साथ गरीब वर्ग में आम आदमी पार्टी ने पैठ बना ली थी।
7- आम आदमी पार्टी लोगों को समझाने में कामयाब रही कि केजरीवाल ने मजबूरी में कुर्सी छोड़ी थी अब ऐसा नहीं होगा।
8- मोदी रथ रोकने के नाम पर आम आदमी पार्टी के साथ सेकुलर राजनीति करने वाले तमाम दल साथ खड़े हो गए।
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भाजपा इसलिए हारी
1-भाजपा विरोधी मत एकजुट हो गए।
2-कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक पिछले चुनाव में खिसका था इस बार पूरी तरह आप की ओर चला गया।
3-किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से भाजपा के पुराने नेता नाराज हुए। कार्यकर्ताओं का उत्साह गायब हुआ।
4-राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और भाजपा में तालमेल नहीं रहा।
5-केजरीवाल को अराजक, भगोड़ा,नक्सली बताकर नकारात्मक प्रचार करना भाजपा को भारी पड़ा।
6-नौ महीनों की मोदी सरकार दिल्ली केंद्रित एजेंडा नहीं बना पाई।
7-पानी,बिजली का मुद्दा भाजपा पर भारी पड़ा। बायोमीट्रिक कार्ड समेत कई मुद्दों पर कर्मचारियों की नाराजगी भी भारी पड़ी।
8-केंद्र में मोदी दिल्ली में केजरीवाल का नारा भी काम आया।
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कांग्रेस लड़ाई में क्यों नहीं आ पाई?
1-कांग्रेस पहले से हतोत्साहित थी।
2- नेताओं का बिखराव चुनाव आते आते बढ़ता गया।
3- कांग्रेस खुद को विकल्प के रूप में नहीं पेश कर पाई। लिहाजा उसका बचा खुचा वोट भी आप के खाते में चला गया।
4- शीर्ष नेतृत्व बहुत देर से सक्रिय हुआ।
5- कांग्रेस इस संदेश की काट नहीं पेश कर पाई कि उसे वोट देने का मतलब वोट बेकार करना है।
6- शीला दीक्षित समेत पुरानी पीढ़ी के नेता प्रचार से दूर रहे।
7- पार्टी के कई नेता भाजपा का गुणगान करने लगे इसलिए मुस्लिम मतदाता बिखर गया।
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आगे की संभावना?
बजट सत्र में भाजपा सरकार को आठ अध्यादेशों को पारित कराने में मुश्किल होगी।
विपक्ष ज्यादा आक्रामक होगा।
यूपी,बिहार जैसे राज्यों में भाजपा विरोधी कुनबा एकजुट होगा।
बेदी का प्रयोग विफल होने के बाद यूपी और पश्चिम बंगाल के चुनाव में नए प्रयोग न करने को लेकर नेतृत्व पर दबाव बढ़ सकता है।
कांग्रेस के अस्तित्व को भी क्षेत्रीय दलों का कुनबा परेशानी में डाल सकता है।
‘आप’ की जीत की सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बातें
अहम बातें
- केजरीवाल नई दिल्ली सीट पर 31,583 वोट से जीते
- किरण बेदी कृष्णानगर सीट पर 2,277 वोट से हार गईं
- अजय माकन की सदर बाजार सीट से जमानत जब्त हुई
- कांग्रेस और अन्य का सूपड़ा साफ, एक भी सीट नहीं आई
- हारून यूसुफ, किरण वालिया व शर्मिष्ठा की जमानत जब्त
चुनाव नतीजे
‘आप’ : 67 (+39)
भाजपा+ : 03 (-29)
कांग्रेस : 0 (-8)
अन्य : 0 (-3)
किसका कितना वोट शेयर
‘आप’ : 54.3%
2013 विधानसभा चुनाव : 29.49%
2014 लोकसभा चुनाव : 33%
भाजपा : 32.2%
2013 विधानसभा चुनाव : 33.03%
2014 लोकसभा चुनाव : 47%
कांग्रेस : 9.7%
2013 विधानसभा चुनाव : 24.55%
2014 लोकसभा चुनाव : 15%
ये रिकॉर्ड बने
95% से ज्यादा सीटें दिल्ली में जीतने वाली पहली पार्टी बनी ‘आप’। इससे पहले 1998 में कांग्रेस ने 70 में से 52 सीटें जीतकर शीला दीक्षित के नेतृत्व में सरकार बनाई थी
54.3% वोट दिल्ली में हासिल करने वाली भी पहली पार्टी बन गई है ‘आप’। इससे पहले 1998 में कांग्रेस को 47.76% वोट मिले थे
41 लगातार जीत का रिकॉर्ड बनाने वाली नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का विजय रथ रोक दिया
14 महीने में भाजपा की पहली हार, इससे पहले हुए सभी विधानसभा चुनावों में पार्टी या तो जीती या
67 सीटें जीतकर ‘आप’ सर्वाधिक सीटें जीतने वाली देश में दूसरी पार्टी बनी। इससे पहले सिक्किम संग्राम परिषद सभी 32 में से 32 सीटें जीतने का रिकॉर्ड बना चुकी है
243 सीटों में 206 सीटें बिहार में जीतकर जदयू-भाजपा गठबंधन ने 2010 में इतिहास बनाया था
सबसे बड़ी जीत
महिंदर यादव (‘आप’) : 77,665 वोट से विकासपुरी सीट पर संजय सिंह (भाजपा) को हराया
सबसे छोटी जीत
कैलाश गहलोत (‘आप’) : 1,555 वोट से नजफगढ़ सीट पर इनेलो के भरत सिंह को हराया
दिग्गज हारे
किरण वालिया (कांग्रेस)- नई दिल्ली
हारून युसूफ (कांग्रेस) -बल्लीमारन
जगदीश मुखी (भाजपा) -जनकपुरी
दिग्गज जीते
मनीष सिसौदिया (आप)-पटपड़गंज
विजेंदर गुप्ता (भाजपा)- रोहिणी
सोमनाथ भारती (आप) -मालवीय नगर
‘आप’ की जीत के 5 बड़े कारण
1. ईमानदार छवि और सकारात्मक प्रचार
2. 49 दिन की सरकार में किए गए काम
3. बिजली-पानी सस्ता करने का वादा
4. इस्तीफा देने पर जनता से माफी मांगी
5. सोशल मीडिया और युवाओं का साथ
भाजपा की हार के 5 बड़े कारण
1. स्थानीय नेताओं की अनदेखी करना
2. अंतिम समय बेदी को चेहरा बनाना
3. केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमले
4. भाजपा नेताओं के बेतुके बयान
5. चुनाव करवाने में ज्यादा देरी करना
नतीजों के मायने
‘आप’ : केजरीवाल का राष्ट्रीय स्तर पर कद बढ़ा
भाजपा : बिहार-बंगाल के चुनाव में चुनौती बढ़ी
कांग्रेस : शीर्ष नेतृत्व और अस्तित्व पर संकट
तब 14 को इस्तीफा, अब 14 को शपथ
‘आप’ नेता आशुतोष ने बताया कि अरविंद केजरीवाल 14 फरवरी को रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण करेंगे। केजरीवाल ने पिछले साल 14 फरवरी को ही सीएम पद से इस्तीफा दिया था।
मैं दिल्ली की जनता को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। दिल्ली की जनता ने कमाल कर दिया। समर्थकों से अपील है कि दोस्तों! जरा भी अहंकार मत करना। अहंकार की वजह से ही आज भाजपा और कांग्रेस यह हाल हुआ है। अगर हमने भी अहंकार किया तो जनता पांच साल बाद हमारा भी यही हाल करेगी।
- अरविंद केजरीवाल
यह मेरी नहीं, भाजपा की हार है। हार के लिए पार्टी को आत्ममंथन करना चाहिए। कृष्णानगर में काम नहीं हुआ था, जबकि यह सीट लंबे समय से भाजपा के पास ही रही है। भाजपा ने मुङो मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने के पैसे नहीं लिए, यह अपने आप में ऐतिहासिक है।
- किरण बेदी
यह चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया था। यह 2013 के जनादेश का ही विस्तार है और किसी अन्य पार्टी को ठुकराए जाने की अपेक्षा आम आदमी पार्टी के प्रति समर्थन ज्यादा है। हम जनता के फैसले का सम्मान करते हैं और खुद को फिर से खड़ा करेंगे।
- अजय माकन
मैं केजरीवाल को बधाई देता हूं। ये चुनाव परिणाम इसलिए आए हैं क्योंकि आठ महीने पहले केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद केवल उद्योगपतियों के लिए अच्छे दिन आए हैं।
- अन्ना हजारे
मोदी ने केजरीवाल को बधाई दी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर¨वद केजरीवाल को फोन करके जीत की बधाई दी। साथ ही मोदी ने कहा, दिल्ली के विकास में केंद्र सरकार की ओर से पूरा सहयोग दिया जाएगा।
सबसे युवा विधानसभा
28 विधायक 40 या उससे कम उम्र के, ये सभी ‘आप’ के
05 विधायक छठवीं बार चुनाव में जीत दर्ज करने से चूके
47 विधायक पहली बार दिल्ली विधानसभा में पहुंचेंगे
एग्जिट पोल धराशायी
मतदान के ठीक बाद आने वाले एग्जिट पोल में ‘आप’ को सबसे ज्यादा 53 और सबसे कम 31 सीटें मिलने का अनुमान जताया था। जबकि भाजपा को सर्वाधिक 35 और न्यूनतम 17 सीटें मिलने के आसार जताए गए थे।
इन्हें भी जानें
बेदी को ‘आप’ के बग्गा ने हराया: भाजपा की सीएम उम्मीदवार किरण बेदी कृष्णानगर सीट पर ‘आप’ के एसके बग्गा से 2,277 वोट से हार गईं। कृष्णानगर भाजपा की पक्की सीट मानी जाती थी। केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन यहां से पांच बार विधायक रह चुके हैं। पश्चिम दिल्ली सीट से पांच बार विधायक रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता जगदीश मुखी भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। वहीं चुनाव से पहले कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुईं कृष्णा तीरथ भी हार गईं।
माकन, लवली का इस्तीफा: कांग्रेस महासचिव अजय माकन ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की शर्मनाक पराजय की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अर¨वदर सिंह लवली ने भी इस्तीफा दे दिया है।
‘मोदी लहर : केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि दिल्ली के चुनाव नतीजों में हार का भाजपा विश्लेषण करेगी। उन्होंने कहा, ‘मेरा मानना है कि मोदी लहर धीमी नहीं पड़ी है । कोई भी लहर 10-15 दिनों में खत्म नहीं हो सकती। भाजपा की हार के लिए मैं किसी को जिम्मेदार नहीं मानता। हमने कई विधानसभा चुनाव जीते हैं।’ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की बेटी की शादी में रवाना होने से पहले अहमदाबाद हवाई अड्डे पर गोयल ने ये बातें कहीं।
आप की जीत और बीजेपी-कांग्रेस की हार के कारण
भाजपा के हार के कारण
किरण बेदी की उम्मीदवारी: भाजपा ने अरविंद केजरीवाल की पूर्व सहयोगी किरण बेदी को सीधे मु्ख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। इससे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और उनके समर्थकों में काफी रोष पैदा हुआ। वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव में पूरी ताकत नहीं लगाई और उनके समर्थक भी काफी निष्क्रिय रहे।
किरण बेदी का व्यवहार
किरण बेदी भारत की पहली महिला पुलिस अफिसर थीं और लगभग चार दशक तक उस विभाग में रहीं। वह कड़क किस्म की अधिकारी थीं और राजनीति में कूदने के बाद भी उनका यह स्वभाव नहीं बदला। शुरू में वह जिस ढंग से कार्यकर्ताओं तथा नेताओं से बातचीत कर रही थीं वह उन्हें पचा नहीं। इससे वे उनसे दूर हो गए।
चुनाव कराने में देरी
भाजपा ने दिल्ली में चुनाव कराने में काफी देरी की। लोकसभा चुनाव में दिल्ली की 70 सीटों में से 60 पर बढ़त लेने के कारण भाजपा आलाकमान अति आत्मविश्वासी हो गया और उसे लगने लगा कि वह कभी भी चुनाव जीत सकते हैं। अगर चुनाव उसके तुरंत बाद होते तो यह हार नहीं होती।
दिल्ली नगर निगम से मोह उठा
दिल्ली में एमसीडी के तीन टुकड़े इसलिए किए गए थे कि इसमें कार्य कुशलता आए लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इनकी कार्यशैली ऐसी थी कि महानगर को गंदगी भ्रष्टाचार और निकम्मेपन का सामना करना पड़ा। इन सभी में भाजपा सत्ता में काबिज है और लोग इनके काम-काज के तरीके से बेहद नाराज हैं।
नकारात्मक प्रचार
इस चुनाव में भाजपा का प्रचार केजरीवाल के इर्द-गिर्द रहा यानी उनकी आलोचना करने में पार्टी ने ज्यादा वक्त बर्बाद कर दिया। अपनी उपलब्धियों और आगे के कार्यक्रमों की बात करने के बजाय बड़े-बड़े विज्ञापनों के जरिए केजरीवाल को निशाना बनाया गया। इतना ही नहीं भाजपा ने केजरीवाल को नकारात्मक दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इससे लोगों में नाराजगी हुई, इसी कारण से उन्होंने भाजपा से दूरी बनाई और आप के पास जाना बेहतर समझा।
आप का विजयी मंत्र
सस्ती बिजली, मुफ्त पानी
केजरीवाल ने अपनी 49 दिनों की सरकार में सस्ती बिजली और मुफ्त पानी का प्रावधान किया था। इससे काफी तादाद में लोगों को फायदा हुआ। लोग इस बार भी यही उम्मीद कर रहे थे और इस आधार पर उन्हें वोट देने वालों की तादाद बड़ी थी।
लोक लुभावने वादे
केजरीवाल ने इस चुनाव में वादों का पिटारा खोल दिया। हर मुद्दे के बारे में उन्होंने वादे किए। पानी-बिजली से लेकर लाखों अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी करने के वादे किए गए़ लगभग 70 तरह के वादे पार्टी के घोषणा पत्र में किए गए जबकि भाजपा ने ऐसा कुछ नहीं कहा। इससे पार्टी के समर्थकों की तादाद बढ़ी और उन्हें लगने लगा कि केजरीवाल के हर समस्या का समाधान है।
अल्पसंख्यक
इस बार 90 फीसदी अल्पसंख्यकों ने आम आदमी पार्टी को एक रणनीति के तहत वोट दिया और यही कारण है कि कांग्रेस का वोट प्रतिशत गिरा। वे आरएसएस की घर वापसी और हिन्दूवादी संगठनों की उद्दंडता से नाराज थे। उन्हें आम आदमी पार्टी में एक विकल्प दिखा।
अन्य पार्टियों के नेताओं को प्रवेश
भाजपा ने भी कांग्रेस की तरह चलते हुए अन्य पार्टियों के कई नेताओं को जगह दी। कुछ को टिकटें भी मिलीं। इससे वषों से वहां काम कर रहे स्थानीय नेता भड़क गए और उनमें से कई ने भीतरघात किया।
कांग्रेस के हार के कारण
कांग्रेस ने की खानापूर्ति
इस बार दिल्ली चुनाव काफी हद तक दो तरफा लग रहे थे। कांग्रेस खुद इसको खानापूर्ति की तरह से ले रही थी। उन्होंने प्रचार पर कोई ध्यान नहीं दिया जिसका फायदा आम आदमी पार्टी ने उठाया। उसने उनके वोट बैंक जिनमें झुग्गी-झोपड़ियां और अल्पसंख्यक थे, कब्जा कर लिया।
नहीं दिखा जोश
चुनाव के दिन नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। बूथों पर भी कांग्रेसियों में जोश नहीं दिखाई दिया। वोटरों के प्रति अपील करने की कोई इच्छा भी नहीं दिखी। कई बूथों पर तो कांग्रेसी आए भी देर से और कुछ देर रुक कर ही आए।
वरिष्ठ नेताओं ने छोड़ा साथ
दिल्ली में कई सीटों पर वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। जिससे कार्यकर्ताओं का हौंसला टूटा। उनमें जो बेहतर करने की संभावनाएं बची थी वह भी ऐसे रवैये के कारण पूरी तरह से खत्म हो गई।
पार्टी को मिला गलत संदेश
कांग्रेस ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन को दिल्ली विधानसभा चुनाव की कमान दी। लेकिन अजय माकन कांग्रेस के दिल्ली मुख्यालय में बैठे ही नहीं। इसका भी गलत संदेश पार्टीजनों के बीच गया।
नहीं दिखे बड़े चेहरे
चुनाव की तारीख का ऐलान हो जाने के बाद भी प्रचार में कांग्रेस के बड़े नेता नहीं आए। प्रचार में पहले दिन से ही विधानसभा वार जिन्हें दिखना था वो खानापूर्ति करते रहे। यहां तक कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रचार के आखरी दौर में कुछ सभाएं कीं। दिल्ली के अनुभवी जानकार नेताओं की कमी कार्यकर्ताओं को खलती रही। जनता के भरोसेमंद नेताओं की अनदेखी की गई। चुनाव प्रभारी पीसी चाको ने टीम बनाते समय इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया। अजय माकन सभी से संवाद कर पाने में नाकाम रहे।
नहीं सीखा सबक
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार का विश्लेषण हो जाने के बाद भी पार्टी ने सबक नहीं लिया। दिल्ली के चुनाव प्रभारी पीसी चाको ने चुनाव के लिए जो रणनीति बनाई वो कमजोर साबित हुई। कार्यकर्ताओं को दिल्ली चुनाव की रणनीति के बारे में पता ही नहीं चला।
पहले ही मानी हार
इस विधानसभा चुनाव में पार्टी नेताओं ने जनता और पहले कार्यकर्ताओं से मजबूत संवाद नहीं किया। उन्हे विश्वास में नहीं लिया। संदेश गया कि कांग्रेस ने चुनाव लड़ने से पहले ही हार मान ली।
नहीं ली गई कार्यकर्ताओं की राय
दिल्ली में टिकटों का बंटवारा करने से पहले विधानसभा स्तर पर कार्यकर्ताओं की राय नहीं ली गई। जो कि उम्मीदवारों के चयन में अहम मानी जाती। अच्छी और साफ छवि के उम्मीदवारों को चुनने की कोशिश ही नहीं की गई।
बाते की काम नहीं
चुनाव में ऐसे कई पार्टी नेताओं को टीम में रख लिया गया जो अति-आत्मविश्वास में थे। जो केवल पार्टी के आला नेताओं के सामने बातें तो करते रहे पर क्षेत्र में चुनाव के लिए काम नहीं किया। कई तो ऐसे थे जिन्हे विधानसभा क्षेत्र की जानकारी ही नहीं।
नहीं किया बखान
कांग्रेस ने अपनी सरकारों के कार्यकाल में दिल्ली में किए गए विकास कार्यों का बखान ही ठीक से नहीं किया। प्रचार में लगे कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को मौके के हिसाब से बयान और जवाब देने की सही ट्रेनिंग तक नहीं दी गई।
साभार विभिन्न स्रोत एजेंसी और वेबसाइट
1डेल्हीडायलॉग
‘आप’ ने धरातल पर दिल्ली से संवाद किया। इसके कारण पार्टी कुछ समय में ही फिर जनता से जुड़ गई।
-नवंबर मध्य में शुरू यह कार्यक्रम जनवरी के आखिरी हफ्ते में समाप्त हुआ। इसका सूत्र वाक्य था दिल्ली को पांच साल में वर्ल्ड क्लास सिटी बनाना।
-मकसद था जनता के सहयोग से नीतियां और ब्लूप्रिंट बनाना। यानी जनता को पार्टी नहीं बल्कि जनता बताएगी कि उसे क्या चाहिए। जनता ने जो भी बताया इसका प्रतिबिंब पार्टी के घोषणापत्र में साफ दिखाई दिया।
-‘आप‘ ने पेशेवरों, गृहिणयों, विद्यार्थियों, युवाओं, ग्रामीणों, उद्यमियों, जेजे क्लस्टर और गैरकानूनी कालोनियों के वाशिंदों तक से बात की । उनके बिंदुओं को शामिल किया। इसी के आधार पर पार्टी ने तय किया कि प्रचार सकारात्मक रखा जाएगा, दिल्ली का विकास केंद्रबिंदु में रहेगा।
-डेल्हीडायलॉग में नौकरी और रोजगार, वाणिज्य और व्यापार, महिला अधिकार और सुरक्षा, साफ-सफाई और कचरा प्रबंधन, सामाजिक कल्याण और सामाजिक न्याय, परिवहन, ऊर्जा और बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, भूमि-आवास, ग्रामीण दिल्ली और पानी इत्यादि मुद्दे रखे गए।
2- संगठन को कसा
पिछले विधानसभा में ‘आप’ के पास कार्यकर्ता आधार व्यापक था। कमी सिर्फ ढांचागत आकार की थी। इससे कार्यकर्ताओं की ऊर्जा और शक्ति का बूथ स्तर पर बेहतरीन उपयोग संभव हुआ। साथ ही दस फ्रंटल संगठन भी खड़े किए गए। लिहाजा जब चुनाव घोषित हुए तब तक संगठन पूरे रंग में था। अरविंद केजरीवाल तब तक हर विधानसभा के दो चक्कर लगा चुके थे।
3.माफी मांगी
पार्टी यह अच्छे से जानती थी कि दिल्ली की जनता बहुत नाराज है। वह ठगी महसूस कर रही है। वह केजरीवाल को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती थी। उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए था। लिहाजा केजरीवाल ने खुलेतौर से अपनी इसे गलती माना और इसके लिए माफी मांगी। उन्होंने माना कि जनलोकपाल कानून लाने में नाकामी के बावजूद उन्हें सत्ता में रहना चाहिए था। उन्होंने दोबारा ऐसी गलती न करने की कसम खाई।
विनम्रता बनाम आक्रामक अभियान
आप की प्रचंड जीत इसलिए
1-आम आदमी पार्टी ने दिल्ली केंद्रित एजेंडा पेश किया।
2-नकारात्मक प्रचार से दूर रहकर मुद्दों की बात की।
3- इस्तीफा देने के बाद से केजरीवाल लगातार जनता से खुद को जोड़ने में जुटे रहे।
4- उनकी विनम्र छवि के आगे भाजपा का आक्रामक अभियान नहीं चला।
5-सस्ती बिजली,मुफ्त पानी, फ्री वाई फाई के लोकलुभावन नारे ने आम मतदाताओं को लुभाया।
6- झुग्गी झोपड़ी के साथ गरीब वर्ग में आम आदमी पार्टी ने पैठ बना ली थी।
7- आम आदमी पार्टी लोगों को समझाने में कामयाब रही कि केजरीवाल ने मजबूरी में कुर्सी छोड़ी थी अब ऐसा नहीं होगा।
8- मोदी रथ रोकने के नाम पर आम आदमी पार्टी के साथ सेकुलर राजनीति करने वाले तमाम दल साथ खड़े हो गए।
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भाजपा इसलिए हारी
1-भाजपा विरोधी मत एकजुट हो गए।
2-कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक पिछले चुनाव में खिसका था इस बार पूरी तरह आप की ओर चला गया।
3-किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से भाजपा के पुराने नेता नाराज हुए। कार्यकर्ताओं का उत्साह गायब हुआ।
4-राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और भाजपा में तालमेल नहीं रहा।
5-केजरीवाल को अराजक, भगोड़ा,नक्सली बताकर नकारात्मक प्रचार करना भाजपा को भारी पड़ा।
6-नौ महीनों की मोदी सरकार दिल्ली केंद्रित एजेंडा नहीं बना पाई।
7-पानी,बिजली का मुद्दा भाजपा पर भारी पड़ा। बायोमीट्रिक कार्ड समेत कई मुद्दों पर कर्मचारियों की नाराजगी भी भारी पड़ी।
8-केंद्र में मोदी दिल्ली में केजरीवाल का नारा भी काम आया।
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कांग्रेस लड़ाई में क्यों नहीं आ पाई?
1-कांग्रेस पहले से हतोत्साहित थी।
2- नेताओं का बिखराव चुनाव आते आते बढ़ता गया।
3- कांग्रेस खुद को विकल्प के रूप में नहीं पेश कर पाई। लिहाजा उसका बचा खुचा वोट भी आप के खाते में चला गया।
4- शीर्ष नेतृत्व बहुत देर से सक्रिय हुआ।
5- कांग्रेस इस संदेश की काट नहीं पेश कर पाई कि उसे वोट देने का मतलब वोट बेकार करना है।
6- शीला दीक्षित समेत पुरानी पीढ़ी के नेता प्रचार से दूर रहे।
7- पार्टी के कई नेता भाजपा का गुणगान करने लगे इसलिए मुस्लिम मतदाता बिखर गया।
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आगे की संभावना?
बजट सत्र में भाजपा सरकार को आठ अध्यादेशों को पारित कराने में मुश्किल होगी।
विपक्ष ज्यादा आक्रामक होगा।
यूपी,बिहार जैसे राज्यों में भाजपा विरोधी कुनबा एकजुट होगा।
बेदी का प्रयोग विफल होने के बाद यूपी और पश्चिम बंगाल के चुनाव में नए प्रयोग न करने को लेकर नेतृत्व पर दबाव बढ़ सकता है।
कांग्रेस के अस्तित्व को भी क्षेत्रीय दलों का कुनबा परेशानी में डाल सकता है।
‘आप’ की जीत की सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बातें
अहम बातें
- केजरीवाल नई दिल्ली सीट पर 31,583 वोट से जीते
- किरण बेदी कृष्णानगर सीट पर 2,277 वोट से हार गईं
- अजय माकन की सदर बाजार सीट से जमानत जब्त हुई
- कांग्रेस और अन्य का सूपड़ा साफ, एक भी सीट नहीं आई
- हारून यूसुफ, किरण वालिया व शर्मिष्ठा की जमानत जब्त
चुनाव नतीजे
‘आप’ : 67 (+39)
भाजपा+ : 03 (-29)
कांग्रेस : 0 (-8)
अन्य : 0 (-3)
किसका कितना वोट शेयर
‘आप’ : 54.3%
2013 विधानसभा चुनाव : 29.49%
2014 लोकसभा चुनाव : 33%
भाजपा : 32.2%
2013 विधानसभा चुनाव : 33.03%
2014 लोकसभा चुनाव : 47%
कांग्रेस : 9.7%
2013 विधानसभा चुनाव : 24.55%
2014 लोकसभा चुनाव : 15%
ये रिकॉर्ड बने
95% से ज्यादा सीटें दिल्ली में जीतने वाली पहली पार्टी बनी ‘आप’। इससे पहले 1998 में कांग्रेस ने 70 में से 52 सीटें जीतकर शीला दीक्षित के नेतृत्व में सरकार बनाई थी
54.3% वोट दिल्ली में हासिल करने वाली भी पहली पार्टी बन गई है ‘आप’। इससे पहले 1998 में कांग्रेस को 47.76% वोट मिले थे
41 लगातार जीत का रिकॉर्ड बनाने वाली नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का विजय रथ रोक दिया
14 महीने में भाजपा की पहली हार, इससे पहले हुए सभी विधानसभा चुनावों में पार्टी या तो जीती या
67 सीटें जीतकर ‘आप’ सर्वाधिक सीटें जीतने वाली देश में दूसरी पार्टी बनी। इससे पहले सिक्किम संग्राम परिषद सभी 32 में से 32 सीटें जीतने का रिकॉर्ड बना चुकी है
243 सीटों में 206 सीटें बिहार में जीतकर जदयू-भाजपा गठबंधन ने 2010 में इतिहास बनाया था
सबसे बड़ी जीत
महिंदर यादव (‘आप’) : 77,665 वोट से विकासपुरी सीट पर संजय सिंह (भाजपा) को हराया
सबसे छोटी जीत
कैलाश गहलोत (‘आप’) : 1,555 वोट से नजफगढ़ सीट पर इनेलो के भरत सिंह को हराया
दिग्गज हारे
किरण वालिया (कांग्रेस)- नई दिल्ली
हारून युसूफ (कांग्रेस) -बल्लीमारन
जगदीश मुखी (भाजपा) -जनकपुरी
दिग्गज जीते
मनीष सिसौदिया (आप)-पटपड़गंज
विजेंदर गुप्ता (भाजपा)- रोहिणी
सोमनाथ भारती (आप) -मालवीय नगर
‘आप’ की जीत के 5 बड़े कारण
1. ईमानदार छवि और सकारात्मक प्रचार
2. 49 दिन की सरकार में किए गए काम
3. बिजली-पानी सस्ता करने का वादा
4. इस्तीफा देने पर जनता से माफी मांगी
5. सोशल मीडिया और युवाओं का साथ
भाजपा की हार के 5 बड़े कारण
1. स्थानीय नेताओं की अनदेखी करना
2. अंतिम समय बेदी को चेहरा बनाना
3. केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमले
4. भाजपा नेताओं के बेतुके बयान
5. चुनाव करवाने में ज्यादा देरी करना
नतीजों के मायने
‘आप’ : केजरीवाल का राष्ट्रीय स्तर पर कद बढ़ा
भाजपा : बिहार-बंगाल के चुनाव में चुनौती बढ़ी
कांग्रेस : शीर्ष नेतृत्व और अस्तित्व पर संकट
तब 14 को इस्तीफा, अब 14 को शपथ
‘आप’ नेता आशुतोष ने बताया कि अरविंद केजरीवाल 14 फरवरी को रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण करेंगे। केजरीवाल ने पिछले साल 14 फरवरी को ही सीएम पद से इस्तीफा दिया था।
मैं दिल्ली की जनता को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। दिल्ली की जनता ने कमाल कर दिया। समर्थकों से अपील है कि दोस्तों! जरा भी अहंकार मत करना। अहंकार की वजह से ही आज भाजपा और कांग्रेस यह हाल हुआ है। अगर हमने भी अहंकार किया तो जनता पांच साल बाद हमारा भी यही हाल करेगी।
- अरविंद केजरीवाल
यह मेरी नहीं, भाजपा की हार है। हार के लिए पार्टी को आत्ममंथन करना चाहिए। कृष्णानगर में काम नहीं हुआ था, जबकि यह सीट लंबे समय से भाजपा के पास ही रही है। भाजपा ने मुङो मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने के पैसे नहीं लिए, यह अपने आप में ऐतिहासिक है।
- किरण बेदी
यह चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया था। यह 2013 के जनादेश का ही विस्तार है और किसी अन्य पार्टी को ठुकराए जाने की अपेक्षा आम आदमी पार्टी के प्रति समर्थन ज्यादा है। हम जनता के फैसले का सम्मान करते हैं और खुद को फिर से खड़ा करेंगे।
- अजय माकन
मैं केजरीवाल को बधाई देता हूं। ये चुनाव परिणाम इसलिए आए हैं क्योंकि आठ महीने पहले केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद केवल उद्योगपतियों के लिए अच्छे दिन आए हैं।
- अन्ना हजारे
मोदी ने केजरीवाल को बधाई दी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर¨वद केजरीवाल को फोन करके जीत की बधाई दी। साथ ही मोदी ने कहा, दिल्ली के विकास में केंद्र सरकार की ओर से पूरा सहयोग दिया जाएगा।
सबसे युवा विधानसभा
28 विधायक 40 या उससे कम उम्र के, ये सभी ‘आप’ के
05 विधायक छठवीं बार चुनाव में जीत दर्ज करने से चूके
47 विधायक पहली बार दिल्ली विधानसभा में पहुंचेंगे
एग्जिट पोल धराशायी
मतदान के ठीक बाद आने वाले एग्जिट पोल में ‘आप’ को सबसे ज्यादा 53 और सबसे कम 31 सीटें मिलने का अनुमान जताया था। जबकि भाजपा को सर्वाधिक 35 और न्यूनतम 17 सीटें मिलने के आसार जताए गए थे।
इन्हें भी जानें
बेदी को ‘आप’ के बग्गा ने हराया: भाजपा की सीएम उम्मीदवार किरण बेदी कृष्णानगर सीट पर ‘आप’ के एसके बग्गा से 2,277 वोट से हार गईं। कृष्णानगर भाजपा की पक्की सीट मानी जाती थी। केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन यहां से पांच बार विधायक रह चुके हैं। पश्चिम दिल्ली सीट से पांच बार विधायक रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता जगदीश मुखी भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। वहीं चुनाव से पहले कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुईं कृष्णा तीरथ भी हार गईं।
माकन, लवली का इस्तीफा: कांग्रेस महासचिव अजय माकन ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की शर्मनाक पराजय की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अर¨वदर सिंह लवली ने भी इस्तीफा दे दिया है।
‘मोदी लहर : केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि दिल्ली के चुनाव नतीजों में हार का भाजपा विश्लेषण करेगी। उन्होंने कहा, ‘मेरा मानना है कि मोदी लहर धीमी नहीं पड़ी है । कोई भी लहर 10-15 दिनों में खत्म नहीं हो सकती। भाजपा की हार के लिए मैं किसी को जिम्मेदार नहीं मानता। हमने कई विधानसभा चुनाव जीते हैं।’ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की बेटी की शादी में रवाना होने से पहले अहमदाबाद हवाई अड्डे पर गोयल ने ये बातें कहीं।
आप की जीत और बीजेपी-कांग्रेस की हार के कारण
भाजपा के हार के कारण
किरण बेदी की उम्मीदवारी: भाजपा ने अरविंद केजरीवाल की पूर्व सहयोगी किरण बेदी को सीधे मु्ख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। इससे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और उनके समर्थकों में काफी रोष पैदा हुआ। वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव में पूरी ताकत नहीं लगाई और उनके समर्थक भी काफी निष्क्रिय रहे।
किरण बेदी का व्यवहार
किरण बेदी भारत की पहली महिला पुलिस अफिसर थीं और लगभग चार दशक तक उस विभाग में रहीं। वह कड़क किस्म की अधिकारी थीं और राजनीति में कूदने के बाद भी उनका यह स्वभाव नहीं बदला। शुरू में वह जिस ढंग से कार्यकर्ताओं तथा नेताओं से बातचीत कर रही थीं वह उन्हें पचा नहीं। इससे वे उनसे दूर हो गए।
चुनाव कराने में देरी
भाजपा ने दिल्ली में चुनाव कराने में काफी देरी की। लोकसभा चुनाव में दिल्ली की 70 सीटों में से 60 पर बढ़त लेने के कारण भाजपा आलाकमान अति आत्मविश्वासी हो गया और उसे लगने लगा कि वह कभी भी चुनाव जीत सकते हैं। अगर चुनाव उसके तुरंत बाद होते तो यह हार नहीं होती।
दिल्ली नगर निगम से मोह उठा
दिल्ली में एमसीडी के तीन टुकड़े इसलिए किए गए थे कि इसमें कार्य कुशलता आए लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इनकी कार्यशैली ऐसी थी कि महानगर को गंदगी भ्रष्टाचार और निकम्मेपन का सामना करना पड़ा। इन सभी में भाजपा सत्ता में काबिज है और लोग इनके काम-काज के तरीके से बेहद नाराज हैं।
नकारात्मक प्रचार
इस चुनाव में भाजपा का प्रचार केजरीवाल के इर्द-गिर्द रहा यानी उनकी आलोचना करने में पार्टी ने ज्यादा वक्त बर्बाद कर दिया। अपनी उपलब्धियों और आगे के कार्यक्रमों की बात करने के बजाय बड़े-बड़े विज्ञापनों के जरिए केजरीवाल को निशाना बनाया गया। इतना ही नहीं भाजपा ने केजरीवाल को नकारात्मक दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इससे लोगों में नाराजगी हुई, इसी कारण से उन्होंने भाजपा से दूरी बनाई और आप के पास जाना बेहतर समझा।
आप का विजयी मंत्र
सस्ती बिजली, मुफ्त पानी
केजरीवाल ने अपनी 49 दिनों की सरकार में सस्ती बिजली और मुफ्त पानी का प्रावधान किया था। इससे काफी तादाद में लोगों को फायदा हुआ। लोग इस बार भी यही उम्मीद कर रहे थे और इस आधार पर उन्हें वोट देने वालों की तादाद बड़ी थी।
लोक लुभावने वादे
केजरीवाल ने इस चुनाव में वादों का पिटारा खोल दिया। हर मुद्दे के बारे में उन्होंने वादे किए। पानी-बिजली से लेकर लाखों अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी करने के वादे किए गए़ लगभग 70 तरह के वादे पार्टी के घोषणा पत्र में किए गए जबकि भाजपा ने ऐसा कुछ नहीं कहा। इससे पार्टी के समर्थकों की तादाद बढ़ी और उन्हें लगने लगा कि केजरीवाल के हर समस्या का समाधान है।
अल्पसंख्यक
इस बार 90 फीसदी अल्पसंख्यकों ने आम आदमी पार्टी को एक रणनीति के तहत वोट दिया और यही कारण है कि कांग्रेस का वोट प्रतिशत गिरा। वे आरएसएस की घर वापसी और हिन्दूवादी संगठनों की उद्दंडता से नाराज थे। उन्हें आम आदमी पार्टी में एक विकल्प दिखा।
अन्य पार्टियों के नेताओं को प्रवेश
भाजपा ने भी कांग्रेस की तरह चलते हुए अन्य पार्टियों के कई नेताओं को जगह दी। कुछ को टिकटें भी मिलीं। इससे वषों से वहां काम कर रहे स्थानीय नेता भड़क गए और उनमें से कई ने भीतरघात किया।
कांग्रेस के हार के कारण
कांग्रेस ने की खानापूर्ति
इस बार दिल्ली चुनाव काफी हद तक दो तरफा लग रहे थे। कांग्रेस खुद इसको खानापूर्ति की तरह से ले रही थी। उन्होंने प्रचार पर कोई ध्यान नहीं दिया जिसका फायदा आम आदमी पार्टी ने उठाया। उसने उनके वोट बैंक जिनमें झुग्गी-झोपड़ियां और अल्पसंख्यक थे, कब्जा कर लिया।
नहीं दिखा जोश
चुनाव के दिन नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। बूथों पर भी कांग्रेसियों में जोश नहीं दिखाई दिया। वोटरों के प्रति अपील करने की कोई इच्छा भी नहीं दिखी। कई बूथों पर तो कांग्रेसी आए भी देर से और कुछ देर रुक कर ही आए।
वरिष्ठ नेताओं ने छोड़ा साथ
दिल्ली में कई सीटों पर वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। जिससे कार्यकर्ताओं का हौंसला टूटा। उनमें जो बेहतर करने की संभावनाएं बची थी वह भी ऐसे रवैये के कारण पूरी तरह से खत्म हो गई।
पार्टी को मिला गलत संदेश
कांग्रेस ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन को दिल्ली विधानसभा चुनाव की कमान दी। लेकिन अजय माकन कांग्रेस के दिल्ली मुख्यालय में बैठे ही नहीं। इसका भी गलत संदेश पार्टीजनों के बीच गया।
नहीं दिखे बड़े चेहरे
चुनाव की तारीख का ऐलान हो जाने के बाद भी प्रचार में कांग्रेस के बड़े नेता नहीं आए। प्रचार में पहले दिन से ही विधानसभा वार जिन्हें दिखना था वो खानापूर्ति करते रहे। यहां तक कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रचार के आखरी दौर में कुछ सभाएं कीं। दिल्ली के अनुभवी जानकार नेताओं की कमी कार्यकर्ताओं को खलती रही। जनता के भरोसेमंद नेताओं की अनदेखी की गई। चुनाव प्रभारी पीसी चाको ने टीम बनाते समय इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया। अजय माकन सभी से संवाद कर पाने में नाकाम रहे।
नहीं सीखा सबक
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार का विश्लेषण हो जाने के बाद भी पार्टी ने सबक नहीं लिया। दिल्ली के चुनाव प्रभारी पीसी चाको ने चुनाव के लिए जो रणनीति बनाई वो कमजोर साबित हुई। कार्यकर्ताओं को दिल्ली चुनाव की रणनीति के बारे में पता ही नहीं चला।
पहले ही मानी हार
इस विधानसभा चुनाव में पार्टी नेताओं ने जनता और पहले कार्यकर्ताओं से मजबूत संवाद नहीं किया। उन्हे विश्वास में नहीं लिया। संदेश गया कि कांग्रेस ने चुनाव लड़ने से पहले ही हार मान ली।
नहीं ली गई कार्यकर्ताओं की राय
दिल्ली में टिकटों का बंटवारा करने से पहले विधानसभा स्तर पर कार्यकर्ताओं की राय नहीं ली गई। जो कि उम्मीदवारों के चयन में अहम मानी जाती। अच्छी और साफ छवि के उम्मीदवारों को चुनने की कोशिश ही नहीं की गई।
बाते की काम नहीं
चुनाव में ऐसे कई पार्टी नेताओं को टीम में रख लिया गया जो अति-आत्मविश्वास में थे। जो केवल पार्टी के आला नेताओं के सामने बातें तो करते रहे पर क्षेत्र में चुनाव के लिए काम नहीं किया। कई तो ऐसे थे जिन्हे विधानसभा क्षेत्र की जानकारी ही नहीं।
नहीं किया बखान
कांग्रेस ने अपनी सरकारों के कार्यकाल में दिल्ली में किए गए विकास कार्यों का बखान ही ठीक से नहीं किया। प्रचार में लगे कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को मौके के हिसाब से बयान और जवाब देने की सही ट्रेनिंग तक नहीं दी गई।
साभार विभिन्न स्रोत एजेंसी और वेबसाइट

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