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तेज रफ्तार और लापरवाही बन रही है फ्रैक्चर की वजह

तेज रफ्तार से बाइक चलाने और खानपान में गड़बड़ी जैसे विभिन्न कारणों से आजकल अस्पतालों में हड्डी टूटने वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। बाइक फिसलने से लेकर फर्श पर स्लिप होने जैसे सामान्य एक्सीडेंट के घायलों में लगभग 40 प्रतिशत व्यक्तियों की तीन से पांच हड्डियां तक टूट रही हैं।

हाथ की कलाई, पैर और कूल्हे में फ्रेक्चर दुपहिया वाहनों से होने वाली दुर्घटना में सबसे ज्यादा देखने में आता है। इसमें हिप बोन यानि कि कूल्हे का फ्रेक्चर सबसे अधिक खतरनाक है। जोकि आर्थाेपीडिक चिकित्सकों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। सबसे ज्यादा हैरान कर देने वाला तथ्य यह भी है कि शहरों में रह रहे युवाओं की हड्डियां केल्शियम की कमी के कारण और ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं की हड्डी प्रोटीन की कमी के कारण कमजोर हो रही हैं। इसलिए ऐसे में आवयश्कता पड़ती है एक कुशल आर्थाेपीडिक डॉक्टर और जीवन में कुछ सावधानियों की।  इसी स्वास्थय समस्या पर आज हम विस्तार से चर्चा कर रहें हैं।

सड़क हादसों में घायल होने वाले सिर पर चोट न लगने के चलते बच जाएं, लेकिन शरीर के बाकी के हिस्से की चोट से नहीं बच सकते। जोकि काफी गंभीर भी हो सकती है। जो मरीज को अपाहिज तक बना सकती है। इसमें सबसे ज्यादा खतरनाक हिप बोन(कूल्हे की हड्डी) और बेक बोन (रीढ़ की हड्डी) की चोट होती है।  एम्स के ट्रॉमा सेंटर में पहुंचने वाले घायल 20 फीसदी युवा हैं। जो 20 से 35 साल की उम्र के हैं। एम्स के अलावा देश भर के अस्पतालों में पहुंचने वाले मरीज सड़क हादसों के अलावा घर, स्कूल, कॉलेज  या ऑफिस में दुर्घटना के चलते पहुंचते हैं। कभी कभी ऐसा भी होता है कि सड़क के किनारे खड़े लोगों को किसी वाहन ने टक्कर मारी और उनको गंभीर फ्रेक्चर हुए। जिसकी एक ही वजह होती है बस जरा सी लापरवाही। और यह चूक दे जाती है जीवनभर का दर्द।

युवा मरीजों की संख्या ज्यादा: फार्टिस हॉस्पीटल नोएडा में सीनियर कंसलटेंट ऑफ ऑर्थोपीडिक एण्ड हेड ऑफ दि डिपार्टमेंट डॉक्टर अतुल मिश्र के मुताबिक अस्पतालों में पहुंच रहे मरीजों में मल्टीपल इंज्युरी के मामलों के साथ साथ सड़क हादसों की वजह से कूल्हे की चोट के मामले भी तेजी से बढ़ रहें हैं। सड़क हादसों के  घायलों में ऑर्थोपीडिक इंज्युरी के मरीजों में करीब 4क् फीसदी हाथ की कलाई और हिप बोन फ्रेक्चर से पीड़ित होते हैं। ये दोनों फ्रेक्चर बेहद गंभीर किस्म की स्थिति होती है जो किसी भी मरीज को बाकी उम्र के लिए काम करने और चलने—फिरने से लाचार कर सकती है।

क्यों होते है ऐसे फ्रेक्चर: सड़क हादसों में तेज रफ्तार दोपहिया वाहन से गिरने पर चालक के शरीर का पूरा भार हाथ की कलाई या हिप बोन के हिस्से पर ही आता है। इसके बाद सिर नीचे लगता है। इसीलिए हाथ, बाजू या पैर टूटने के अलावा गंभीर चोट कूल्हे की हड्डी या सिर में लगती है। हेल्मेट सिर तो बचा लेता है, लेकिन हिप बोन टूट जाती है


क्यों हैं गंभीर हिप बोन फ्रेक्चर: हिप बोन फ्रेक्चर में सबसे बड़ी परेशानी यह होती है कि कूल्हे की हड्डी का निचला और पतला हिस्सा बहुत छोटे—छोटे टुकड़ों में टूटता है जिसे  बैग ऑफ बोन्स के नाम से भी जाना जाता है। ऐसे हादसों के मरीजों को फिर से पैरों पर खड़े होने लायक बनाना नामुमकिन सा हो जाता है, इसी हिस्से में टांग की हड्डी कूल्हे के साथ जुड़ी होती है।


फ्रेक्चर के बाद जरुरी है फिजियोथैरेपी 

प्लास्टर लगने के बाद हड्डी जुड़ने की प्रक्रिया को बल मिलता है, क्योंकि हड्डी टूटने के स्थान पर कैल्शियम का जमाव होना जरुरी है और इसी तरह हड्डियों के 2 टूटे सिरे आपस में जुड़ते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अस्थियों के आसपास मौजूद माँसपेशियाँ प्लास्टर के भीतर कार्यहीन अवस्था में बिना संकुचन के शिथिल पड़ी रहती हैं।

फिजियोथेरेपिस्ट अपूर्वा के मुताबिक प्लास्टर के कटते ही रोगी अपनी पुरानी शक्ति को दुबारा हासिल करना चाहता है और ऐसे में फिजियोथैरेपी कारगर साबित होती है। मांसपेशियों की शक्तिहीन स्थिति को ठीक करना और टूटे हुए अंग की संकुचित हो चुकी गति—चाल (रेंज ऑफ मूवमेंट) को पूर्व कार्य अवस्था में लाना ही फिजियोथैरेपी का काम है। अस्थि—जोड़ को अपनी पहले जैसी शक्ति को हासिल करने के लिए माँसपेशियों की कसरत जरूरी है। जिससे अस्थि-जोड़ को पूर्वावस्था में लाने और पहले की तरह वजन उठाने लायक सक्षम बनाने में सहायता मिलती है। जोड़ प्रत्यारोपण के ऑपरेशन के बाद भी पहले जैसी ताकत हासिल करने में फीजियोथेरेपिस्ट महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसलिए फीजियोथेरेपिस्ट की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

फ्रैक्चर से बचाव और उपचार  
हड्डियों की मजबूती के लिए क्या करें—
अगर आपका दिनभर बैठने का काम है तो सुबह या शाम अपने पास के पार्क में घूमने के लिए अवश्य जाएँ। किसी शारीरिक गातिविधि में शामिल हों जैसे जॉगिंग, स्वीमिंग, योग, बैडमिंटन।

खाने की खराब आदतों को छोड़ें। कोल्ड ड्रिंक की जगह दूध पिएं। स्वस्थ व संतुलित डाइट लें जिसमें विटामिन डी भी हो ताकि कैल्शियम हजम करने में मदद मिल सके। अगर पथरी होने की आनुवांशिक शिकायत है तो खूब पानी पिएँ। अगर आप अधिक कैल्शियम लेते हैं और पर्याप्त पानी नहीं पीते तो पेशाब में कैल्शियम जमा हो जाता है और पथरी बनने लगती है। इसके साथ ही दिन में धूप जरूर लें। धूम्रपान ,तंबाकू आदि के इस्तेमाल से बचें। खाने में प्रोटीन वाले तत्वों का भी ज्यादा इस्तेमाल करें।

अगर आप स्वस्थ हड्डियों के मालिक बनना चाहते हैं तो जरूरी है कि आपके शरीर में पर्याप्त कैल्शियम हो क्योंकि जब शरीर में पर्याप्त कैल्शियम होता है तो वह चेहरे पर अंदरूनी मजबूती के तौर पर झलकता है।

शरीर में लगातार पर्याप्त कैल्शियम का बनते रहना बहुत जरूरी है क्योंकि शरीर रोज  कैल्शियम गँवाता है—त्वचा, नाखूनों, बालों और मल के जरिए। इस खोए हुए कैल्शियम की पूर्ति का ध्यान रखना आवश्यक है। अगर आप इसका ध्यान नहीं रखेंगे तो आपका शरीर आपकी हड्डियों से कैल्शियम लेने लगेगा। परिणामस्वरुप आप बाहर से भले कमजोर न दिखें लेकिन अंदर ही अंदर आपकी हड्डियाँ खोखली हो जाएँगी और शरीर कमजोर।

बहरहाल, जीवनभर आपकी हड्डियों की सेहत कैसी रहेगी यह इस बात पर निर्भर करता है कि किशोरावस्था में क्या ख्याल रखा गया था। शरीर कैल्शियम को सही हजम कर सके, इसके लिए पर्याप्त मात्र में विटामिन डी भी मिलना चाहिए, जो कि सूरज से हासिल होता है। लेकिन तीव्र धूप से बचें। विशेषज्ञों का कहना है कि आहार में कैल्शियम सप्लीमेंट शामिल करने से पहले डॉक्टर से सलाह अवश्य ले लें।


ऐसी भी गला रहा है हड्डियां 

फार्टिस हॉस्पीटल नोएडा में सीनियर कंसलटेंट ऑफ ऑर्थोपीडिक एण्ड हेड ऑफ दि डिपार्टमेंट डॉक्टर अतुल मिश्र ने बताया कि पूरे दिन एयरकंडीशन में रहने की वजह से लोगों में विटामिन डी की कमी हो रही है। इससे कम उम्र में ही हड्डियां कमजोर होती जा रही हैं। विटामिन डी की कमी का मुख्य कारण सनलाइट के साथ शरीर का एक्सपोजर नहीं होना है।

लोग घर से लेकर ऑफिस तक एसी में ही ज्यादा समय गुजारते हैं। ऐसे में विटमिट डी का प्राकृतिक स्नोत सूर्य की किरणें शरीर में प्रवेश ही नहीं कर पा रहीं हैं। बच्चाों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। क्योंकि आजकल एसी स्कूलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। विटामिन डी मेटाबॉलाइज कैल्शियम बनाने में मदद करता है। इससे हड्डियों का विकास होता है। यह बढ़ते हुए बच्चाों के लिए जरूरी होता है सनलाइट के अलावा कुछ साल पहले तक डालडा घी से यह मिलता था। यह घी इस विटामिन से फोर्टिफाइड किया जाता था। रिफाइंड के साथ ऐसा नहीं है।


कालों को चाहिए ज्यादा धूप
विशेषज्ञों के मुताबिक सप्लीमेंट्स फूड्स के जरिए विटमिन डी चाहने वाले लोगों को चाहिए कि वो प्राकृतिक स्नोत पर भी ध्यान दें। इसके लिए रोज धूप में थोड़ी देर का एक्सपोजर आवश्यक है। गोरे लोगों को धूप में पन्द्रह मिनट बैठने पर ही विटामिन डी की कमी पूरी हो जाती है। वहीं काले लोगों को दो घंटे की धूप चाहिए। लोगों में यह गलतफहमी है कि सुबह की धूप फायदेमंद होती है। जबकि दोपहर 12 बजे से लेकर 3 बजे की धूप सबसे ज्यादा असरदार होती है।

जो महिलाएं बुर्का पहनती हैं उन महिलाओं के शरीर में धूप का प्रवेश नहीं हो पाता है। वहीं जो लड़कियां सनस्क्रीन और धूप में मुंह और हाथों को ढककर चलती हैं उनकी भी हड्डियां कमजोर होती हैं।


धूम्रपान और तंबाकू करता है हड्डियां कमजोर
यदि आप ज्यादा धूम्रपान या तंबाकू का सेवन करते हैं, तो यह आपकी हड्डियों के लिए खतरनाक है। अधिक धूम्रपान से हड्डियों के जोड़ को मजबूत बनाए रखने वाले कंपाउंड डैमेज होने लगते हैं और हड्डियों के जोड़ कमजोर हो जाते हैं। हल्की चोट में भी फ्रेक्चर होने का खतरा बढ़ जाता है। एक बार फ्रेक्चर हो जाए तो हड्डियां आसानी से नहीं जुड़ पाती हैं। धूम्रपान करने वालों में धूम्रपान न करने वाले लोगों की तुलना में फ्रेक्चर ठीक होने के संभावना कम हो जाती है।

हड्डी कैंसर का खतरा 
अधिक धूम्रपान से हड्डियों में कैंसर का खतरा बन जाता है। हड्डियों का कैंसर सबसे खतरनाक कैंसर में से एक है। हड्डियों के कैंसर का पता बहुत देर में चल पाता है। ज्यादा धूम्रपान से पाचन तंत्र भी खराब हो जाता है। खाना डाइजेस्ट नहीं हो पाता है और हमेशा पेट खराब रहता है। पाचन तंत्र खराब होने पर कितना भी प्रोटीन और कैल्शियम भोजन में लिया जाए, वह शरीर को नहीं मिलता है।

आस्टियोपोरोसिस के चंगुल में महिलाएं  
गृहिणी या वर्किग वूमेन (कामकाजी महिला) की भूमिका को निभाना शारीरिक व मानसिक तौर पर बहुत ही मुश्किल भरा और थकाने वाला होता है। ऐसी जीवनशैली में उन्हें व्यायाम का वक्त नहीं मिल पाता है जब कि स्वस्थ जीवन के लिए यह बेहद अहम है। महिलाएं समाज में अलग अलग भूमिकाएं निभाते हुए वह अपनी सेहत को अनदेखा कर जाती हैं। पूरा दिन काम करते करते वह यह भूल जाती है कि उसका शरीर पुरूष से भिन्न है और उसे कुछ अतिरिक्त देखभाल की जरूरत है। इसी भाग दौड़ में महिलाएं आस्टियोपोरोसिस रोग की चंगुल में फंस जाती हैं।


यदि महिलाएं दुबली पतली  या छरहरी बदन की हैं और लंबाई कम है तो इस रोग की संभावना ज्यादा होती है। कुछ हद तक यह रोग वंशानुगत भी होता हैं। यदि मां इस रोग ग्रसित है तो संतानों विशेषकर लड़की को इस रोग का खतरा ज्यादा होता है। आलसी, आराम तलब, मदिरा और ध्रूम्रपान करने वाली ियों में रोगग्रस्त होने की संभावना ज्यादा होती हैं। संतानहीन महिलाएं भी इस रोग की चपेट में आ सकती हैं। फार्टिस हॉस्पीटल नोएडा में सीनियर कंसलटेंट ऑफ ऑर्थोपीडिक एण्ड हेड ऑफ दि डिपार्टमेंट डॉक्टर अतुल मिश्र ने बातचीत में बताया कि यदि लंबे समय तक  भोजन में प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन डी की कमी है तो रोग की संभावना बढ़ जाती है। इस रोग से पीड़ित महिलाओं की संख्या मेट्रो शहर खासतौर पर दिल्ली एनसीआर में लगभग 80% है और जिसकी वजह है उनकी जीवनशैली।
ऐसे में यह प्रश्न हमारे जेहन में आता है कि आस्टियोपोरोसिस क्या है और यह बीमारी है क्या बला।

आस्टियोपोरोसिस है क्या— आस्टियो का मतलब हड्डी से है और पोरोसिस का अर्थ कमजोर या मुलायम करना। इस बीमारी का पता तब तक नहीं चलता जब तक कि हड्डियां नर्म होकर टूटने नहीं लग जातीं। शुरुआत में हड्डियों में इतना तेज दर्द भी नहीं होता कि इस बीमारी को पकड़ा जा सके, इसलिए इस बीमारी को ‘साइलेंट डिज़ीज़’ के नाम से जाना जाता है। आस्टियोपोरोसिस ऐसी स्थिति है, जब हड्डियों का घनत्व कम हो जाता है और इनकी शक्ति कम होने लगती है। जिसके परिणामस्वरुप हड्डियां आसानी से चटकने लगती हैं। ज्यादातर मामलों में हड्डियां केवल मूवमेंट या छोटी—मोटी चोट से भी टूटने लगती हैं।  जिसका मुख्य कारण हड्डियों का स्पंज की तरह मुलायम होना है।

सामान्य हड्डियां प्रोटीन, कोलेजन और कैल्शियम से मिलकर बनी होती हैं। ये सारे तत्व हडिडय़ों को मजबूती देते हैं, लेकिन इस बीमारी में हड्डियां मजबूती खोकर दो तरीके से नष्ट होती हैं, अपने आप ही क्रेक होना या फिर कोलेप्स हो जाना। इस दौरान रीढ़, नितंब, पसली और कलाई की हड्डियों में फ्र क्चर सबसे आम होता है, लेकिन बॉडी की बाकी हड्डियों में भी फ्रेक्चर की संभावना बढ़ी हुई होती है। ऑस्टियोपोरोसिस रोग धीरे से हमारे हड्डियों में प्रवेश कर जाता है जिसका पता देर से चलता है। जैसे जोड़ों में दर्द रहना, चाल में टेढ़ापन आना, दोनों घुटनों में गैप का बढऩा, हड्डियों का टेढ़ा होना, फ्रेक्चर होना आदि।

रोग के लक्षण : रोग की शुरुआत में पीठ और कमर में हल्का दर्द बराबर रहता है। कार्य करने, झुकने, बिस्तर से उठने, एकाएक खड़े होने से दर्द बढ़ जाता है। शरीर की अन्य हड्डियों के छूने से भी दर्द हो सकता है। रोग बढऩे पर लगातार दर्द होता है और बीच—बीच में बदन—पीठ, कमर में तेज दर्द होता है। महिलाओं को दैनिक कार्य करने में दिक्कत होती है। आराम करने से तेज दर्द से राहत मिलती है, पर हल्का दर्द बना रहता है। पीठ की हड्डी में फ्रेक्चर हो सकते हैं, कमर झुक सकती है। कूल्हे, कलाई, पैर, बांह, जांघ की हड्डियां मामूली चोट, झटके लगने टूट सकती हैं। नाखून कमजोर हों, जरा—सी चोट पर फट जाते हों, भूरे और रुखे हों, बहुत धीमी रफ्तार से बढ़ते हों और टूटकर उल्टी दिशा में मुड़ जाते हों, दिनभर थकान महसूस हों, तो समझना चाहिए कि शरीर में कैल्शियम की कमी है। कभी—कभी रीढ़  की तंत्रिकाओं में दवाब के कारण सिमाटिका (पैर में असहनीय दर्द) या पेशियों की शक्ति में कमी या फालिज की समस्याएं हो सकती हैं। गंभीर आस्टियोपोरोसिस के कारण महिलाएं विकलांग हो सकती हैं।

एजिंग भी है वजह— हड्डियां 26 से 30 साल के बीच सबसे ज्यादा मजबूत होती हैं क्योंकि इस उम्र में हड्डियों का घनत्व अपने शिखर पर होता है। इसी दौरान हड्डियां खुद ही कमी की भरपाई कर लेती हैं और नए बोन टिश्यूज़ बनने लगते हैं। लेकिन 35 साल की उम्र के आस—पास हड्डियों की व्यवस्था कमजोर होना शुरू हो जाती है और धीमे—धीमे इनका घनत्व कम होता जाता है। उम्र बढ़ने के साथ ही हड्डियों को मजबूती देने वाले सेक्स हार्मोन्स—एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन का संतुलन बिगड़ने लगता है और हड्डियों का खुद—ब—खुद होने वाला सुधार बंद हो जाता है और वो कमजोर हो जाती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक कैल्शियम की कम खुराक हड्डियों के घनत्व को कम कर देती हैं, जिससे ये कमजोर होने लगती हैं। डॉक्टर इससे बचने के लिए शुरुआत से ही अपने आहार में कैल्शियम और विटामिन डी की खुराक सुनिश्चित करने की सलाह देते हैं।

मिनोपाज़ के बाद आस्टियोपोरोसिस का असर 
फार्टिस हॉस्पीटल में सीनियर कंसलटेंट ऑफ ऑर्थोपीडिक डॉक्टर अतुल मिश्र  के मुताबिक आस्टियोपोरोसिस मुख्य रूप से 40 साल की उम्र के बाद महिलाओं में मिनोपाज़ के बाद की मुख्य समस्या है। अत: रजोनिवृत्ति के बाद  महिलाओं को हड्डियों की सघनता की जांच जरुर करानी चाहिए।  जिससे रोग का शुरुआत में पता लगया जा सके।

ियों के कूल्हे उन के घुटनों के मुकाबले चौड़े होते है और घुटनों के जोड़ उतने सीधे नहीं होते हैं जितने कि पुरूषों के होते हैं इसलिए ी शरीर की संरचना की वजह से उनके घुटनों में चोट लगने की संभावना बढ़ जाती है। यही नहीं, अनुसंधान बताते हैं कि ी हारमोन ऐस्ट्रोजन उनके कार्टिलेज पर असर डाल सकते हैं। ऐस्ट्रोजन कार्टिलेज को इंफ्लेमेशन सूजन और जलन से बचाते हैं। इंफ्लेमेशन से ओस्टियोआथ्र्राइटिस हो सकता है। पद्यपि रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं का ऐस्ट्रोजन स्तर नीचे चला जाता है। जिससे हड्डियों की क्षति का जोखिम बढ़ जाता है।

सीनियर ऑर्थोपीडिक डॉक्टर अतुल मिश्र  का कहना है कि औस्टियोआथ्र्राइटिस जोड़ों का एक विकार है, जो लाखों भारतीयों को प्रभावित करता है। इससे हड्डियां कमजोर होती हैं और फ्रेक्चर की संभावना बढ़ जाती है। आस्टियोपोरोसिस एक बिना किसी बाहरी लक्षण लगातार बढने वाली बीमारी है। जिसके कारण हड्डियां पतली और कमजोर होने लगती हैं और रजोनिवृत हो चुकी महिलाओं में आमतौर पर यह बीमारी पाई जाती है, लेकिन पुरूषों को भी यह बीमारी हो सकती है, जैसे—जैसे हड्डियां और ज्यादा छिद्रयुक्त और कमजोर होती जाती है, हड्डी टूटने का जोखिम और बढ़ता जाता है।

अक्सर शुरूआत में इसके कोई लक्षण तब तक नहीं दिखाई देते जब तक एक बार हड्डी नहीं टूटती। आस्टियोपोरोसिस के कारण आम तौर पर रीढ़, कूल्हे और कल्हाई की हड्डी टूट जाती है। दो में एक ी और चार पुरूषों में से एक पुरूष को 50 वर्ष से अधिक उम्र में आस्टियोपोरोसिस के कारण फ्रेक्चर हो सकता है.

उपचार और बचाव
आस्टियोपोरोसिस रोग के चंगुल में आने के बाद स्थायी उपचार अभी उपलब्ध नहीं है। बस इस रोग बढऩे से रोका जा सकता है। तेज दर्द होने पर एक से तीन हफ्ते का आराम, नियमित व्यायाम, सिकाई, दर्द निवारण दवाइयों के सेवन से राहत मिल सकती है। इस रोग को बढऩे से रोकने के लिए भोजन तथा जीवन शैली में सुधार आवश्यक है। कैल्शियम (एक से 1.5 ग्राम प्रतिदिन), विटामिन डी (400 से 800 आई.यू.), प्रोटीन, दूध, फल, हरी सब्जियां, दुग्ध पदार्थो का नियमित सेवन करें। शराब, सिगरेट, तम्बाकू से परहेज करें। सक्रिय और तनावमुक्त रहें। नियमित रुप से 30 से 40 मिनट प्रतिदिन व्यायाम करें।

महिलाओं की गर्भावस्था, स्तनपान कराते समय कैल्शियम की आवश्यकता बढ़ जाती है। इस दौरान और रजोनिवृत्ति के बाद नियमित रूप से दूध और दुग्ध पदार्थो का सेवन करना चाहिए। आस्टियोपोरोसिस से बचाव के लिए कुछ चिकित्सक रजोनिवृत्ति के बाद फ्लोराइड (250.मि.ग्रा.) कैल्शियम (एक ग्राम) तथा विटामिन डी (1.22 माइक्रोग्राम) की गोली प्रतिदिन सेवन की सलाह देते हैं।

भोजन से कीजिए भरपाई—कैल्शियम से भरपूर खाद्य पदार्थो को अपने दैनिक भोजन में शामिल करें। ऐसा आहार बढ़ते बच्चाों के साथ ही बुढ़ापे की तरफ बढ़ रहे लोगों के लिए भी फायदेमंद होता है। खाने में दूध को अवश्य शामिल करें क्योंकि एक कप शुद्ध दूध में 300 मिलीग्राम कैल्शियम होता है। लो—फैट दूध से बनाया गया दही भी लाभकारी होता है। मछली,हरी फूलगोभी, सोयाबीन से बना पनीर या चीज़। कई मेडिकल खोजों के मुताबिक कैल्शियम की खुराक बढ़ाने के अलावा एक सप्ताह में कम से कम तीन से चार बार वजन उठाने संबंधी एक्सरसाइज़ करना आस्टियोपोरोसिस से बचाव का प्रभावी उपाय है। आहार संबंधी आदतें आपको बहुत तरह की बीमारियों से बचा सकती हैं खासकर ऑस्टियोपोरोसिस से।

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