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2013 में हावी रहा यौन उत्पीड़न का मुद्दा

 


महिलाओं की अस्मिता, सम्मान और सुरक्षा को लेकर भारतीय जनमानस की चेतना जागृत करने तथा युवाओं में अभूतपूर्व आक्रोश की ज्वाला पैदा करके उन्हें सड़कों पर उतार देने वाले निर्भया कांड के असर से बीते पूरे साल यौन उत्पीडन का मुद्दा हावी रहा।
     
न्यायमूर्ति जे एस वर्मा कमेटी की सिफारिशों के अनरूप घार की चहार दीवारी से लेकर सार्वजनिक और कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनने के साथ ही पुलिस एवं प्रशासनिक स्तर पर तमाम सुधार किये गये जिसके परिणामस्वरुप आधी आबादी के उत्पीडन के न सिर्फ रिकार्ड मामले दर्ज किये गये बल्कि कानूनविद, राजनेता, धर्मगुरू नौकरशाह, पत्रकार और सगे संबंधियों के यौन उत्पीडन के आरोपों की गिरफ्त में आने से आस्था, विश्वास, भरोसा और स्थापित मान्यताएं तार-तार होती रहीं।
     
दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 को चलती बस में जानवरों की तरह भयानक दरिंदगी से सामूहिक दुष्कर्म की शिकार असहाय लेकिन बहादुर बिटिया की चीत्कार देश, विदेश में गूंजती रही। दिल को दहलाकर रख देने वाली इस घाटना से उद्वेलित युवाओं के स्वत.स्फूर्त आंदोलन से जागी सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा बंदोबस्त मे आमूल चूल सुधार लाने के लिए न्यायमूर्ति वर्मा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की। 

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