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नहीं भूला पाएगा 2013 को मुजफ्फरनगर

देश के मानचित्र पर गुड, खांडसारी की मिठास और आपसी सौहार्द्र की वजह से मोहव्बत नगर के नाम से पहचान बनाने वाले मुजफ्फरनगर जिले के लोगों के लिये कवाल गांव की घटना और गन्ना किसानों की परेशानी के कारण बीता वर्ष कडवाहट भरा रहा।
     
जिले के जानसठ इलाके के कवाल गांव में 27 अगस्त को छेडछाड को लेकर हुयी दुखद घाटना के बाद सात सितम्बर को नगला मंदौड में पंचायत के बाद अचानक भड़की साम्प्रदायिक हिंसा ने गंगा, जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की भावना को तार-तार कर एक दूसरे को खून का प्यासा बना दिया। इस घटना ने जहां एक दूसरे के विश्वास को तोडा वहीं नफ्करत की आग पडोसी जिलों में फैल गयी।
     
कंवाल की घटना के बाद दोनों सम्प्रदायों के बीच हुयी हिंसा को काबू करने के लिए जिला प्रशासन को ग्रामीण क्षेत्रों में सेना बुलानी पडी। ऐसा मंजर आजादी के समय भी इस क्षेत्र में देखने को नहीं मिला। इस घटना में कई निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पडी और बडे पैमाने पर सम्पति को नुकसान पहुंचा।  

इस घटना के बाद मुजफ्फरनगर शहर में कोतवाली नगर, सिविल लाइन्स और नई मण्डी थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाना पडा और ग्रामीण क्षेत्रों में फैली हिंसा को काबू करने के लिए सेना की सहायता ली गयी और भारी संख्या में के न्द्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर स्थिति पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सका।
       
मुजफ्फरनगर में हुयी हिंसा की प्रतिक्रिया आसपास के शामली, बागपत, मेरठ, बिजनौर और सहारनपुर जिलों में हुई लेकिन समय रहते हालात को काबू कर प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने में राज्य सरकार ने गम्भीरता से कार्य किया। मृत व्यक्तियों के परिजनों को सरकारी नौकरी के साथ आर्थिक मदद उपलव्ध करायी गयी।
       
मुजफ्फरनगर दंगों के प्रभावित 74 घायलों को रानी लक्ष्मीबाई पेंशन योजना के तहत 4०० रुपये प्रतिमाह की दर से पेंशन स्वीकृत की गयी। जिन व्यक्तियों की चल-अचल सम्पत्ति का नुकसान हुआ ऐसे 1०54 व्यक्तियों को छह करोड़ 84 लाख रुपये से अधिक धनराशि शासन द्वारा दी गयी। मुजफ्फरनगर के उन किसानों को जिनकी ट्रैक्टर ट्रालियों तथा गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचा है उनके लिए 56 लाख रुपये से अधिक की आर्थिक सहायता दी गयी।

साम्प्रदायिक घटनाओं से भयभीत हो अपने घरों से पलायन कर गये लगभग 51 हजार व्यक्तियों को 58 राहत शिविरों में ठहरने की व्यवस्था करते हुए उन्हें मूलभूत सुविधाएं और अन्य दैनिक उपयोग की सामग्री उपलब्ध करायी गयी।
     
प्रदेश सरकार ने किसी भी दशा में अपने गांव लौटने के लिए तैयार ना होने वाले नौ गांवों के 1534 परिवारों के 85०० से अधिक से अधिक सदस्यों को अपनी इच्छा से चयनित स्थानों पर बसने के लिए पांच-पांच लाख रुपये प्रत्येक परिवार की दर से कुल 76.7० करोड़ रुपये की धनराशि उपलब्ध करायी गयी।
       
मुजफ्फरनगर हिंसा पर राजनीति भी खूब हुयी। सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी ने इस घटना के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को जिम्मेदार ठहराया जबकि भाजपा ने सपा को वोट की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए उसे कटघरे में खडा किया। घटना के बाद भाजपा के दो विधायकों सुरेश राणा और संगीत सोम पर रासुका लगायी गयी लेकिन बाद में एडवाइजरी कमेटी ने उसे रद्द कर दिया।
       
मुजफ्फ्करनगर की घटना के बाद भड़काऊ भाषण देने के मामले में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सांसद कादिर राणा (भाजपा) विधानमंडल दल के उपनेता हुकुम सिंह, कांग्रेस के पूर्व मंत्री सइदुज्जमा, भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत और प्रवक्ता राकेश टिकैत समेत बडी संख्या में राजनीतिक नेताओं के नाम मुकदमें दर्ज हुए।
     
मुजफ्फरनगर की घटना को लेकर 6०० से अधिक मुकदमें दर्ज किए गये। जिनके बाद सरकार पर भेदभाव का आरोप भी लगा। मुजफ्फरनगर हिंसा के बाद बिगडे माहौल को सुधारने की कवायद शुरु हुयी और पूर्व में रहे पुलिस अधिकारियों जिनमें पुलिस महानिरीक्षक आशुतोष पाण्डेय को आगरा के साथ मेरठ परिक्षेत्र का अतिरिकित प्रभार देकर वहां भेजा गया। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में अपर पुलिस अधीक्षक के पद पर रहे ओंकार सिंह को मेरठ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाया गया।

मुजफ्फ्करनगर हिंसा के बाद बडे पैमाने पर पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादले किए गये। अधिकारियों और क्षेत्र के लोगों के बीच आपसी सद्भाव बनाये जाने के लिए किए गये प्रयासों से मुजफ्फ्करगनर जिले में अब हालात काफ्की सुधरे हैं और लोगों में एक दूसरे के प्रति विश्वास बढ रहा है।

क्षेत्र के लोगों का कहना है कि अगर प्रदेश सरकार समय रहते कवाल की घटना को गंभीरता से लेते हुए आरोपियों पर कार्रवाई करती और राजनीतिक दखल नहीं होता तो मुजफ्फ्करनगर को दंगों के इस दाग से बचाया जा सकता था। मुजफ्फरनगर की घटना के बाद प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दु:ख जताते हुए इसे एक धव्बा करार दिया था।
     
मुजफ्फरनगर की घटना के बाद राजनीति शुरु हुयी और सभी दल एक दूसरे पर आरोप लगाते हुए पीडितों से हमदर्दी जताने तो पहुंचे लेकिन राहत शिविरों में ठंड से मरने वालों को किसी दल ने राहत नहीं पहुंचायी। इस घटना को उच्चतम न्यायालय ने भी गंभीरता से लिया और सरकार को आवश्यक निर्देश दिये।
     
इन दंगों के कारण भय के चलते गुड़ खांडसारी इकाइयों में मजदूरों के नहीं आने से देर से उत्पादन शुरु होने और चीनी मिलों के देरी से चलने    की वजह से किसानों को भी परेशानी उठानी पडी। गन्ने के मूल्य और बकाया भुगतान के साथ चीनी मिल चलाने की मांग को लेकर किसानों को आन्दोलन करना पडा। 

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