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सिर्फ कूटनीति और सिर्फ कूटनीति

सिर्फ कूटनीति और सिर्फ कूटनीति

यूपी के नगर निकाय चुनाव संपन्न हो चुके हैं लेकिन उसकी तपिश अभी तक बरकरार है।  जीते और हारे उम्मीदवारों के कार्यकत्ता इस चुनाव की समीक्षा करने में लगे हुए हैं। जिसने जीत का स्वाद चखा है वह लम्बे हनीमून पर है। जो हार गया है वह कोसने और आरोप लगाने में व्यस्त है। नगर निगम और विकास प्राधिकरण के कर्मचारी अपने चिर परिचित अंदाज में चाटूकारिता में लग गए हैं। सभी नये जन प्रतिनिधियों का दरबार सज गया है। ये पार्षद अपनी गोटियां सेट करने में लग चुके है। इन के घर और दफ्तर का माहौल ऐसा है जैसे राम का राज्याभिषेक हुआ हो। वहीं हारे हुए पार्षदों का घर और आंगन सूना पड़ा हुआ है। ये लोग वोटरों को नासमझ और हार का ठीकरा अपनी टीम और विभीषणों पर फोड़ रहे हैं।

इस पूरे निकाय चुनाव में सभी हथकंडों का जमकर उपयोग किया गया। शराब और नोट जमकर लूटाए गए। प्रतियोगी उम्मीदवारों ने फर्जी वोट बैंक और वोटर तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। खाली प्लाटों और बंद पड़े मकानों पर सैकड़ों वोट तैयार किए गए। एक दूसरे के वोटों को कम करने के लिए वोटरों के नाम तक वोटर लिस्ट से उड़ा दिए गए। वोटरों को रिझाने के लिए सभी चुनावी वायदों के साथ साथ पदयात्रा, गोपनीय गोष्ठियां, डोर टू डोर जनसंपर्क, जनसमूहों के नेता या ठेकेदारों से वोटों की खरीद-फरोख्त तक का सहारा लिया गया। इस

जमीनी स्तर के चुनाव में चुनाव आयोग को जमकर अंगूठा दिखया गया। उम्मीदवारों के सामने प्रशासन ने अपने आपको बौना और कमजोर दिखाया। विकलांग प्रशासन के साथ उम्मीदवार खेलते नजर आए। होर्डिंग और पोस्टरबाजी की होड़ में जमकर पैसा उड़ाया गया। इस चुनावी मौसम में वोटों के ठेकेदार उममीदवारों से दलाली करते नजर हर खेमे में नजर आ रहे थे।  

इस सभी के बीच विचलित करने बाली बात जो सामने आई वह थी महिला उम्मीदवारों के साथ अभ्रदता, बदसलूकी, गाली गलौच, डराना धमकाना और सहयोगी कार्यकत्ताओं के द्वारा कामलोलूप नजरों से घूरना। फिर भी महिला उम्मीदवारों ने हिम्मत नहीं हारी और चुनाव लड़ा।

इन महिलाओं के साथ साथ परिवारों की भी बड़ी ही अहम भूमिका रही। जिन्होंने साहस बांधे रखा। इस चुनाव में कुछ हादसे ऐसे थे जो मेरे ही सामने घटे और मैं इस समाज की विकृत मानसिकता और गिरते आचरण को लेकर स्तबध रह गया। कई रातों तक मैं सो नही सका।

यही सोचता रहा यह कैसा समाज है जिसमें कोई लोक लिहाज नहीं बचा है। उस महिला उम्मीदवार के पति के वे शब्द जो उसने दूसरी महिला प्रत्याशी से पोलिंग वाले दिन सार्वजनिक रुप से कहे। " तू तो रंडी है। तू तो धंधा करती है।" इन शब्दों के साथ भद्दी भद्दी गालियां जो रुकने का नाम नहीं ले रही थी। इस घटना ने इस महिला को कितना अपमानित किया होगा। उसने यह कैसे सहा होगा। इसके जवान बेटे का खून नहीं खौला होगा कि एक आदमी उसकी माँ को भद्दी भद्दी गालियां दे रहा है। मैं यही सोचता रहा कि इस परिवार पर क्या बीत रही  होगी। ये लोग कैसे इसका सामना कर रहे होगे। लेकिन दूसरी तरफ यह भी ख्याल आया कि यह महिला उम्मीदवार और इसका परिवार क्या सोच रहा है। इस तरह के बेहूदा आरोपों पर इस महिला की चुप्पी की क्या मजबूरियां हैं। इस पर फैसला देने वाला मैं कौन होता हूं।

इस नगर निकाय चुनाव के दौरान में काफी लोगों से मिला। इस चुनाव और प्रत्याशियों को करीब से जानने की कोशिश की। एक बहुत ही संभ्रात परिवार की महिला उममीदवार से मैंने उसका राजनीति का पहला तजुर्बा पूछा तो उसने कहा कि " सिर्फ कूटनीति और सिर्फ कूटनीति" मैंने उसका निराशा से भरा हुआ उदास चेहरा देखा। उसके चेहरे पर वेदना साफ झलक रही थी कि उसने क्या क्या सहा है।

ऐसे ही मैं एक बहुत ही वृद्ध महिला उम्मीदवार से मिला जिसका जोश देखकर मैं दंग रह गया। यह वृद्धा 70 वर्ष की उम्र में समाज के लिए कुछ करना चाहती है। यह समाज को एक नई दिशा देना चाहती है। लेकिन इस वृद्धा का अनुभव भी वैसा ही रहा। लोग उन्हें रात को 12 बजे धमकाने पहुंचे।

इससे समझ में आता है कि आज भी तमाम कारणों से ज्यादातर स्त्रियां पुरुष की बदसलूकी और हैवानियत सहने को मजबूर हैं। क्या मजबूरी है? कौन सा डर है जो यह सब सहने को मजबूर करता है।

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