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लोगों की मानसिकता

“जी नमस्ते, मेरा नाम अजय है और में आपका नया पड़ोसी हूं। आज ही मैंने शिफ्ट किया है”

”जी नमस्ते, कहिए?”

” मुझें घर में काम करने के लिए एक बाई की जरूरत है तो क्या अपनी बाई को ऊपर भेज देंगी?”

”जरूर भेज दूँगी, वैसे कितने लोग है आप के घर में?”

” बस मैं अकेला ही हूँ।”

”अच्छा थोड़ी देर में बाई आ जाएगी।”

‘’जी धन्यवाद”... कहकर मेंने इंटेर्कोम रख दिया। थोड़ी देर बाद, दरवाजे की घंटी बजी तो  वाकई बाहर एक बाई को खड़ा पाया, मन में एक खुशी के लहर दौड़ गयी...सोचा, चलो एक समस्या का समाधान तो आसानी से हो गया। बाई से सारी बात तय हो गयी थी वक्त और पैसों को लेकर....और फिर कल से उसके आने का इंतज़ार भी शुरू हुआ...लगा कि बाई के हाथ में एक सुदर्शन चक्र है और वो कल से मेरे अव्यवस्थित घर को सजा संवार देगी। अगले रोज़ बाई का इंतज़ार करता रहा पर वो नहीं आई। उसके अगले दिन मैं परेशान सा सुसायटी में किसी नई बाई की तलाश में जुट गया। एक रोज वही बाई सामने से आती हुई नजर आ गई, वह मुझे देख कर कन्नी काटने की कोशिश करने लगी। मैंने उसे पकड़ कर पूछ ही लिया -” जब सब कुछ तय हो तो गया था फिर तुम आई क्यों नहीं?”

वो थोड़ा सहम कर बोली.....”साहेब मैं तो आना चाहती थी पर आपके बराबर वाली आंटी जी ने मना कर दिया आपके यहाँ आने से”....

”पर क्यों? तुमने उनकी बात भी मान ली, क्या तुम्हें और पैसा नहीं चाहिए?’

वो बोली...” पैसा किसे बुरा लगे है साहेब, पर आप तो यहाँ हमेशा रहने वाले हो नहीं,

वो बोल रही थी कि आप अकेले रहते हो..., जवान आदमी, और मैं भी जवान लड़की, कहीं कोई ऊंच नीच हो गई तो। उन्हें शक है कि कुछ.....कि कुछ.....”,  बाबू साहेब लोगों के चलते हाथ पकड़े जा सकते हैं लेकिन ये कमबख्त जुबान नहीं पकड़ी जा सकती। इसके आगे बाई कुछ बोली नहीं और चली गई। और मैं चुपचाप खड़ा  उसे जाता हुआ देखता रहा और सोचता रहा मेरे आदमी होने का यही गुनाह है। मुझे अपने अकेले होने का एहसास को काटने लगा....समझ नहीं पा रहा था कि क्या करुं।  खुद को शाबाशी दूँ, या अपनी पड़ोसवाली आंटी की “आदमी” शब्द की मानसिकता पर दुख मनाऊँ।

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