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क्या बदलेगी बुंदेलखंड की तस्वीर


उत्तर प्रदेश का चुनावी संग्राम हर दिन और रोचक होता जा रहा है। आजादी के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए हो रहे रिकार्ड तोड़ मतदान से चुनावों के प्रेक्षक और प्रत्याशी, दोनों की बेचैनी और बेसब्री का बांध टूटने की कगार पर है। देश के सबसे बड़े राज्य के नतीजों की चर्चा पनवाड़ी के खोमचे से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक है।

 वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश की 16 प्रतिशत जनसंख्या ( लगभग 20 करोड़ नागरिक) उत्तर प्रदेश निवासी है। इतनी बड़ी आबादी को समुचित सेवाऐं और सुविधाऐं उपलब्ध कराने में दिक्कत का हवाला देते हुए माया सरकार ने विधानसभा चुनावों से कुछ पहले ही उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित कर दिया है। केंद्र सरकार ने अपना रूख अभी स्पष्ट नही किया है लेकि यूं भी हो सकता है कि अगली बार तक उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में बंट जाए। तब यह चुनावी ज्वार अखंड उत्तर प्रदेश के आखिरी विधानसभा चुनावों का याद्गार इतिहास होगा। उत्तर प्रदेश में हो रहे सात चरणों के चुनाव में इन चारों प्रस्तावित हिस्सों में चुनाव हो रहे हैं।

इनमें सबसे बदहाल और बेदम बुंदेलखंड है। हालत यह है कि बाटला हाउस कांड की तस्वीरें देख कर रोने वाली मैडम या किसी भी दल का कोई भी इन जैसा संवेदनशील राजनेता यदि बुंदेलखंड की कड़वी सच्चाई देख और समझ ले तो नदियां बह जाऐं। अभावों की आग में जल रहे बुंदेलखंड का बुंलंद बुंदेला इतिहास अपनी दुदर्शा का सबसे भयावह दु:स्वपन साकार होते देखने को मजबूर है। उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड क्षेत्र के सात जिले आते हैं। बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, ललितपुर, झांसी और जालौन। चौथे और पांचवे चरणों में इन जिलों की 19 विधानसभा सीटों के लिए एड़ी -चोटी का जोर लगाया जाएगा। बांदा और चित्रकूट में चौथे चरण में 19 फरवरी को मतदान होगा जबकि उत्तर प्रदेश के बाकी 5 बुंदेलखंडी जिलों में पांचवे चरण में 23 फरवरी को मतदान होना है।

चुनाव लोकतंत्र के उपवन में सुधार और सकारात्मक बदलाव की उम्मीद उगा देते हैं। लेकिन बुंदेलखंड की बदनसीबी यह है कि यहां उम्मीद की किरण, हालात सुधरने की संभावना इतनी क्षीण है कि उसके ना हो का भ्रम होता है। विधानसभा की सीट पर कब्जा करने के लिए उम्मीदवारों में भले ही उत्साह हो लेकिन ग़रीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा और अपराध की मार एक साथ ङोल रहा यहां का मतदाता चुनावों के प्रति अब भी उदासीन नजर आ रहा है। रोटी कपड़ा और मकान जैसी जीने की न्यूनतम शर्तों के पीछे घिसटते हुए यहां की बड़ी आबादी अपना पूरा जीवन काट देती है। चुनावों के बड़े- बड़े लुभावने वादे इनके लिए मृगमरीचका से कम नहीं। हर बार चुनावों में बुंदेलखंड का काया पलट करने की बातें होती हैं लेकिन शायद राजनीतिक दलों को डर है कि अगर काया पलट हो गया तो अगली बार बजाने के लिए झुन्झुने कम पड़ जाएगें। पिछली बार इस दलित बहुल इलाके ने बहुजन समाजवादी पार्टी की नेता मायावती में अपना पूरा विश्वास जताया। राज्य सरकार द्वारा इस क्षेत्र में अनुसूचित जाति / जनजातीयों पर अत्याचार निरोधक क़ानून लागू किया गया। व़र्ष 2008 में बुंदेलखंड विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण भी गठित किया गया लेकिन कोई भी कदम विशिष्ट रूप से क्रांतिकारी सिद्घ नहीं हुआ। माया सरकार से पहले मुलायम सरकार के ज़माने के दौरान बुंदेलखंड ही नही पूरे उत्तर प्रदेश में अपराधी क़ानून व्यवस्था को धता बता रहे थे। बुंदेलखंड के दलित किसान के घर रात गुजारने वाले राहुल गांधी के दल के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से बुंदेलखंड विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने क्षेत्र के किसानों का वर्ष 2011 तक का कर्ज माफ कर देने की मांग की। चुनावों में मौका देने पर प्रदेश की तस्वीर बदल देने का दावा करने वाले पार्टी की सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी। माया सरकार ने पूरे ढ़ोल नगाड़े के साथ केंद्र से बुंदेलखंड के लिए 80 हजार करोड़ रू मांगे। बदले में केंद्र की तरफ से मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों के बुंदेलखंडी क्षेत्र को 7 हजार 266 करोड़ रू मिले। उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड के 7 जि़लों के हिस्से में 3 हजार 506 करोड़ रू आए। वर्ष 2009 में जारी हुयी इस राशि का अब तक मात्र 23 प्रतिशत ही खर्च किया गया है। अकूत खनिज सम्पदा से सम्पन्न बुंदेलखंड क्षेत्र से केंद्र और राज्य सरकार को हर वर्ष लगभग 500 अरब रूपए राजस्व के रूप में मिलते हैं। लेकिन जब बजट आवंटित होता है तब उत्तरप्रदेश में आने वाले बुंदेलखंड के सात जिलों को मात्र 12 करोड़ रूपए और मध्यप्रदेश में आने वाले छ: जिलों को मात्र 20 करोड़ रूपए मिलते हैं। खुलेआम यह कैसी लूट है? बुंदेलखंड के ग्रामीणों के साथ यह कैसा अन्याय है? यहां ध्यान देने वाली यह है कि उत्तराखंड के आठ जि़लों को 425 करोड़ रूपए मिलते हैं और छत्तीसगढ़ के 18 जिलों को 350 करोड़ रूपए। बुंदेलखंड के साथ हो रही इस बदसलूकी का जि़म्मेदार किसे कहा जाए?


निराशा और हताशा यहां पूरे पैर पसारे हुए हैं। बुंदेलखंड में वर्ष 2009 से अब तक हर साल आत्महत्याओं का का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2009 में 568 लोगों ने आत्महत्या की। वर्ष 2010 में 583 लोगों ने और पिछले साल पहले पांच महीनों में ही 519 लोगों ने आत्महत्या कर ली। बांदा जिला अस्पताल में 2011 के पहले पांच महीनों में 330 मामले आत्महत्या के आए थे। अक्सर इन आत्महत्याओं का कारण पारिवारिक कलह बताया जाता है। असल में आर्थिक और सामाजिक परिस्थतियां इन्हें अपना जीवन खत्म कर देने पर मजबूर कर देती है। भूगोल भी यहां कम क्रूर नहीं। वर्ष 2002, 2004 और फिर 2009 में बुंदेलखंड में अकाल पड़ा। वर्षा आधारित खेती है। 1999 से 2008 के बीच साल में वर्षा वाले दिनों की संख्या घट कर 54 से 20 हो गई है। इस क्षेत्र में भट्राचार का बुरी तरह शिकार हो रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत जो कुछ तालाब खुदे भी हैं वो क्रिकेट का मैदान बन गए हैं।  बुंदेलखंड की मिट्टी पथरीली व कम उपजाऊ है। एक लाख 9 हजार 836 हेक्टेयर बंजर भूमि पर कांटा तक नहीं उगता।

इतना सब होने के बाद भी आत्महत्या को मजबूर हो रहे पानीदारों की इस धरती पर खेती के लिए पानी की व्यवस्था असंभव नहीं है। बांदा जि़ले में यमुना, केन, बेतवा और बागमती जैसी नदियां बहती हैं। चित्रकूट में मंदाकनी, महोबा और हमीरपुर में यमुना और उर्मिल नदियां हैं। लचर प्रशासन के चलते जल समुचित जल प्रबंधन नहीं है। कई बांध परियोजनाऐं अधर में लटकी हैं। ललितपुर में भवानी बांध , कचनौधा बांध, जमुरारपुर बांध, भौरट बांध और उवारी बांध परियोजनाऐं अधूरी हैं। झांसी में सुखनई बैराज परियोजना अधूरी है। जालौन जिले में केन-बेतवा पचनंदा बांध भी पूरा होने के इंतजार में है। महोबा, हमीरपुर और बांदा के लिए अजरुन बांध परियोजना पूरा होने पर जीवनदायिनी सिद्घ हो सकती है। विराटसागर बांध परियोजना से महोबा और बांदा के विकास में वृद्घि हो सकती है। लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति का पंगु होना और अधिकतर स्थानीय नागरिकों का हालातों के आगे हार मान लेना क्षेत्र के लिए घातक सिद्घ हो रहे हैं। इन जल परियोजनाओं के पूरा होने से बुंदेलखंड की ज़मीन का उद्घार तो होगा ही साथ ही उर्जा की किल्लत दूर होने से क्षेत्र में विकास का पहिया बैलगाड़ी से मोटरसाइकिल का बन सकता है। एक दशक से इसी इंतजार में हर तरफ से हारे हुए ग़रीब किसान को  केवल कर्ज का ही आसरा दिखता है। बुंदेलखंड के ग्रामीण बैंक के अनुसार वर्ष 2011 में 4 हजार 370दशमलव  32 करोड़ रू का कर्ज लिया गया। वर्ष 2010 की तुलना में यह 21 प्रतिशत ज्यादा था। वर्ष 2010 में 3 हजार 613 दशमलव 22करोड़ रू का कर्ज लिया गया। बांदा, हमीरपुर ललितपुर और झांसी के किसानों पर 2 हजार 750 करोड़ का कर्ज है। कर्ज चुकाने में असफल होने पर आत्महत्या कर लेना यहां आम बात है। एक आंकड़े के मुताबिक जिला चिकित्सा अस्पतालों में दिन में 3 मामले आत्महत्या के आते हैं।

दूसरा रास्ता है पलायन। पिछले पांच सालों में 2.50 लाख लोग बुंदेलखंड से पलायन कर चुके हैं। केवल चित्रकूट से 30000 लोगों ने पलायन किया। पल्स पोलियो अभियान के आंकड़ों से पता चलता है कि किस तेजी से यहां से पलायन किया जा रहा है। पलायन करने वालों में सबसे अधिक युवा हैं। रोजी रोटी कमाने और बेहतर जि़द्गी की तलाश में ज्यादातर युवा पलायन कर रहे हैं। बुंदेलखंड के गांवों में या तो घरों पर ताले मिलेंगे या फिर जर्जर दीवारों के बीच जर्जर बेसहारा बूढ़ी काया। चुनाव आयोग के आंकड़े इस स्थिति को और स्पष्ट करते हैं। बांदा में कुल 11दशमलव 49 मतदाता हैं। इनमें युवा मतदाताओं की संख्या केवल 3 दशमलव 86 लाख है। चित्रकूट में 5 दशमलव 65 लाख मतदाता हैं। यहां युवा मतदाताओं की संख्या केवल 1 दशमलव 10 लाख है। महोबा में 5 दशमलव 34 लाख मतदाता हैं और युवा मतदाता 1 दशमलव 25 लाख। हमीरपुर में कुल वोटर 7 दशमलव 62 लाख हैं। इनमें युवा 2 दशमलव 35 लाख ही हैं। जालौन के 11 दशमलव 57 लाख मतदाताओं में केवल 3 दशमलव 22 लाख ही युवा हैं। बिहार में विकास के साथ स्वाभिमान की नई लहर बहने के बाद वहां से पलायन घटने से पंजाब और हरियाणा में बिहार से आने वाले मजदूरों की जहग अब बुंदेलखंड के सस्ते मजदूर ले रहे हैं। क्षेत्रीय विषमताओं और पलायन के कारण इन सात जिलों में जनसंख्या का घनत्व 280 व्यक्ति प्रति घन मीटर है जबकि उत्तरप्रदेश में जनसंख्या का घनत्व 690 व्यक्ति प्रति घन मीटर है। तेजी से हो रहे विस्थापन से यह इलाका शापित बीहड़ सा लगता है। दिल्ली के विज्ञान भवन में 44वें भारतीय श्रम सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वीकारा है कि विस्थापित मजदूरों के लिए सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा व्यवस्था में भारी खामियां हैं। अपने घर परिवार से बिछड़कर , अपनी जमीन से विस्थापित होकर भी बुंदेलखंड के भविष्य को अनेक कष्ट भुगतने पड़ रहे हैं। युवाओं के पलायन का सबसे बड़ा कारण बेरोजगारी है।

बेरोजगारी, ग़रीबी और अत्महत्याओं का कुचक्र सार्वजनिक वितरण प्रणाली की भारी खामियों और साक्षरता का स्तर जाने बिना अधूरा रह जाएगा। बुंदेलखंड में जहां 80 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है। लगभग 82 प्रतिशत के जीवन यापन का ज़रिया खेती है। जहां 75 प्रतिशत किसानों के पास खेती के लिए आधे बीघा से दो बीघा जमीन हो, जहां अकाल और कर्ज के मारे किसान आत्महत्या को मजबूर हों वहां योजना आयोग को ग़रीब नहीं दिखते। केंद्र की योजनाओं में यहां केवल 31 प्रतिशत लोग ही गरीबी रेखा से नीचे हैं। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के 7 जिलों में 19 लाख 2 हजार 159 राशनकार्ड बनाए गए हैं। इन लगभग बीस लाख राशन कार्ड में से 6 लाख ही गरीबी रेखा से नीचे और अन्त्योदय परिवारों को जारी किए गए हैं। कुछ लोगों गुंडागर्दी के दम पर राशनकार्ड बनवा लिए हैं और कुछ को जरूरत होने के बाद भी इस श्रेणी में गिना ही नहीं जाता। स्थानीय परिस्थितियों में चुनाव आयोग के सामने धनबल का दुरूपयोग रोकना एक बड़ी चुनौती होगी। इन सात जिलों में साक्षरता दर भी शर्मनाक है। ललितपुर में पुरूष साक्षरता दर 63 दशमलव 81 प्रतिशत है जबकि महिला साक्षरता दर मात्र 32 दशमलव 97 प्रतिशत ही है। लिंगानुपात के आंकड़े कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में औसतन 1000 पुरूषों पर केवल 865 महिलाऐं हैं। क्षेत्र में अकाल और गरीबी बच्चों में कुपोषण का कारण बन रहें हैं। बुंदेलखंड में 100 में से 49 बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हर साल कुपोषण से हजारों बच्चे समय से पहले ही मर जाते हैं। महिलाओं की सामाजिक हालात के बारे में क्या पूछें! गांवों में म्हिलाऐं आज भी देह पर फटे- पुराने, मैले- कुचले कपड़ों में अधनंगी ,खुले में नहाती हैं। खुले में शौच जाती हैं। महिलाओं के प्रति अपराध यहां खौफनाक स्तर तक हैं। घरलू हिंसा की कई दर्दनाक कहानियां यहां हर गांव में बिखरी पड़ी हैं। कभी अंधविश्वास के नाम पर कभी दहेज के नाम पर और कभी झूठी इज्जत के नाम पर या बलात्कार के बाद महिलाओं को जिंदा जलाने के कई मामले पिछले कुछ सालों में सामने आए हैं। पिछले साल महिलाओं को जलाने के 20 से अधिक मामले सामने आए। अधिकतर मामलों को क़ानून और प्रशासन की मिलीभगत से दबा दिया जाता है। बांदा का महिला स्वंयसेवा संगठन वरांगना या फिर संपत पाल के गुलाबी गैंग जैसे कुछ प्रयास हो रहे हैं लेकिन सरकार की तरफ से कोई ठोस उपाय नहीं है। चुनाव आयोग की तरफ से इस बार के चुनावों में महिलाओं की भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया है। ऐसी परिस्थियों में कितनी महिलाऐं मतदान करने आऐंगीं और कितनी महिलाऐ अपने उम्मीदवार का स्वतंत्र चुनाव कर पाऐंगी, कहना मुश्किल है।

चुनाव में अपनी सत्ता बनाने के लिए कांग्रेस सभी दलों ने अपना पूरा दम झोंक दिया है। पिछली बार बांदा जिले की बाबेरू विधानसभा सीट पर कांटे का मुकाबला था। सपा के बिशम्बर सिंह यादव बसपा के गया चरण दिनकर से मात्र 174 वोटों से जीते थे। इस बार भी सपा ने उन्हें ही अपनी पतवार सौंपी है। बांदा विधानसभा सीट पर कांग्रेस के विवके कुमार सिंह 231 मतों के मामूली अंतर से बसपा के बाबू कुशवाहा को पछाड़ पाए थे। कांग्रेस ने भी इस बार विवेक सिंह पर ही दांव खेला है। इस बार एक- एक सीट के लिए और भी कड़े मुकाबले की संभावना है।सताए हुए इन सात जिलों में फिलहाल चौथे और पांचवे चरण के चुनाव में जब अधिकतर भूखे पेट मतदाता, बदलाव की आशा में मतदान करेंगे। लोकतंत्र के प्रहरियों को इनकी  बची - कुची उम्मीदों को सहेजने के लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। बुंदेलखंड का दर्द कम करे की बहुत बड़ी जिम्मेदारी उनके कंधों पर होगी।

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