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हर एक फ्रेंड जरुरी होता है।

यह कॉलम लिखने की प्रेरणा मुझे सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक और ट्वीटर पर लिखी जाने वाली कुछ पोस्ट और उन पर की जाने वाली प्रतिक्रियाओं से मिली। पिछले कुछ सालों में फेसबुक और ट्वीटर जैसी सोशल साइट्स की लोकप्रियता तेजी के साथ बढ़ी है। कुछ सवाल अक्सर मुझे सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं। क्या इस नेटवर्क के जरिए बने दोस्तों का असल जिंदगी में भी महत्व है। क्या सोशल नेटवर्किंग साइटस किसी की जिदंगी बचा सकती है। जबकि सोशल नेटवर्किंग साइटस को विलेन की तरह समझा जाता है जो अवसाद फैलाती है। जबकि यह एक गलत धारणा है जिसे लोगों के ऊपर थोपा जा रहा हैं। सब कुछ आपके नजरिए पर निर्भर करता है कि आप इसे किस तरह से लेते हैं। तेज भागती दौड़ती जिदंगी में सोशल नेटवर्किंग साइट्स आपको एक दूसरे से जुड़े रहने का मौका देती है। दोस्तों फेसबुक से जुड़ी कुछ घटनाएं आपके सोचने का नजरिया बदल देंगी और उन लोगों का भी जो इसे अवसाद और निगेटिव एनर्जी फैलानी वाली मानते हैं। सबसे पहले मैं अपनी एक दोस्त से मिले अनुभव को आपके साथ बाटूंगा। वाक्या कुछ इस तरह है कि एक दिन मैंने अपनी साथी पत्रकार शशि पाण्डेय की वॉल पोस्ट पढ़ी जिसमें वह एक असहाय और आर्थिक तंगी से जूझ रहे कानपुरी पत्रकार की व्यथा थी। उस पत्रकार के लिए वह अपने सभी दोस्तों को मद्द के लिए प्रोत्साहित कर रही थी। वह पोस्ट मैं आपके लिए यहां पर ज्यों की त्यों लिख रहा हूं "ये तस्वीर एक सिनिअर पत्रकार दीपचंद पाण्डेय की है, जिंदगी भर पत्रकारिता को समर्पित रहे दीपचंद जी आज कैंसर से पीड़ित है। इसे विडंबना ही कहेंगे क़ि दीपचंद जी अपनी जिंदगी क़ि जंग लड़ रहे थे कि उनकी बेटी को ब्लड कैंसर होने क़ि बात उन्हें पता चली। कैंसर का दर्द झेल रहे दीपचंद जी के लिए अपनी बेटी को तड़पते देखना और भी कष्टकरी है। अगर आप लोग मेरे दोस्त हैं तो कृपया दीप चंद जी क़ि मदद करें। आप सब अगर थोड़ी-थोड़ी भी आर्थिक सहायता करेंगे तो दो जिंदगियां बच सकती है।" अब आप सोच सकते हैं पत्रकार शशि ने कौन सी मुहिम छेड़ी। इस महिला पत्रकार की सहायता करने की मुहिम रंग लाई और हेल्प के लिए काफी हाथ आगे बढ़े। आज इस पत्रकार के पास आर्थिक मदद पहुंच रही है।




फेसबुक ऐसे ही न जाने कितने चर्चों के लिए फेमस है। जिसमें कुछ अच्छे हैं और कुछ दुखद। ऐसा ही एक सुसाइड का दुखद हादसा गुड़गांव की छात्रा का है। जिसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। यह घटना सितंबर 2011 की है। एक युवा लव बर्ड में से युवा प्रेमी ने अपने रिलेशनशिप के टूटने की खबर अपनी वॉल पोस्ट पर लिखी कि मैं अब बहुत सकून में हूं और बहुत खुश हूं। इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आहत युवा प्रेमिका ने सुसाइड कर लिया। जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया और समाजशात्रियों, मनोवैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों के बीच में एक नई बहस को जन्म दे दिया। ऐसा नहीं हैं कि इसके दुष्परिणाम ज्यादा है। आपको याद होगा कि बॉलीवुड अभिनेता ऋषि कपूर और दीप्ति नवल ने अपने पुराने साथी किरण कपूर को भी फेसबुक के जरिए ढूंढने में सफलता हासिल की।



दोस्तों सोशल नेटवर्किंग साइटस पर रिश्ते एक क्लिक पर बनते और बिगड़ते हैं। अब देखिए मेरी एक दोस्त ने अपना जीवन साथी इसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर ढूंडा और आज वह बहुत खुश है। यहां पर पुराने और बिछड़े हुए परिचित एक दूसरे को ढूंढते मिल जाएंगें। लोगों का कहना है कि आपका एड्रेस,मोबाइल नंबर बदल सकता है लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइट पर आपको ढूंढा जा सकता है। इसलिए यह सोचना कि यह सिर्फ एक टाइम बर्बाद करने वाला काम है तो आप गलत सोच रहें हैं। इसकी उपयोगिता और पहुंच बहुत बढ़ चुकी है। आज हर व्यकित इस पर सक्रिय है। चाहे वह एक मामूली आदमी हो या फिर कोई फिल्म अभिनेता। इसकी उपयोगिता को समझने और परखने में हमारी पुलिस और मीडिया भी पीछे नहीं है। आज राजनैतिक पार्टियों के अलावा सरकारी और गैर सरकारी संगठन भी इस पर सक्रिय हैं।

क्या स्कूल-कॉलेज स्टूडेंट और वर्किंग और क्या नॉन वर्किंग, सभी इस पर सक्रिय हैं। तो दोस्तों इसको समाज में विलेन तो नहीं समझा सकता। यह अपने आप में बहुत ही अनूठा और रोचक है। एक दूसरे से जुड़े रहना और आपसी वैचारिक संबध। जहां एक पल में आपका लिखा हुआ सैंकडों और हजारों लोग पढ़ते हैं। साथ ही उस पर प्रतिकिया भी देते हैं। मैंने तो इस पर लोगों और गैर सरकारी संगठनों को ब्लड बैंक और स्वास्थय संबधी सेवाएं उपलबध कराते देखा है। इसकी उपयोगिता की दौड़ में हमारे साधु-संत और उनके अनुयायी भी पीछे नहीं हैं। दोस्तों सोशल नेटवर्किंग साइटस पर अपना ही एक अलग छोटा सा हिंदूस्तान बसा हुआ है। जहां आपको सभी मिल जाएगें। यह वह जगह है जहां पर सभी एक दूसरे से जुड़े रहने चाहते हैं। तभी मुझे सोशल नेटवर्किंग साइटस के लिए एयर टेल का यह वाक्य एकदम सटीक लगता है-" हर एक फ्रेंड जरुरी होता है।"

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