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कश्मीर बनाम जहन्नुम

मैं समझता हूं कश्मीर के मामले में जरूरत है समस्याओं और हालात पर एक नए नजरिये को अपनाने की। बीते सालों में हुई गलतियों और भूलों से सबक लिया जाए जिससे कि सूफियों की सरज़मीं कश्मीर, कश्मीर ही रहे, कुछ और न बनने पाए।

लेकिन ये क्या हो रहा है कश्मीर में... कहां तो अमन-चैन की बात हो रही थी, लेकिन कश्मीर एक बार फिर सुलग उठा है। दो महीने पहले सेना के फर्जी एनकाउंटर से उठा विवाद और फिर पत्थरबाजों का कोहराम इतना बढ़ा कि 20 साल बाद एक बार फिर श्रीनगर में हालात को काबू करने के लिए सेना को मुस्तैद करना पड़ा। लेकिन हालात सुधरने और काबू में आने की बजाय और बिगड़ते ही जा रहे हैं। कश्मीर में लगी आग बुझने का नाम नहीं ले रही है। युवा आक्रोशित हैं। लोगों के दिलों में नफरत जवां होती जा रही है। लोगों का गुस्सा ज्वाला मुखी की तरह आग उगल रहा है।



इसमें बड़ी ही शर्मनाक बात यह है कि अपनी जिम्मेदारियों से कन्नी काटने का खेल बड़े आराम से खेला जा रहा है। राजनीति का बाजार गर्म है। गृहमंत्री पी चिदम्बरम को इसके पीछे पाकिस्तान का हाथ नजर आता है और राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अब भी यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि प्रशासनिक मशीनरी फेल हो चुकी है। सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह कह रहे हैं कि हम अपनी कामयाबी को भुना पाने में असफल रहे जिसके चलते हालात इतने बिगड़ गए।


हिन्दुस्तानी नेताओं का हमेशा कश्मीर मामले में पाकिस्तान का ही हाथ क्यों नजर आता है। जब भी हालात बेकाबू हो जाते हैं तो आरोप दूसरे पर मढ़ दो। इस तरह के आरोप लोगों की भावनाओं को भड़काने का ही काम करते हैं। लोग मरते हैं तो मरे, हमारी बला से, हमारा काम तो हो गया। हिंदुस्तान की अवाम जानना चाहती है कि इस सारे बवाल के पीछे पाकिस्तान का हाथ आपको तब क्यों नजर आया, जब हालात बेकाबू हो गए। कश्मीर में तैनात सारी सरकारी एजेंसियां क्या कर रहीं हैं। ऐसी एजेंसियों का क्या फायदा जो देश के अमन चैन को बनाए रखने में अपना योगदान ना दे सकती। रही बात उमर अब्दुल्ला की, वो तो कश्मीर की नब्ज ही नहीं पकड़ पा रहे हैं। यदि वे कश्मीर के


हालातों से रुबरु होते, जानते समझते होते तो शायद तस्वीर कुछ और ही होती। उमर साहब कितने अच्छे नेता हैं और कश्मीरी जनता उन्हें कितना पसंद करती है इसका उदाहरण भारत के स्वतंत्रता दिवस पर सभी ने देखा। जो जूता उन पर फेंका गया था। वो उनके जैसे तमाम नेताओं के ऊपर था जो उनके जैसे हैं।


उमर साहब को यह मानना ही होगा कि उनसे चूक हुई है और उसका नतीजा आज पूरे देश के सामने है। कश्मीर में हालात बेकाबू हैं जो एक बार फिर 90 के दशक की याद दिला रहे हैं। जब सरेआम हजारों की भीड़ आजादी के नारे लगाती थी।


आज के मौजूदा हालात अच्छी तरह से बयां कर रहे हैं कि कश्मीर के हालात कितने बिगड़ चुके हैं। आज हर जगह हड़ताल और बंद ही नजर आते हैं। यह कश्मीर के लिए एक आम बात हो चली है।



कश्मीर में 2008 में अमरनाथ यात्रा से उठा विवाद आज भी लोगों को याद होगा। इस बवाल ने कश्मीर को किस तरह जहन्नुम में धकेल दिया था। इस पर किस कदर राजनीतिक रोटियां सेंकी गई ये किसी से छिपा नहीं है।

इसके बाद पुलवामा के शोपियां में दो युवतियों का अपहरण और बलात्कार की वजह से कितना बवाल मचा वो भी किसी से छिपा नहीं हैं। और ये साल फर्जी मुठभेड़ के नाम है। कश्मीर में चारों ओर सिर्फ कर्फ्यू ही कर्फ्यू।



इस पूरे प्रकरण में अफसोसजनक यह है कश्मीर की आग को और भड़काने की कोशिश की जा रही है। कोई न कोई ऐसा बयान आ जाता है जो आग में घी डालने का काम करता है। कश्मीर में बात चाहे अलगाववादियों की हो या पीडीपी की, ये इन हालातों के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती और उनको मिले अधिकारों को ही दोषी मानते हैं।

आप बिना हंसे रह नहीं पाएंगे और यह भी हो सकता है कि आपको गुस्सा आए यह जानकर कि जिस वक्त पीडीपी, कांग्रेस के साथ सत्ता सुख भोग रही थी तो उस समय उसे सुरक्षाबलों की इतनी संख्या नजर क्यों नहीं आई। और उनको मिले विशेषाधिकार। सत्ता क्या हाथ से गई, सबकुछ नजर आने लगा। वैल कश्मीर के हालातों के लिए किसी एक को दोषी ठहराना गलत है। यहां पर सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया तंत्र को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि वे क्या कर रहीं थी। वे कौन सी नींद में सो रहीं थी। सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया तंत्र को यह आभास पहले ही हो जाना चाहिए था कि पाकिस्तान सेना की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (आईएसआई) ने लश्कर-ए-तैयबा के साथ मिलकर पत्थरबाजों की फौज तैयार की है। आखिरकार केन्द्र और राज्य के रणनीतिकारों को यह बात समझ में क्यों नही आई कि यह पत्थरबाजी की मार, गोलियों में तब्दील हो सकती है। जनाब यह नए किस्म का आतंकवाद है। जिससे निपटना आसान नहीं होगा।

Comments

अजय जी बढ़िया लिखा है, कश्मीर का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। बीमारी का इलाज ठीक से नहीं किया जाए तो वो नासूर बन जाती है। इसका उदाहरण जम्मू-कश्मीर बनता जा रहा है।

अभी भी सरकारी मशीनरी न चेती तो यकीनन इस धरती की जन्नत कश्मीर को जहन्नुम बनने से बचाने में शायद बहुत देर हो चुकी होगी।

रही कश्मीर समस्या के पीछे पाकिस्तान का हाथ होने की। तो कश्मीर भारत का हिस्सा है, इसलिए वहां उठने वाली किसी भी समस्या का हल भारत को ढूंढना है न की पाकिस्तान को और यह बात दिल्ली में बैठे मंत्री और आला अधिकारी जल्दी समझ जाएं तो यह देश के लिए बहुत अच्छा होगा, और कश्मीर के लिए यह जरूरी भी है।

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