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मां! तू अनमोल है


मां! तू करुणा का सागर है।

प्रेममयी, दयामयी, तू ममता का दर्पण है।


धूप में छांव है, अंधकार में तू प्रकाश है,

साज में सरगम है, फूल में तू शबनम है।

प्यास में तू नदिया है, भावना में तू प्रेम है,

मन में तू दर्पण है, तन में तू जीवन है।



तू अंदर नीर बहाती है और बाहर से मुस्काती है,

तू पर्वत के समान दृढ़ है, गहरे समुन्द्र के समान शांत।

तेरा आंचल जैसे मथुरा के यमुनातट के वट-वृक्ष की छाया,

और तेरी काया जैसी गंगा की निर्मल शीतल धारा।



मेरी हंसी ने ही तुझे हंसाया, मेरे आंसुओं ने ही तुझे रुलाया,

मेरी जरा सी आह! में मां, तूने अपना सबकुछ भुलाया।



बचपन में लोरी की धुन पर मैं, झूठ ही सो जाता था।

और जैसे ही तू बाहर जाती,खूब शोर मचाता था।



स्कूल न जाने के लिए, छुपने पर तू नाराज हो जाया करती,

"अब कभी न गोद में लोरी सुनाउंगी"

कहकर डराया करती।


सुनकर, दौड़कर मैं तुझसे लिपट जाता,

बार-बार मां,मां कहकर तुझे मनाता।


दुनिया की कड़वाहट देखकरयह मन व्यथित हो जाता है।

दुखी होकर मां,फिर तेरा आंचल याद आता है।



तुझ से होकर दूर फिर भी,तुझे एक पल भुला ना पाता हूं।

जब भी थककर चूर होता, तुझे स्मरण करता हूं,

तुझे स्मरण कर, तेरी गोद में सो जाता हूं।


सच! बच्चों के लिए मां,

उनकी मां से बढ़कर होती है।

वो होते हैं किस्मत वाले,

जिनकी मां होती है।



काल-चक्र की गति में,

भले ही मेरा बचपन दूर हो गया हो।

पर मेरे मन में आज भी मां,

मैं तेरा कृष्ण और तुम यशोदा हो।

अजय शर्मा

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