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मिलेगी मंजिल
कभी कभी जीवन में कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जब मन चीत्कार कर,
बीते जीवन का,
हर पल याद कर लेता है
केवल एक क्षण में
तब मन शान्त नहीं रहता
और टूटने लगती है
जीवन की ऊर्जा जिसके सहारे
हो रहा था, पूरे
जीवन का सफर
थकने लगते हैं पांव
जबाव देने लगते हैं सांसे
मंजिले नज़र नहीं आती
गतिहीनता बढ़ती जाती है
किन्तु तब
समेट कर अपना सामर्थ्य
समेट कर अपना ऊर्जा
जुटा कर अपनी हिम्मत
कर लेना प्रण चाहिए तब
अभी तो शुरुआत है।
क्योंकि
मंजिल, इतनी आसान
न कभी थी
न कभी है
न कभी होगी।
मंजिल तक जाने के लिए
हमें बितानी है
दु:स्वपन भरी काली रात
क्योंकि हमेशा
अमावस्या तो नहीं रहती।
चांदनी को तो आना ही है।
काले साये का गम छोड़।
छोड़कर इन्हें कोसना,
दीपजला
ताकि
तेरे घर के जलते दीपों को देखकर
सीख ले ये अंबर
कि एक रात अमावस्या की
डरा नहीं सकती मानव को
क्योंकि मानव की भुजाओं में है,
असीम शक्ति
तभी तो मैं कहता हूं
मिलेगी मंजिल।

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