
अरे - जिंदगी
जिंदगी! जिंदगी!! जिंदगी!!!
चिल्ला रहा! जन जनार्दन आज का,
खो रहा भाव श्रृंगार आज के समाज का।
हो रहे हैं विप्लव, नरसंहार,
मानो प्रकृति की ओट हो,
लुट रही इज्जत-आबरु,
जन मानस का हो रहा आखेट हो।
क्या यही जिंदगी की शान है?
जल रही चिता जहां,
मान-मर्यादा और देश जाति के नाम की ।
बढ़े सरगर्मियां, अविश्वास और अरमान की।
अरे!जिंदगी
अरे!जिंदगी
तो एक सौगात है,
संबधों कीअनुपम बारात है।
स्नेह-सिंचित दिव्यज्योति की किरणें
जिसमें जलती धरा-गगन,
रवि-शशि पुलकित कलियां खिलतीं।
फिर भी
यहां भीषण कुकृत्यों का ताण्डव कैसा?
अवनि और अंबर डोले भूचाल कैसा?
गुजारिश है,
जलाओ दिए-साहस,मान और सम्मान के,
मुस्कराओं, इठलाओ,
चमकाओ मानवता के निशान को
रंगों हाथ
उपकार, हर्ष और वेदना के सौरभ में
कर समर्पित
लगो टिमटिमाने, धरा और गगन में।
होगी जिदंगी
तभीनिखरती, चमकती, मुस्कराती-सी,
झुकेगा गगन, उठेगी धरा।
मानो तुम्हें चूमती सी।
मानों तुम्हें चूमती सी।
26/11, की घटना के बाद जब सैंकड़ों लोग मोमबत्ती लेकर विरोध जताने और साहस, मान सम्मान दिखाने के लिए सड़कों पर उतर आए। वह सब कुछ देखने के बाद यह भाव मेरे मन उठे। जिन्हें मैंने शब्दों का अमली जामा पहनाया।
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