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Showing posts from August, 2009
एक थाने के बाहर कार, ट्रक और बसों का जमघट लगा हुआ नजारा आसानी से देखा जा सकता है। इस जमघट की वजह है थाने में जगह की कमी। जिसके चलते थाने के बाहर वाहनों का भारी जमघट लगा हुआ है। इन वाहनों की वजह सड़क इतनी संकरी हो चुकी है। सड़क पर वाहन आसानी से चल भी नहीं सकते। यह नजारा मैं पिछले कुछ दिनों से यूं ही देख रहा हूं। और सोचता हूं कि ऐसा क्यों हो रहा है। जिन वजहों की वजह से ये वाहन सड़क पर खड़े हैं। उन वजहों का इतना लम्बित क्यों किया जा रहा है। इन मामलों को जल्द से जल्द क्यों नही निपटाया जा रहा है। आखिर क्यों पुलिस ने सड़क पर अतिक्रमण कर रखा है। जो सड़क जन सुविधा के लिए है और जिसके लिए सरकार टैक्स तक वसूलती है। उसी सड़क पर चलने वाले पथिकों के साथ यह नाइंसाफी क्यों?कौन है जिम्मेदार? जनता या पुलिस और प्रशासन । इसमें जनता की भी जवाब देही है कि वह अपने अधिकारो के प्रति जागरुक क्यों नहीं है? यह जो हालात हैं वह एनसीआर की बहुत ही पाश और हाईटेक कालोनी वसुंधरा में बने इंदिरापुरम थाने का है। अब आप ही बताए कौन है जिम्मेदार?
मां! तू अनमोल है मां! तू करुणा का सागर है। प्रेममयी, दयामयी, तू ममता का दर्पण है। धूप में छांव है, अंधकार में तू प्रकाश है, साज में सरगम है, फूल में तू शबनम है। प्यास में तू नदिया है, भावना में तू प्रेम है, मन में तू दर्पण है, तन में तू जीवन है। तू अंदर नीर बहाती है और बाहर से मुस्काती है, तू पर्वत के समान दृढ़ है, गहरे समुन्द्र के समान शांत। तेरा आंचल जैसे मथुरा के यमुनातट के वट-वृक्ष की छाया, और तेरी काया जैसी गंगा की निर्मल शीतल धारा। मेरी हंसी ने ही तुझे हंसाया, मेरे आंसुओं ने ही तुझे रुलाया, मेरी जरा सी आह! में मां, तूने अपना सबकुछ भुलाया। बचपन में लोरी की धुन पर मैं, झूठ ही सो जाता था। और जैसे ही तू बाहर जाती,खूब शोर मचाता था। स्कूल न जाने के लिए, छुपने पर तू नाराज हो जाया करती, "अब कभी न गोद में लोरी सुनाउंगी" कहकर डराया करती। सुनकर, दौड़कर मैं तुझसे लिपट जाता, बार-बार मां,मां कहकर तुझे मनाता। दुनिया की कड़वाहट देखकरयह मन व्यथित हो जाता है। दुखी होकर मां,फिर तेरा आंचल याद आता है। तुझ से होकर दूर फिर भी,तुझे एक पल भुला ना पाता हूं। जब भी थककर चूर होता, तुझे स्मरण करता ह...
मिलेगी मंजिल कभी कभी जीवन में कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जब मन चीत्कार कर, बीते जीवन का, हर पल याद कर लेता है केवल एक क्षण में तब मन शान्त नहीं रहता और टूटने लगती है जीवन की ऊर्जा जिसके सहारे हो रहा था, पूरे जीवन का सफर थकने लगते हैं पांव जबाव देने लगते हैं सांसे मंजिले नज़र नहीं आती गतिहीनता बढ़ती जाती है किन्तु तब समेट कर अपना सामर्थ्य समेट कर अपना ऊर्जा जुटा कर अपनी हिम्मत कर लेना प्रण चाहिए तब अभी तो शुरुआत है। क्योंकि मंजिल, इतनी आसान न कभी थी न कभी है न कभी होगी। मंजिल तक जाने के लिए हमें बितानी है दु:स्वपन भरी काली रात क्योंकि हमेशा अमावस्या तो नहीं रहती। चांदनी को तो आना ही है। काले साये का गम छोड़। छोड़कर इन्हें कोसना, दीपजला ताकि तेरे घर के जलते दीपों को देखकर सीख ले ये अंबर कि एक रात अमावस्या की डरा नहीं सकती मानव को क्योंकि मानव की भुजाओं में है, असीम शक्ति तभी तो मैं कहता हूं मिलेगी मंजिल।
अरे - जिंदगी जिंदगी! जिंदगी!! जिंदगी!!! चिल्ला रहा! जन जनार्दन आज का, खो रहा भाव श्रृंगार आज के समाज का। हो रहे हैं विप्लव, नरसंहार, मानो प्रकृति की ओट हो, लुट रही इज्जत-आबरु, जन मानस का हो रहा आखेट हो। क्या यही जिंदगी की शान है? जल रही चिता जहां, मान-मर्यादा और देश जाति के नाम की । बढ़े सरगर्मियां, अविश्वास और अरमान की। अरे!जिंदगी तो एक सौगात है, संबधों कीअनुपम बारात है। स्नेह-सिंचित दिव्यज्योति की किरणें जिसमें जलती धरा-गगन, रवि-शशि पुलकित कलियां खिलतीं। फिर भी यहां भीषण कुकृत्यों का ताण्डव कैसा? अवनि और अंबर डोले भूचाल कैसा? गुजारिश है, जलाओ दिए-साहस,मान और सम्मान के, मुस्कराओं, इठलाओ, चमकाओ मानवता के निशान को रंगों हाथ उपकार, हर्ष और वेदना के सौरभ में कर समर्पित लगो टिमटिमाने, धरा और गगन में। होगी जिदंगी तभीनिखरती, चमकती, मुस्कराती-सी, झुकेगा गगन, उठेगी धरा। मानो तुम्हें चूमती सी। मानों तुम्हें चूमती सी। 26/11, की घटना के बाद जब सैंकड़ों लोग मोमबत्ती लेकर विरोध जताने और साहस, मान सम्मान दिखाने के लिए सड़कों पर उतर आए। वह सब कुछ देखने के बाद यह भाव मेरे मन उठे। जिन्हें मैंने शब्दों ...