यह पंक्तियां मैंने तब लिखी जब मानसून की घनघोर बारिश के दौरान अचानक बिजली चली गई। और कुछ समय के लिए चारों तरफ अंधेरा व्याप्त हो गया। हाथ को हाथ नहीं दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ देर बाद सामने वाले फ्लैट में एक मोमबत्ती जली, उसकी रोशनी की एक किरण दूर से भी दिखाई दे रही थी। इस दस मिनट के समयांत्याराल में न जाने कितने विचार मन में आकर चले गए और कुछ अनवरत चल रहे थे। इसके बाद जो विचारों का मंथन शुरु हुआ वो फिर घंटों तक चलता रहा और मैं बारिश को यूं ही निहारता रहा। अपने ड्राइंगरुम बैठे हुए मैंने भावों को या यूं कीहिए उस मंथन को शब्दों का अमली जामा पहना कर कागज पर उतार दिया। अपनी इस रचना के लिए मुझे अपने समाचार संपादक से मिला शाबासी के रुप में 'बहुत खूब, बहुत अच्छा'। इस रचना को मैंने नाम दिया "अंधेरे से उजाले की ओर"........................
आज काफी दिनों के बाद लिखने का मौका मिल रहा है । पिछले दो महीनों से मैं बहुत फंसा हुआ हूं जिदंगी अलग अलग तरह के रंगों को दिखा रही है। अब मैने डिसाईड किया है। कि मैं डेली लिखा करूंगा।
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