यह पंक्तियां मैंने तब लिखी जब मानसून की घनघोर बारिश के दौरान अचानक बिजली चली गई। और कुछ समय के लिए चारों तरफ अंधेरा व्याप्त हो गया। हाथ को हाथ नहीं दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ देर बाद सामने वाले फ्लैट में एक मोमबत्ती जली, उसकी रोशनी की एक किरण दूर से भी दिखाई दे रही थी। इस दस मिनट के समयांत्याराल में न जाने कितने विचार मन में आकर चले गए और कुछ अनवरत चल रहे थे। इसके बाद जो विचारों का मंथन शुरु हुआ वो फिर घंटों तक चलता रहा और मैं बारिश को यूं ही निहारता रहा। अपने ड्राइंगरुम बैठे हुए मैंने भावों को या यूं कीहिए उस मंथन को शब्दों का अमली जामा पहना कर कागज पर उतार दिया। अपनी इस रचना के लिए मुझे अपने समाचार संपादक से मिला शाबासी के रुप में 'बहुत खूब, बहुत अच्छा'। इस रचना को मैंने नाम दिया "अंधेरे से उजाले की ओर"........................
साहिबाबाद रेलवे स्टेशन दिल्ली के नजदीक होने के कारण काफी व्यस्त रहता है। यहां 98 पैंसेजर ट्रेन और 16 एक्सप्रेस ट्रेनों के स्टॉपेज़ हैं। जिनसे लगभग 50 हजार यात्री प्रतिदिन सफर करते हैं। यही रेलवे स्टेशन अनियमिताओं का शिकार है। पूरे परिसर में गंदगी और आवारा पशुओं का जमावड़ा आम बात है। बंदरों के आतंक से भी यह स्टेशन अछूता नहीं है। टिकट खिड़की परिसर में लगी हुई दोनों एटीवीएम मशीनें महीनों से खराब पड़ी हुई हैं। इस परिसर में तीन टिकट खिड़की हैं और एक पूछताछ कार्यालय है। जिसमें से अक्सर दो बंद ही रहती हैं। जिसके चलते यात्रियों को होने वाली असुविधाओं के बारे में जब स्टेशन मास्टर नरेश मलिक से बात की गई तो उन्होंने स्टाफ की कमी का हवाला देते हुए अपना दामन बचाने की कोशिश की। साहिबाबाद रेलवे स्टेशन मास्टर नरेश मलिक ने बताया कि कर्मचारियों की कमी हैं। मैं उनसे कहां तक काम करवाउं। पेयजल की बाधित व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि यह इंजीनियरिंग विभाग का काम है। इसके बारे में आप इस विभाग से बात करें। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह विभाग आपके आदेश के अधीन नहीं हैं तो उन्होंने चुप्पी साध ली। रेलवे स्टेशन पर ...
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