अंधेरा भी क्या अंधेरा हुआ करता है। सब कुछ अपने आगोश में छिपा लेता है। हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता है। जिंदगी का अंधेरा भी कुछ ऐसा ही होता है। सब अच्छे कर्मों को छिपा लेता है। और बुराई की ओर लिए जाता है। अंधेरे में ही तो सारे गोरखधंधे होते हैं। जो इंसान को इंसान से दूर कर देते हैं। अंधेरा जो अच्छे बुरे की पहचान भुला देता है। वह इंसान से इंसान की पहचान तक छीन लेता है।रह जाती है तो बस एक अजब सी कशमकशसिर्फ अपने आपको पहचानने की। फिर भी अंधेरे में प्रकाश की एक किरण हुआ करती है।जो सदैव हमारे विवेक का जगाती है। लेकिन अंधेरा उस पर हावी हुआ करता है।जो अविवेकी हुआ करता है। अंधेरा इंसान को आबादी से बर्बादी की ओर लेकर जाता है।वही विरला है, वही इंसान हैजो अंधेरे में भटकता नहीं बल्कि विवेक जगाने वाली प्रकाश किरण देख लिया करता है। वक्त से जो आदमी घबरा जाता है।उसे अंधेरा ही हाथ लगा करता है। वक्त से जो लड़ जाया करते हैंहवा का रुख बदलने को उठ खड़े हो जाया करते हैं। वक्त के थपेड़ों से जो घबराया नहीं करतेउन्हें अंधेरे में प्रकाश के पुंज मिल जाया करते हैं।उन्हें ही अंधेरा " अंधेरे से उजाले की ओर "...