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Showing posts from July, 2009
अंधेरा भी क्या अंधेरा हुआ करता है। सब कुछ अपने आगोश में छिपा लेता है। हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता है। जिंदगी का अंधेरा भी कुछ ऐसा ही होता है। सब अच्छे कर्मों को छिपा लेता है। और बुराई की ओर लिए जाता है। अंधेरे में ही तो सारे गोरखधंधे होते हैं। जो इंसान को इंसान से दूर कर देते हैं। अंधेरा जो अच्छे बुरे की पहचान भुला देता है। वह इंसान से इंसान की पहचान तक छीन लेता है।रह जाती है तो बस एक अजब सी कशमकशसिर्फ अपने आपको पहचानने की। फिर भी अंधेरे में प्रकाश की एक किरण हुआ करती है।जो सदैव हमारे विवेक का जगाती है। लेकिन अंधेरा उस पर हावी हुआ करता है।जो अविवेकी हुआ करता है। अंधेरा इंसान को आबादी से बर्बादी की ओर लेकर जाता है।वही विरला है, वही इंसान हैजो अंधेरे में भटकता नहीं बल्कि विवेक जगाने वाली प्रकाश किरण देख लिया करता है। वक्त से जो आदमी घबरा जाता है।उसे अंधेरा ही हाथ लगा करता है। वक्त से जो लड़ जाया करते हैंहवा का रुख बदलने को उठ खड़े हो जाया करते हैं। वक्त के थपेड़ों से जो घबराया नहीं करतेउन्हें अंधेरे में प्रकाश के पुंज मिल जाया करते हैं।उन्हें ही अंधेरा " अंधेरे से उजाले की ओर "...
यह पंक्तियां मैंने तब लिखी जब मानसून की घनघोर बारिश के दौरान अचानक बिजली चली गई। और कुछ समय के लिए चारों तरफ अंधेरा व्याप्त हो गया। हाथ को हाथ नहीं दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ देर बाद सामने वाले फ्लैट में एक मोमबत्ती जली, उसकी रोशनी की एक किरण दूर से भी दिखाई दे रही थी। इस दस मिनट के समयांत्याराल में न जाने कितने विचार मन में आकर चले गए और कुछ अनवरत चल रहे थे। इसके बाद जो विचारों का मंथन शुरु हुआ वो फिर घंटों तक चलता रहा और मैं बारिश को यूं ही निहारता रहा। अपने ड्राइंगरुम बैठे हुए मैंने भावों को या यूं कीहिए उस मंथन को शब्दों का अमली जामा पहना कर कागज पर उतार दिया। अपनी इस रचना के लिए मुझे अपने समाचार संपादक से मिला शाबासी के रुप में 'बहुत खूब, बहुत अच्छा'। इस रचना को मैंने नाम दिया "अंधेरे से उजाले की ओर"........................

बदलाव या कुछ और

समलैंगिकता का मामला आदोलन का रुप लेता जा रहा है। यह भारतीय संस्कृति में बदलाव की हवा है या फिर उसके साहसिक और मुखर होने का मामला है। वैसे यह बहुत ही हिम्मतभरा कदम है ऐसे संबधों को खुलकर सामाजिक मंच पर अपनाना। मेरा मानना है समलैंगिकता बहस का मामला नहीं है। बल्कि यह व्यक्तिगत साहस का मामला है। ऐसे संबध पहले भी थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। इसमें नया कुछ भी नहीं है। अगर नया कुछ है तो वह ...

दिल्ली मेरी जान

अक्सर पहले लोग मुझसे पूछा करते थे कि दिल्ली कैसा शहर है। तो मैं बहुत ही खुले शब्दों में कहा करता था कि यह बहुत ही गंदा और भद्दा शहर है। लोग मेरी बात सुनकर हैरत में पढ़ जाया करते थे और मैं सोचा करता था ये सभी लोग ऐसे रिएक्ट क्यों करते हैं। लेकिन अब थोड़ा सा सकून है कि दिल्ली को लेकर। थैंक्स टू कॉमनवेल्थ गेम्स। जिसके कारण दिल्ली की कायापल्ट का काम चल रहा है। यह ठीक उस तरह है बेटी की शादी से पहले अपने घर की साज-सजावट और मेहमानों के स्वागत के लिए तैयारियां। लेकिन मैं यहां यह कहूंगा साफ-सफाई, सजावट, और सलीके को दिल्ली के लिए कल्चर बना दो। अरे भई दिल्ली को दिल्ली ही बने रहने दो। वर्ना सभी जानते हैं बारात के जाने के बाद कितनी गंदगी फैलती है।