अजय शर्मा पता नहीं कैसा दिन था जब उस उदास शाम की रौशनी में अपने मन और दिल को समेटे ने सोनाली ने तेज धड़कते दिल के साथ होटल की लॉबी में प्रवेश किया। हर कदम के साथ उसके दिल की धड़कन तेज होती जा रही थी। सोनाली वो नहीं देखना चाहती थी जिसकी आशंका से उसका दिल तेजी से धौंकनी की तरह धड़क रहा था। थोड़ी ही देर में वो अनिल के कमरे के सामने खड़ी थी। सोनाली ने कंपकपाते हाथों से डोर बेल बजाई। थोड़ी देर बाद अधनंगी हालत में अनिल दरवाजे पर प्रकट हुआ। सोनाली अनिल को धक्का देते हुए अंदर जा पहुंची। उसने अंदर जो देखा उसे देखकर वो गुस्से थर थर कांपने लगी। सोनाली की गुस्से भरी चीखों से पूरा कमरा गूंजने लगा। जिसका प्रतिकार अनिल ने सोनाली को बुरी तरह पीट कर किया। जिसमें सोनाली के हाथ की अंगुलियां तक टूट गईं। इस अपमान का जहर पीकर सोनाली जब वहां से लौटी तो अंधेरा आगे था, शाम पीछे। पैर आगे थे, मन पीछे। जिदंगी में एक बार फिर उसने इस अंधेरे को अपने अंदर तक महसूस किया। मौसम ठंडा था लेकिन भीतर इतनी गरम बहस चल रही थी कि विचारों के फरिश्ते भाप बन जहां-तहां उड़ रहे थे। वह कब घर पहुंच गई उसे पता ही नहीं चला। तेजी से...