यह कॉलम लिखने की प्रेरणा मुझे सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक और ट्वीटर पर लिखी जाने वाली कुछ पोस्ट और उन पर की जाने वाली प्रतिक्रियाओं से मिली। पिछले कुछ सालों में फेसबुक और ट्वीटर जैसी सोशल साइट्स की लोकप्रियता तेजी के साथ बढ़ी है। कुछ सवाल अक्सर मुझे सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं। क्या इस नेटवर्क के जरिए बने दोस्तों का असल जिंदगी में भी महत्व है। क्या सोशल नेटवर्किंग साइटस किसी की जिदंगी बचा सकती है। जबकि सोशल नेटवर्किंग साइटस को विलेन की तरह समझा जाता है जो अवसाद फैलाती है। जबकि यह एक गलत धारणा है जिसे लोगों के ऊपर थोपा जा रहा हैं। सब कुछ आपके नजरिए पर निर्भर करता है कि आप इसे किस तरह से लेते हैं। तेज भागती दौड़ती जिदंगी में सोशल नेटवर्किंग साइट्स आपको एक दूसरे से जुड़े रहने का मौका देती है। दोस्तों फेसबुक से जुड़ी कुछ घटनाएं आपके सोचने का नजरिया बदल देंगी और उन लोगों का भी जो इसे अवसाद और निगेटिव एनर्जी फैलानी वाली मानते हैं। सबसे पहले मैं अपनी एक दोस्त से मिले अनुभव को आपके साथ बाटूंगा। वाक्या कुछ इस तरह है कि एक दिन मैंने अपनी साथी पत्रकार शशि पाण्डेय की वॉल पोस्ट पढ़ी जिसमें वह एक...