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Showing posts from September, 2017

india after freedom

सत्तर साल का आजाद युवा भारत करीब डेढ़ दशक पहले कहावत प्रसिद्ध हुई थी, ‘सौ में नब्बे बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान।’ यह बात ट्रकों के पीछे लिखी नजर आती थी। यह एक प्रकार का सामाजिक अंतर्मंथन था। हम अपना मजाक उड़ाना भी जानते हैं। यह एक सचाई की स्वीकृति भी थी। घटनाओं को एकसाथ मिलाकर पढ़ें तो विचित्र बड़े रोचक अनुभव होते हैं। हाल में उपराष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में 771 वोट पड़े। इनमें से 11 वोट अवैध घोषित हुए। उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य वोट डालते हैं। वोट डालने में यह गलती सांसदों ने की है। इसे बड़ी गलती न मानें, पर यह बात किस तरफ इशारा करती है? यही कि हमारे लोकतंत्र ने संस्थाओं की रचना तो की, पर उनकी गुणवत्ता को सुनिश्चित नहीं किया। राष्ट्रीय पर्व ऐसे अवसर होते हैं जब लाउड स्पीकर पर देशभक्ति के गीत बजते हैं। क्या वास्तव में हम देशभक्त हैं? क्या हम जानते हैं कि देशभक्त माने होता क्या है?ऐसे ही सवालों से जुड़ा सवाल यह है कि आजाद होने के बाद पिछले सत्तर साल में हमने हासिल क्या किया है? कहीं हम पीछे तो नहीं चले गए हैं? सवाल पूछने वालों से भी सवाल पूछे जाने...